नैनीताल हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में पति द्वारा नाबालिग बच्चे की डीएनए जांच कराने की मांग को खारिज कर दिया है। अदालत ने पारिवारिक न्यायालय के पहले दिए गए आदेश को बरकरार रखते हुए कहा कि ऐसे निर्देश सामान्य रूप से नहीं दिए जा सकते।
बच्चे की वैधता और गोपनीयता सर्वोपरि
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कानून वैध विवाह के दौरान जन्मे बच्चे की वैधता, गरिमा और गोपनीयता की सख्त सुरक्षा करता है। डीएनए जांच की अनुमति देना बच्चे के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हो सकता है।
खंडपीठ ने अपील की निरस्त
वरिष्ठ न्यायाधीश न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी और न्यायमूर्ति पंकज पुरोहित की खंडपीठ ने अपील को निरस्त करते हुए कहा कि अपीलकर्ता डीएनए परीक्षण की मांग के लिए आवश्यक कानूनी आधार प्रस्तुत करने में असफल रहा।
क्या था मामला
यह मामला 16 दिसंबर 2025 को पारिवारिक न्यायालय, नैनीताल के आदेश के खिलाफ दायर अपील से जुड़ा था। पति ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13 के तहत पत्नी पर व्यभिचार और वैवाहिक दुराचार के आरोप लगाए थे।
डीएनए टेस्ट की मांग क्यों की गई थी
पति ने अपने आरोपों को साबित करने के लिए नाबालिग बच्चे की डीएनए जांच की मांग की थी। उसका तर्क था कि वह बच्चे की वैधता को चुनौती नहीं दे रहा, बल्कि केवल व्यभिचार के आरोप को साबित करने के लिए वैज्ञानिक साक्ष्य चाहता है।
धारा 112 का हवाला
हाई कोर्ट ने कहा कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 112 के तहत वैध विवाह के दौरान जन्मे बच्चे को वैध माना जाता है। इस धारणा को केवल तभी चुनौती दी जा सकती है जब पति-पत्नी के बीच संबंधित समय में ‘गैर-प्रवेश’ (non-access) साबित किया जाए।
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अदालत की सख्त टिप्पणी
अदालत ने पाया कि अपीलकर्ता ने न तो गैर-प्रवेश का स्पष्ट दावा किया और न ही उसे साबित करने का कोई प्रयास किया। ऐसे में डीएनए जांच की अनुमति देना कानून के प्रावधानों को कमजोर करेगा।
अनुच्छेद 21 का भी दिया हवाला
कोर्ट ने कहा कि डीएनए परीक्षण से नाबालिग बच्चे की गोपनीयता और गरिमा प्रभावित होगी, जो संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत संरक्षित है। इसलिए ऐसे मामलों में सावधानी बेहद जरूरी है।



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