इंदौर स्थित हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने एक महत्वपूर्ण फैसले में बच्ची की कस्टडी उसकी मां को सौंप दी। यह फैसला न्यायमूर्ति विजय कुमार शुक्ला और न्यायमूर्ति बिनोद कुमार द्विवेदी की पीठ ने सुनाया। अदालत ने कनाडा की अदालत द्वारा पिता को दी गई सोल कस्टडी के आदेश को मानने से इनकार कर दिया।
मां के स्नेह को बताया सर्वोपरि
कोर्ट ने अपने फैसले में भारतीय संस्कृति और भावनात्मक मूल्यों का उल्लेख किया। रामायण के संदर्भ में माता सीता और लव कुश का उदाहरण देते हुए कहा गया कि मां का स्नेह और संरक्षण बच्चे के विकास का सबसे मजबूत आधार होता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि बच्चे के जीवन में मां का स्थान किसी भी अन्य रिश्ते से ऊपर है।
अंतरराष्ट्रीय आदेश से ऊपर बच्चे का हित
हाईकोर्ट ने कहा कि विदेशी अदालतों के आदेशों का सम्मान किया जाता है, लेकिन जब बात बच्चे के हित की हो, तो भारतीय अदालतें स्वतंत्र निर्णय ले सकती हैं। केवल तकनीकी आधार पर बच्चे को मां से अलग करना न्यायसंगत नहीं है।
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चार साल से भारत में रह रही है बच्ची
मामले में सामने आया कि बच्ची पिछले चार वर्षों से भारत में रह रही है और इंदौर के माहौल और स्कूल में पूरी तरह ढल चुकी है। अदालत ने बच्ची से बातचीत के बाद यह निष्कर्ष निकाला कि उसे अचानक विदेश भेजना उसके मानसिक और भावनात्मक विकास के लिए हानिकारक हो सकता है।
पिता की याचिका खारिज
पिता द्वारा दाखिल हेबियस कॉर्पस याचिका को अदालत ने खारिज कर दिया। यह याचिका कनाडा की अदालत के आदेश के आधार पर लगाई गई थी, जिसमें पिता को सोल कस्टडी दी गई थी। हाई कोर्ट ने मामले की मेरिट पर सुनवाई करते हुए मां के पक्ष में निर्णय दिया।
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला
हाई कोर्ट ने अपने निर्णय में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों का भी उल्लेख किया। अदालत ने कहा कि यदि बच्चे का हित सर्वोपरि हो, तो न्यायालय अपने विशेष अधिकारों का उपयोग कर सकता है और तकनीकी बाधाओं को दरकिनार कर सकता है। इस फैसला से अदालत ने यह संदेश दिया कि कानूनी प्रक्रियाओं से अधिक महत्वपूर्ण बच्चे का भावनात्मक और मानसिक विकास है, जिसमें मां की भूमिका अहम मानी गई है।



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