•निलेश देसाई
झाबुआ के पथरीले रास्तों और आदिवासी अंचलों में एक समय ऐसा था जब सूरज ढलने के बाद केवल रात का अंधेरा ही नहीं, बल्कि कर्ज का काला साया भी गहरा जाता था। यहाँ गरीबी केवल फटे हुए कपड़ों या खाली थाली का नाम नहीं थी, बल्कि यह एक ऐसी नियति बन चुकी थी जिससे निकलना नामुमकिन लगता था। लेकिन आज, उसी झाबुआ की माटी से एक ऐसी गूँज सुनाई दे रही है जिसने 'काली बैंक' के शोषणकारी तंत्र को उखाड़ फेंका है। यह कहानी है 'धोड़ी बैंक' (सफेद बैंक) की और उन 6,000 से अधिक महिलाओं की, जिन्होंने संगठित होकर गरीबी के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया है और ₹2.5 करोड़ के वित्तीय साम्राज्य की नींव रखी है।
काली बैंक': पीढ़ियों को निगलने वाला वह काला अध्याय
अस्सी के दशक में झाबुआ के ग्रामीण अंचलों में सूदखोरी की व्यवस्था को स्थानीय भाषा में 'काली बैंक' कहा जाता था। नाम के अनुरूप ही इसका काम भी काला और डरावना था। आदिवासी समाज में जब किसी को बीमारी, शादी-ब्याह या खेती के लिए बीज-खाद की तत्काल आवश्यकता होती, तो उनके पास इन साहूकारों के पास जाने के अलावा कोई विकल्प नहीं था। यहाँ ऋण देने का गणित शोषण की पराकाष्ठा था। अगर कोई 100 रुपये कर्ज मांगता, तो उसे हाथ में केवल 90 रुपये मिलते थे—10 रुपये अग्रिम ब्याज के रूप में पहले ही काट लिए जाते थे। लेकिन उसे लौटाने 110 रुपये पड़ते थे। वसूली का आलम यह था कि साहूकार सुबह 5 बजे ही दरवाजे पर दस्तक दे देते थे। पैसे न होने पर मवेशी, बर्तन या पुश्तैनी जमीन तक गिरवी रख ली जाती थी। यह व्यवस्था गरीबी को कम करने के बजाय उसे एक अंतहीन चक्रव्यूह में बदल देती थी, जहाँ पिता का कर्ज बेटे के कंधों पर विरासत में मिलता था।
1987: 'धोड़ी बैंक' और शोषण के विरुद्ध पहली हुंकार
इस घुटन भरे माहौल में बदलाव की पहली किरण 1980 के दशक के उत्तरार्ध (1987) में दिखाई दी। जुनाखेड़ा गांव में एक छोटी सी चौपाल सजी, जहाँ ग्रामीणों ने अपनी नियति को बदलने का ऐतिहासिक फैसला किया। उन्होंने तय किया कि वे साहूकारों के सामने हाथ फैलाने के बजाय अपना खुद का 'ग्राम कोष' बनाएंगे। यही 'ग्राम कोष' आगे चलकर 'धोड़ी बैंक' (सफेद बैंक) कहलाया। इसकी शुरुआत महज़ ₹2,000 के सामूहिक अंशदान से हुई थी। सिद्धांत सरल था: "गांव का पैसा, गांव के लोगों के लिए और गांव के ही नियंत्रण में।" यहाँ ब्याज दरें कम थीं, प्रक्रिया पारदर्शी थी और सबसे बड़ी बात—इसमें कर्जदार का सम्मान था। धीरे-धीरे यह मॉडल आसपास के गांवों में फैल गया और भविष्य की 'महिला शक्ति' की मजबूत नींव बना।
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महिला शक्ति संघ: 6,000 महिलाओं का अटूट संकल्प
धोड़ी बैंक ने रास्ता दिखाया, लेकिन उसे एक राष्ट्रव्यापी मिसाल बनाने का श्रेय झाबुआ ग्रामीण महिलाओं को जाता है। समय के साथ पुरुषों द्वारा शुरू की गई इस पहल की कमान महिलाओं ने थामी और जन्म हुआ 'महिला शक्ति संघ' का। 1987 में बोया गया वह छोटा सा बीज आज एक विशाल वटवृक्ष बन चुका है:
• विशाल नेटवर्क: आज इस संगठन से 40 से अधिक गांवों की 6,000 से ज्यादा महिलाएं सीधे तौर पर जुड़ी हैं।
• आर्थिक सामर्थ्य: वर्तमान में इस समूह द्वारा लगभग ₹2.5 करोड़ की राशि ऋण के रूप में वितरित की जा चुकी है।
• पूंजी का चक्रीकरण: सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह ₹2.5 करोड़ केवल सरकारी अनुदान नहीं है, बल्कि यह उन महिलाओं की अपनी मेहनत की कमाई और चंद रुपयों की छोटी-छोटी बचतों का परिणाम है। यह अब एक आत्मनिर्भर ग्रामीण अर्थव्यवस्था का मजबूत आधार बन चुका है।
सफलता की जीवंत गाथाएँ: संघर्ष से स्वावलंबन तक
इस ₹2.5 करोड़ के वितरण ने गांवों में स्वरोजगार की ऐसी बाढ़ ला दी है कि महिलाएं अब केवल गृहणी नहीं, बल्कि कुशल प्रबंधक और उद्यमी बन चुकी हैं।
केस स्टडी 1: पलायन को मात देती कमला बाई
काचबी गांव की कमला बाई की कहानी बदलाव का सबसे बड़ा उदाहरण है। कुछ साल पहले तक, कमला बाई और उनका परिवार पेट पालने के लिए हर साल गुजरात पलायन करता था। वहाँ वे बंधुआ मजदूरी जैसी कठिन स्थितियों में काम करते थे। लेकिन महिला शक्ति संघ से जुड़ने के बाद उन्होंने ₹15,000 का ऋण लिया और अपने छोटे से खेत में उन्नत सब्जी की खेती शुरू की। आज कमला बाई का पलायन पूरी तरह रुक चुका है। वे कहती हैं, "पहले कर्ज का नाम सुनकर डर लगता था क्योंकि वह हमें डुबोता था, लेकिन आज का कर्ज हमें आगे बढ़ाता है। अब हम साहूकार के घर नहीं, बल्कि बैंक और बाजार खुद जाते हैं।"
केस स्टडी 2: मीना बाई के सपनों की उड़ान
मीना बाई कभी दूसरों के खेतों में मजदूरी कर बमुश्किल दो वक्त की रोटी जुटा पाती थीं। संघ के सहयोग से उन्होंने ऋण लेकर एक सिलाई मशीन खरीदी और प्रशिक्षण लिया। आज वे न केवल गांव के कपड़े सिलती हैं, बल्कि सरकारी स्कूलों के यूनिफॉर्म तैयार करने का ठेका भी लेती हैं। महीने की ₹8,000 से ₹10,000 की आय ने उनके जीवन की दिशा बदल दी है। उनकी बेटी अब शहर के कॉलेज में पढ़ रही है—एक ऐसा सपना जो 'काली बैंक' के दौर में देखना भी असंभव था।
आर्थिक बदलाव से सामाजिक क्रांति तक
महिला शक्ति संघ का प्रभाव केवल बैंक बैलेंस या तिजोरियों तक सीमित नहीं रहा। इन महिलाओं ने ग्रामीण समाज की जड़ों में जमी कुरीतियों पर भी कड़ा प्रहार किया है:
• फिजूलखर्ची पर लगाम: शादियों और मृत्यु भोज जैसे सामाजिक आयोजनों में होने वाले अनावश्यक खर्चों को कम करने के लिए संघ ने सामूहिक निर्णय लिए हैं। इससे परिवारों पर कर्ज का बोझ कम हुआ है।
• अड़जी-पड़जी परंपरा: खेती में एक-दूसरे की मदद करने की प्राचीन परंपरा 'अड़जी-पड़जी' को फिर से जीवित किया गया है। इससे मजदूरों पर होने वाला खर्च बचता है और गांवों में आपसी भाईचारा बढ़ता है।
• पारिवारिक समृद्धि: इन सामूहिक प्रयासों और बचतों के कारण प्रत्येक परिवार अब सालाना ₹20,000 से ₹30,000 की अतिरिक्त बचत कर पा रहा है।
• घरेलू हिंसा और विवाद: गांव के छोटे-मोटे झगड़े या घरेलू विवाद अब पुलिस स्टेशन या अदालतों में जाने के बजाय संघ की बैठकों में महिलाओं द्वारा आपसी सहमति से सुलझाए जाते हैं।
निष्कर्ष: ग्राम स्वराज और महिला नेतृत्व का भविष्य
झाबुआ की यह गौरवगाथा महज एक वित्तीय मॉडल की सफलता नहीं है, बल्कि यह आत्मसम्मान की वापसी की कहानी है। 1987 में एक छोटी सी बैठक से शुरू हुआ यह कारवां आज 6,000 महिलाओं की वह ताकत बन चुका है, जिसने गरीबी को नियति मानने से इनकार कर दिया।
₹2.5 करोड़ का वित्तीय लेनदेन यह साबित करता है कि यदि ग्रामीण महिलाओं को सही मंच, पारदर्शी व्यवस्था और संसाधन मिलें, तो वे किसी भी बड़े कॉरपोरेट हाउस की तरह प्रबंधन कर सकती हैं। 'काली बैंक' की बेड़ियों को तोड़कर 'धोड़ी बैंक' के माध्यम से महिला शक्ति ने यह सिद्ध कर दिया है कि गरीबी का स्थायी इलाज केवल बाहरी मदद नहीं, बल्कि सामुदायिक एकजुटता और अटूट इच्छाशक्ति है।
आज झाबुआ की ये महिलाएं केवल अपने घर की अर्थव्यवस्था नहीं चला रहीं, बल्कि वे महात्मा गांधी के 'ग्राम स्वराज' के उस सपने को धरातल पर उतार रही हैं जहाँ गांव अपने निर्णयों के लिए स्वतंत्र और आर्थिक रूप से पूर्णतः सक्षम है। यह आंदोलन देश के अन्य पिछड़े अंचलों के लिए एक 'प्रकाश स्तंभ' है, जो यह संदेश देता है कि जब महिलाएं संगठित होती हैं, तो वे केवल अपना भविष्य नहीं, बल्कि पूरे समाज का भूगोल और इतिहास बदल देती हैं। झाबुआ की इन 'शक्ति पुंजों' को हमारा नमन।
छाया : मिनिस्ट्री ऑफ़ पंचायती राज गवर्नमेंट ऑफ़ इंडिया का यूट्यूब पेज



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