मध्य प्रदेश के रीवा से ममता और मानवता की एक अनोखी मिसाल सामने आई है। यहां एक महिला सैकड़ों बच्चों के लिए मां बनकर उनका जीवन संवार रही हैं। खून का रिश्ता न होने के बावजूद, वे अति कुपोषित बच्चों को गोद लेकर उनकी परवरिश कर नई जिंदगी दे रही हैं। ‘मां यशोदा’ की तरह उन्होंने बच्चों से इतना जुड़ाव बना लिया है कि अब बच्चे उन्हें अपने ही मानते हैं।
ममता नरेंद्र सिंह का योगदान
उपभोक्ता फोरम की पूर्व सदस्य ममता नरेंद्र सिंह ने आठ साल पहले पहली बार 47 अति कुपोषित बच्चों को गोद लिया था। पूर्व कलेक्टर राहुल जैन से प्रेरणा लेकर वे जिले की मुख्य अटल बाल पालक बनीं। ममता सिंह अपने खर्चे पर हर वर्ष 11 कुपोषित बच्चों की परवरिश कर रही हैं। उनकी मातृत्व सेवा को देखकर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने उन्हें सम्मान पत्र से नवाजा।
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ममता कहती हैं, “कुपोषित बच्चों की परवरिश ने मेरे अंदर की मां और नारी को सुकून दिया और सही मायनों में इंसान बनने में मदद की। गरीब और असहाय बच्चों के लिए जो संतुष्टि मिलती है वह किसी और कार्य में नहीं मिलती।”
कैसे बनी सैकड़ों बच्चों की मां
ममता बताती हैं कि जब बच्चे कुपोषण से मुक्त होकर सामान्य जीवन जीने लगते हैं, तब अपार खुशी होती है। उन्होंने पहली बार 47 बच्चों को गोद लिया और उनके लिए खेल खिलौने, मच्छरदानी और संतुलित आहार की व्यवस्था की। अब वे पांच बच्चों की नियमित परवरिश कर रही हैं और उनके स्वास्थ्य, आहार और शिक्षा का पूरा ध्यान रखती हैं।
बच्चों के स्वास्थ्य और आहार का ख्याल
ममता कहती हैं, “आपकी थोड़ी मदद से किसी बच्चे को नया जीवन मिल जाए, इससे बड़ा कार्य और क्या हो सकता है। मैं बच्चों के स्वास्थ्य से लेकर उनके खाने-पीने तक का पूरा ख्याल रखती हूं। गोद न लिए बच्चों के माता-पिता को भी जागरूक करती हूं और मदद करती हूं।”
सामाजिक सेवा से मिली संतुष्टि
ममता का कहना है कि बच्चों के साथ समय बिताना और उन्हें स्वस्थ जीवन देना उनके जीवन की सबसे बड़ी संतुष्टि है। अपनी बेटी के बाहर पढ़ाई करने जाने के बाद उनका अकेलापन खत्म हो गया और ये बच्चे उन्हें अम्मा या मैया कहकर बुलाते हैं।
सन्दर्भ स्रोत/छाया : न्यूज़ 18
सम्पादन : मीडियाटिक डेस्क



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