इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक अहम निर्णय में कहा कि किसी पत्नी को सिर्फ इस कारण से अपने पति की आत्महत्या के लिए उकसाने का जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता कि उसने पति के खिलाफ केस दर्ज कराया है। कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में ‘दुराशय’ (malicious intent) को साबित करना आवश्यक होता है, जो इस मामले में नहीं था।
न्यायमूर्ति समीर जैन ने यह टिप्पणी सहारनपुर निवासी मेघा खत्री और उसके परिवार के खिलाफ लंबित कार्यवाही को रद्द करते हुए की। कोर्ट ने पाया कि पत्नी और पति के बीच झगड़े और मतभेद सामान्य बात है, और यह आत्महत्या के लिए उकसाने का पर्याप्त कारण नहीं है। कोर्ट ने कहा कि पति की आत्महत्या उसकी मानसिक स्थिति पर निर्भर करती है, न कि केवल पत्नी के द्वारा किए गए कार्यों पर।
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इस मामले की एफआईआर 8 अगस्त 2022 को आईपीसी की धारा 306 के तहत दर्ज की गई थी, जिसमें आरोप था कि मेघा खत्री ने अपने पति को पैतृक संपत्ति के मामले में दबाव डालने के लिए परेशान किया और उसके खिलाफ झूठे मामले दर्ज कराए। मृतक के पिता ने शिकायत की थी कि बहू ने संपत्ति में हिस्सा लेने के लिए बेटे को परेशान किया, जिससे उसने आत्महत्या कर ली।
कोर्ट ने पाया कि मृतक का सुसाइड नोट जांच अधिकारी द्वारा प्राप्त किया गया था, जिसमें बताया गया था कि पत्नी और पति के बीच वैवाहिक समस्याएं थीं। इस कलह के कारण मेघा ने पति के खिलाफ मामला दर्ज कराया, जिसके बाद पति मानसिक तनाव में आ गया और उसने आत्महत्या कर ली।
कोर्ट ने यह निष्कर्ष निकाला कि इस मामले में किसी भी तरह के कुत्सित इरादे को दर्शाने वाले साक्ष्य नहीं हैं, और इस वजह से पत्नी और उसके परिवार के खिलाफ सभी कार्यवाही रद्द कर दी गई।



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