भोपाल: भारतीय समाज में सदियों से सोहर और बधाई गीत बेटों के जन्म का प्रतीक रहे हैं, लेकिन शहर की कुमुद सिंह ने इस पुरानी परंपरा की धारा को मोड़ दिया है। सरोकार संस्था के माध्यम से कुमुद ने एक सांस्कृतिक क्रांति की नींव रखी है, जहां बेटियों का आगमन अब उधार के गीतों (जो बेटों के लिए होते थे) से नहीं, बल्कि उनके अपने अस्तित्व को बयां करने वाले मौलिक बधाई गीतों से मनाया जा रहा है।
यह अभियान 2018 में शुरू हुआ था और अब तक यह 12 से अधिक भाषाओं और बोलियों में 2200 से ज्यादा गीतों के विशाल संग्रह में तब्दील हो चुका है।
अभियान की शुरुआत
कुमुद सिंह के लिए यह पहल एक व्यक्तिगत अनुभव से प्रेरित हुई। वे बताती हैं, "1998 में जब मेरी बेटी का जन्म हुआ, तब घर की महिलाओं ने वही बधाई गीत गाए, जो आमतौर पर बेटों के लिए होते हैं। तभी मुझे एहसास हुआ कि हमारी लोक संस्कृति में बेटी के जन्म पर गाने के लिए कोई स्वतंत्र गीत नहीं है।" इसी टीस ने उन्हें गीतों की खोज में प्रेरित किया। जब वर्षों की तलाश के बावजूद मौलिक गीत नहीं मिले, तो उन्होंने ऑनलाइन प्रतियोगिताओं के जरिए देशभर के रचनाकारों को जोड़कर एक नई शुरुआत की।
भाषाओं की सरहद लांघती 'बेटियों की खुशबू'
कुमुद के पास अब हिंदी, बंगाली, मराठी, तेलुगु, तमिल, गुजराती के अलावा बुदेली, बघेली, मालवी, निमाड़ी, भीली, और गोंडी जैसी लोक बोलियों के खजाने हैं। इन गीतों में सिर्फ खुशी का ही नहीं, बल्कि बेटी की अस्मिता, अधिकार और हक की गूंज भी सुनाई देती है। हर साल जूरी के माध्यम से चयनित गीतों के लेखकों को पुरस्कृत भी किया जाता है।
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परिवर्तन का डिजिटल मंच
कुमुद ने कोरोना काल से पहले ही डिजिटल शक्ति को पहचान लिया था और ऑनलाइन प्रतियोगिता की शुरुआत की, जिसमें लेखकों से बेटियों के जन्म पर मौलिक गीत मांगे गए। इन गीतों को साहित्य, सामाजिक प्रभाव और नवाचार की कसौटी पर परखा जाता है। यह अब एक आंदोलन बन चुका है, जो नई सांस्कृतिक परंपरा को बढ़ावा दे रहा है।
कुमुद का कहना है, "हमारा उद्देश्य केवल गीत जुटाना नहीं, बल्कि समाज की सोच को उस स्तर तक ले जाना है, जहां बेटी का जन्म एक उत्सव बन जाए, न कि एक औपचारिकता।"
सांस्कृतिक बदलाव के बड़े आंकड़े
- 20 साल का संघर्ष: भोपाल को केंद्र बनाकर कुमुद ने देशभर में जेंडर इक्विटी पर सक्रिय कार्य किया।
- 2200 से अधिक गीतों का संकलन: देशभर से करीब 20 भाषाओं और बोलियों में गीत प्राप्त हुए।
- 250 खास रचनाएं: 12 बोलियों में बेटियों को समर्पित मौलिक रचनाएं, जो बराबरी, हक और सम्मान को दर्शाती हैं, साहित्यिक कसौटी पर खरी उतरती हैं।
सन्दर्भ स्रोत : कुमुद सिंह



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