गुजरात हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि किसी अविवाहित महिला को यह कहकर नौकरी से वंचित करना कि “वह शादी के बाद कहीं और चली जाएगी”, पूरी तरह असंवैधानिक है। अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसा तर्क मनमाना, भेदभावपूर्ण और संविधान के अनुच्छेद 14 व 16 में दिए गए समान अवसर के अधिकार का उल्लंघन है।
यह मामला गुजरात के दाहोद जिले में प्रशासक-सह-रसोइया पद की भर्ती से जुड़ा था। याचिकाकर्ता के पास ग्रेजुएशन में 68% अंक थे, जबकि चयनित उम्मीदवार को 48.94% अंक मिले थे। इसके बावजूद कम अंक वाली उम्मीदवार को मेरिट लिस्ट में ऊपर रखकर नियुक्ति दे दी गई।
भर्ती से जुड़े दस्तावेजों की जांच के बाद कोर्ट ने पाया कि मेरिट लिस्ट में अनियमितताएं की गई थीं और अधिक योग्य उम्मीदवारों को अजीब कारणों से बाहर कर दिया गया। रिकॉर्ड में यह टिप्पणी भी लिखी गई थी कि “अविवाहित लड़की भविष्य में शादी करके गांव छोड़ सकती है।”
अदालत ने इस तर्क को सख्ती से खारिज करते हुए कहा कि ऐसा कोई नियम नहीं है जो किसी अविवाहित महिला को इस आधार पर नौकरी से वंचित करने की अनुमति देता हो। कोर्ट ने इसे “भाई-भतीजावाद का क्लासिक उदाहरण” बताया।
अदालत ने 21 अप्रैल 2018 को जारी नियुक्ति आदेश को रद्द कर दिया और अधिकारियों को निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता की डिग्री की विश्वविद्यालय से जांच कराई जाए। यदि डिग्री सही पाई जाती है तो मेरिट के आधार पर उसे नौकरी दी जाए, और यदि डिग्री फर्जी पाई जाती है तो मेरिट सूची में दूसरे स्थान वाले उम्मीदवार को नियुक्त किया जाए। साथ ही अदालत ने राज्य सरकार को सार्वजनिक भर्ती प्रक्रियाओं में पारदर्शिता सुनिश्चित करने और भविष्य में ऐसी अनियमितताओं को रोकने के लिए मजबूत व्यवस्था लागू करने के निर्देश भी दिए।



Comments
Leave A reply
Your email address will not be published. Required fields are marked *