इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि पिता की मृत्यु के बाद मां ही नाबालिग बच्चे की प्राकृतिक अभिभावक (Natural Guardian) होती है। अदालत ने कहा कि यदि संपत्ति संयुक्त परिवार की अविभाजित संपत्ति है और मां परिवार की वयस्क सदस्य के रूप में उसका प्रबंधन कर रही है, तो बच्चे के हिस्से की बिक्री के लिए अदालत से पूर्व अनुमति लेना आवश्यक नहीं है—बशर्ते यह कदम बच्चे के हित और कल्याण में उठाया गया हो।
यह फैसला न्यायमूर्ति रोहित रंजन अग्रवाल की एकलपीठ ने श्रीमती डोली बनाम श्रीमती शकुंतला देवी मामले में 23 मार्च 2026 को सुनाया।
क्या है पूरा मामला?
सहारनपुर जिले की रहने वाली एक विधवा महिला, श्रीमती डोली ने अपनी नाबालिग बेटी की उच्च शिक्षा के लिए संयुक्त परिवार की संपत्ति में उसके 1/4 हिस्से को बेचने की अनुमति मांगी थी। निचली अदालत ने उन्हें अभिभावक तो नियुक्त कर दिया, लेकिन संपत्ति बेचने की अनुमति देने से इनकार कर दिया। इसके बाद मामला हाईकोर्ट पहुंचा, जहां निचली अदालत के फैसले को चुनौती दी गई।
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हाईकोर्ट ने क्या कहा?
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील ने हिंदू अल्पसंख्यक एवं संरक्षकता अधिनियम, 1956 की धारा 12 का हवाला देते हुए कहा कि निचली अदालत का निर्णय कानून के अनुरूप नहीं था। इस पर हाईकोर्ट ने अधिनियम की धारा 6 का उल्लेख करते हुए स्पष्ट किया कि:
• पिता के बाद मां ही नाबालिग की प्राकृतिक अभिभावक होती है
• मां, संयुक्त परिवार की वयस्क सदस्य होने के नाते संपत्ति का प्रबंधन कर सकती है
• नाबालिग के हित में संपत्ति बेचना वैध है
न्यायमूर्ति अग्रवाल ने कहा कि इस मामले में मां न केवल प्राकृतिक अभिभावक हैं, बल्कि परिवार की प्रबंधक की भूमिका भी निभा रही हैं, इसलिए उन्हें संपत्ति बेचने का अधिकार है।
धारा 8(2) पर भी स्पष्टता
अदालत ने यह भी कहा कि अधिनियम की धारा 8(2) कुछ शक्तियों को सीमित जरूर करती है, लेकिन संयुक्त परिवार की अविभाजित संपत्ति के मामलों में नाबालिग के हितों की सुरक्षा परिवार के वयस्क सदस्य द्वारा ही की जाती है। ऐसे मामलों में अलग से अभिभावक नियुक्त करना जरूरी नहीं होता।
शिक्षा के लिए लिया गया फैसला सही
अदालत ने यह भी ध्यान में रखा कि नाबालिग बेटी कक्षा 12वीं की परीक्षा दे चुकी है और उच्च शिक्षा के लिए धन की आवश्यकता है। इसलिए संपत्ति की बिक्री उसके भविष्य और करियर के लिए आवश्यक है।
निचली अदालत का आदेश रद्द
हाईकोर्ट ने मुजफ्फरनगर के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश द्वारा 17 जुलाई 2025 को दिए गए आदेश को रद्द करते हुए कहा कि वह कानून की दृष्टि से टिकाऊ नहीं है।
क्या है इस फैसले का महत्व?
यह फैसला उन मामलों के लिए मिसाल बनेगा जहां:
• पिता की मृत्यु के बाद मां बच्चों की जिम्मेदारी संभालती है
• संयुक्त परिवार की संपत्ति में नाबालिग का हिस्सा होता है
• बच्चों के भविष्य के लिए आर्थिक निर्णय लेने की जरूरत होती है
यह निर्णय महिलाओं के अधिकारों को मजबूत करने और नाबालिगों के हितों की रक्षा की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।



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