इलाहाबाद हाईकोर्ट : विवाह शोषण का लाइसेंस नहीं

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इलाहाबाद हाईकोर्ट : विवाह शोषण का लाइसेंस नहीं

प्रयागराज: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि विवाह किसी का शोषण करने का लाइसेंस नहीं हो सकता। कोर्ट ने अधिवक्ता पति रंजीत सिंह की याचिका को दुराशयपूर्ण मानते हुए खारिज कर दिया और उस पर 15 लाख रुपये का हर्जाना लगाया।

न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर की एकलपीठ ने यह आदेश पारित करते हुए कहा कि याची ने कोर्ट को गुमराह करने के लिए झूठा हलफनामा दाखिल किया और अधूरी जानकारी के आधार पर गुजारा भत्ता प्राप्त किया।

कोर्ट ने निर्देश दिया कि याची छह सप्ताह के भीतर डिमांड ड्राफ्ट के माध्यम से हर्जाना राशि पत्नी को अदा करे। आदेश का पालन न करने की स्थिति में जिलाधिकारी इटावा को तीन महीने के भीतर वसूली करने का निर्देश दिया गया है। साथ ही, जब तक भुगतान नहीं होता, याची की चल और अचल संपत्तियों की बिक्री पर रोक लगा दी गई है।

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मामला क्या है

मामले के अनुसार, दंपति की शादी 18 मई 2019 को हुई थी। शादी के बाद पत्नी को इलाहाबाद हाईकोर्ट में अतिरिक्त निजी सचिव (APS) के पद पर नौकरी मिल गई। इसके बाद दोनों के बीच विवाद बढ़ने लगा। पति ने खुद को बेरोजगार बताते हुए गुजारा भत्ता मांगा, जिस पर परिवार अदालत ने 5,000 रुपये प्रतिमाह और 10,000 रुपये वाद खर्च देने का आदेश दिया था। 

पत्नी के आरोप

पत्नी ने आरोप लगाया कि पति ने उसका एटीएम और डेबिट कार्ड अपने पास रखकर वेतन खाते से लगभग 11.5 लाख और 13.56 लाख रुपये का लोन ले लिया। हर महीने 26,020 रुपये की EMI उसके खाते से कट रही है। इसके अलावा, पति पर दहेज में मिली कार और अन्य सामान ले जाने तथा 10 लाख रुपये की मांग करने का भी आरोप है। 

कोर्ट की सख्त टिप्पणी

कोर्ट ने पाया कि याची ने जानबूझकर झूठे तथ्यों के आधार पर याचिका दाखिल की और गुजारा भत्ता लिया। इस पर सख्त रुख अपनाते हुए कोर्ट ने न केवल याचिका खारिज की बल्कि भारी हर्जाना भी लगाया। साथ ही परिवार अदालत को तलाक और गुजारा भत्ता से जुड़े मामलों का शीघ्र निपटारा करने का निर्देश दिया गया है।

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