• सारिका ठाकुर
हर मौसम में हर बीज अंकुरित नहीं होता। कुछ बीज लम्बे समय तक ज़मीन में दबे रहते हैं और अनुकूल परिस्थितियाँ मिलते ही अंकुरित हो उठते हैं। कवयित्री एवं अनुवादक मालिनी गौतम का जीवन इसी सत्य का साक्षात उदाहरण है। मालिनी गौतम का जन्म 20 फरवरी 1972 को मध्यप्रदेश के झाबुआ जिले के कस्बे राणापुर में हुआ। उनकी माता श्रीमती विरमा देवी गौतम शासकीय विद्यालय में प्राध्यापक थीं तथा उनके पिता श्री ब्रह्मजीत गौतम झाबुआ स्नातकोत्तर महाविद्यालय में हिन्दी के प्राध्यापक होने के साथ-साथ साहित्यकार भी थे। वे एक प्रतिष्ठित ग़ज़लकार एवं छंद मनीषी के रूप में जाने जाते हैं।
चार भाई-बहनों में मालिनी मंझली हैं। माता-पिता दोनों के ही शिक्षक होने के कारण घर में शिक्षा और अनुशासन की खासी अहमियत थी। मालिनी जी बताती हैं- “मेरी माताजी अपने विवाह के समय मात्र आठवीं पास थीं, लेकिन पिताजी की मदद से उन्होंने उच्च शिक्षा प्राप्त की। पिताजी उन्हें केवल प्रोत्साहित ही नहीं करते थे, बल्कि घर की ज़िम्मेदारियों में भी हाथ बंटाते थे ताकि उन्हें पढ़ने का पर्याप्त समय मिल सके।” इस संदर्भ में वे अपने बचपन का एक विशेष दृश्य याद करती हैं। उस समय परिवार झाबुआ की प्रोफेसर्स कॉलोनी में रहता था। वे स्वयं पाँचवीं में, बड़ी बहन आठवीं में और बड़े भाई ग्यारहवीं में थे- तीनों बोर्ड परीक्षाओं की तैयारी कर रहे थे। उसी समय उनकी माँ स्नातकोत्तर परीक्षा की तैयारी कर रही थीं। बैठक कक्ष के तीन कोनों में तीन मेज-कुर्सियां लगी रहतीं, जहाँ तीनों भाई-बहन पढ़ते थे और बीच में रखे सोफ़े पर पिताजी माँ को पढ़ाया करते थे। यह दृश्य परिवार की अध्ययन-निष्ठा और पारस्परिक सहयोग का प्रतीक था।
मालिनी जी की स्कूल से लेकर कॉलेज तक की पढ़ाई झाबुआ में ही हुई। पहले रातीतलाई प्राथमिक शाला, फिर शासकीय कन्या विद्यालय और उसके बाद शहीद चंद्रशेखर शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय। वर्ष 1991 में उन्होंने बी. एससी. की डिग्री प्राप्त की। इस बीच उनकी बड़ी बहन का विवाह गुजरात के दाहोद शहर में हुआ जो झाबुआ से मात्र 45 किलोमीटर ही दूर था। बहन के ससुर संस्कृत के प्राध्यापक थे, एक बार उन्होंने बातचीत के दौरान सुझाव दिया कि गुजरात में अंग्रेज़ी विषय में व्यापक संभावनाएं हैं। यदि प्रथम श्रेणी से अंग्रेजी में स्नातकोत्तर कर लिया जाए तो गुजरात के किसी महाविद्यालय में नौकरी मिलना आसान हो सकता है। विज्ञान की छात्रा होने के बावजूद मालिनी जी ने विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन के अंग्रेज़ी डिपार्टमेंट में प्रवेश लिया और 1993 में प्रथम श्रेणी से स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त की। उस समय उनका स्पष्ट लक्ष्य था- प्रथम श्रेणी प्राप्त करना और गुजरात में अंग्रेज़ी की प्राध्यापक बनना।
परिणाम घोषित होने के बाद जनवरी 1994 के किसी दिन वे उज्जैन से अपनी मार्कशीट लेकर दोपहर की बस से झाबुआ लौटी ही थीं कि बहन के श्वसुर का फोन आया कि ‘आदिवासी आर्ट्स एंड कॉमर्स कॉलेज, संतरामपुर’ में दो रिक्तियां हैं, आवेदन कर दो। उसी दिन शाम पांच बजे की बस से वे गुजरात के दाहोद पहुँचीं। आवेदन के पंद्रहवें दिन अहमदाबाद में उनका साक्षात्कार हुआ और दो दिन बाद उन्होंने पदभार ग्रहण कर लिया। इस प्रकार परिणाम घोषित होने के मात्र बीस दिन बाद, बाईस वर्ष की आयु में, मालिनी गौतम प्राध्यापक बन गईं। महाविद्यालय में अध्यापन के प्रारंभिक दिनों में उन्हें अनेक रोचक अनुभव हुए। उनकी कम आयु देखकर छात्र आश्चर्यचकित हो जाते थे। शुरुआत में उन्हें गुजराती बोलना आती नहीं थी| लड़कों का एक समूह हर कक्षा में जाकर बैठ जाता। एक दिन उन्होंने पूछा- “किस वर्ष के छात्र हो? हर कक्षा में क्यों दिखाई देते हो?” उनमें से एक छात्र ने बड़े सहज भाव से उत्तर दिया- “मैडम! तुम बोलती हो तो गमता (अच्छा लगता) है।”
यह उत्तर भले ही मासूम था, पर इसके बाद मालिनी जी ने अपनी वेशभूषा और संवाद शैली में ऐसा परिवर्तन किया जिससे वे अधिक परिपक्व दिखाई दें। वे छात्रों को संबोधित करते हुए कहने लगीं- “बेटा, आपने नोट्स बना लिए?” “बच्चों, आज हम अमुक कवि की कविता पढ़ेंगे।”
संतरामपुर का क्षेत्र आदिवासी और अपेक्षाकृत पिछड़ा था। अधिकांश छात्र न हिंदी जानते थे, न अंग्रेज़ी। महाविद्यालयीन वातावरण में सहज अनुकूलन के लिए मालिनी जी ने गुजराती सीखना शुरू किया और केवल छह महीनों में ही उन्होंने गुजराती में बोलना-लिखना-पढ़ना सीख लिया। यह उनके अध्यापन के प्रति समर्पण और विद्यार्थियों से संवाद स्थापित करने की प्रतिबद्धता का प्रमाण था। मालिनी जी याद करती हैं
“संतरामपुर पिछड़ा हुआ आदिवासी इलाका था। महाविद्यालय के नब्बे प्रतिशत विद्यार्थी गांव से आनेवाले आदिवासी बच्चे थे। वे न हिन्दी जानते थे, न अंग्रेज़ी। उन्हें अंग्रेजी पढ़ाने के लिए एक सहायक भाषा का उपयोग करना पड़ता था| शुरुआत में मैं हिन्दी का उपयोग करती थी, लेकिन बाद में गुजराती का उपयोग करने लगी और इस तरह बच्चों से नज़दीकियाँ बढ़ने लगीं। उस दौरान कई स्तरों पर चुनौतियाँ आईं, जो धीरे-धीरे दूर होती चली गईं।”
इन चुनौतियों के बीच एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया समानांतर चल रही थी- अध्ययन का विस्तार। पिता की साहित्यिक विरासत के कारण बचपन से ही उन्हें हिन्दी साहित्य पढ़ने का अवसर मिला। स्नातकोत्तर के दौरान अंग्रेज़ी साहित्य से उनका परिचय हुआ। गुजराती सीखने के बाद उन्होंने गुजराती साहित्य का भी गंभीर अध्ययन प्रारंभ किया। हिन्दी, अंग्रेज़ी और गुजराती- तीनों भाषाओं के साहित्य से यह गहन संवाद अनजाने में उनके भविष्य की रचनात्मक भूमि तैयार कर रहा था।
संतरामपुर कॉलेज में ही उनकी मुलाकात गुजराती के प्राध्यापक श्री नितिन पंड्या से हुई। विचारों की निकटता ने आत्मीयता का रूप लिया और दोनों ने जीवन-साथी बनने का निर्णय किया। वर्ष 1995 में पारिवारिक सहमति से उनका विवाह हुआ। वर्ष 1997 में उनके बड़े पुत्र मुक्तक का जन्म हुआ। उसी वर्ष श्री पंड्या का तबादला संतरामपुर से लगभग 70 किलोमीटर दूर दूसरे कॉलेज में हो गया। घर और कॉलेज - दोनों की अधिकांश ज़िम्मेदारियाँ मालिनी जी के कंधों पर आ गईं, मगर व्यस्तताओं के बावजूद उनका अध्ययन निरंतर जारी रहा। वर्ष 2003 में उन्होंने देवी अहिल्या यूनिवर्सिटी इंदौर में पीएच.डी. के लिए पंजीयन कराया और वर्ष 2006 में अपना शोध कार्य “Elements of Indianness in the Novels of Kamala Markandeya” विषय पर पूर्ण किया।
साहित्य से जुड़ाव : लेखनी का अंकुरण
मालिनी जी के पिता अक्सर अफ़सोस जताते थे कि उनके बच्चों में कोई भी उनकी साहित्यिक परंपरा को आगे बढ़ाने वाला नहीं है। किंतु वर्ष 2009 में परिस्थिति बदली। उनके दूसरे पुत्र व्यापक के जन्म के बाद मातृत्व अवकाश के दौरान उन्हें पढ़ने और आत्मचिंतन करने का पर्याप्त समय मिला। इसी दौरान उनके भीतर दबा हुआ रचनात्मक बीज अंकुरित हुआ। यही वह समय था जब उन्होंने अपनी पहली ग़ज़ल पिता को पढ़ने के लिए दी। पिता ने उनके प्रयास को सराहा और उन्हें अरूज की जानकारी दी, रदीफ़-काफ़िया के नियम समझाए। इस मार्गदर्शन ने उन्हें विधागत अनुशासन के साथ लिखने की दिशा दी। धीरे-धीरे उनके कदम साहित्य-सृजन की ओर बढ़ने लगे।
इसी दौरान गुजराती साहित्य पढ़ते हुए यदि कोई कहानी उन्हें विशेष रूप से प्रभावित करती, तो वे उसका हिंदी में अनुवाद कर लेतीं। उनके मन में बस एक सहज इच्छा होती कि यह सुंदर कहानी हिंदी पाठकों तक पहुँचे। आगे चलकर उन्होंने इन अनुवादों को साहित्यिक पत्रिकाओं में भेजना शुरू किया और वे प्रकाशित भी होने लगे। समानांतर रूप से वे ग़ज़ल लेखन भी कर रही थीं। इस समय उन्होंने हिंदी के समकालीन कवियों राजेश जोशी, लीलाधर जगूड़ी, मंगलेश डबराल, उदय प्रकाश, अनामिका और कात्यायनी और कुमार अंबुज आदि को पढ़ना शुरू किया। धीरे-धीरे उनका रुझान मुक्त छंद की ओर बढ़ने लगा। जिन भावों को छंदबद्ध करने में कठिनाई होती उन्हें वे मुक्त छंद में अभिव्यक्त करने लगीं। एक दिन उनके पिता ने कहा- “तुम मुक्त छंद में अधिक बेहतर लिखती हो। ज़रूरी नहीं कि मैं ग़ज़ल लिखता हूँ तो तुम भी वही लिखो।”
पिता के इस प्रोत्साहन ने उन्हें आत्मविश्वास दिया और उन्होंने अपनी स्वाभाविक अभिव्यक्ति को स्वीकार किया। यद्यपि उनकी इच्छा थी कि पहले उनका ग़ज़ल संग्रह प्रकाशित हो, किंतु उनका प्रथम मुक्त छंद काव्य-संग्रह ‘बूँद-बूँद अहसास’ वर्ष 2013 में अयन प्रकाशन से प्रकाशित हुआ, जिसके लिए उन्हें गुजरात राज्य, हिन्दी साहित्य अकादमी से अनुदान प्राप्त हुआ था। इसके बाद 2014 में भोपाल के पहले-पहल प्रकाशन से उनका ग़ज़ल संग्रह “दर्द का कारवाँ” प्रकाशित हुआ।
वर्ष 2015 में उनकी कविताओं की पांडुलिपि ‘एक नदी जामुनी-सी’ को दिल्ली का प्रतिष्ठित ‘परंपरा ऋतुराज सम्मान’ प्राप्त हुआ। दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में आयोजित एक भव्य सम्मान समारोह में उन्हें यह सम्मान प्राप्त हुआ, साथ ही अशोक चक्रधर, गोपालदास नीरज और राजेश रेड्डी जैसे प्रतिष्ठित रचनाकारों के साथ मंच साझा करने तथा काव्य-पाठ का अवसर मिला, जो उनके लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि थी। वर्ष 2016 में ‘एक नदी जामुनी सी’ किताब की शक्ल में बोधि प्रकाशन जयपुर से प्रकाशित हुई और अत्यंत सराही गई। इस संग्रह के बाद पाठकों ने उन्हें स्नेहपूर्वक ‘जामुनी लड़की’ कहना शुरू कर दिया। वर्ष 2022 में उनका अगला काव्य-संग्रह ‘चुप्पी वाले दिन’ भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित हुआ। इस बीच एक नवगीत संग्रह भी प्रकाशित हुआ लेकिन इन पाँच बरसों में मालिनी जी की लेखन यात्रा एक अलग पड़ाव पर जा पहुँची।
वर्ष 2022 में उनकी एक महत्वपूर्ण अनुवाद कृति ‘गुजराती दलित कविता प्रकाशित हुई। इस पुस्तक के प्रकाशन के पीछे एक प्रेरक प्रसंग जुड़ा है। भोपाल से प्रकाशित विश्व कविता की पत्रिका सदानीरा के संपादक आग्नेय जी ने उनसे कुछ गुजराती कविताओं के अनुवाद भेजने का आग्रह किया। उस समय तक वे मुख्यतः कहानियों का अनुवाद करती थीं, पर आग्नेय जी के अनुरोध स्वीकार करते हुए उन्होंने गुजराती के प्रतिष्ठित दलित कवि नीरज पटेल की कुछ कविताओं के हिंदी अनुवाद किए। इन कविताओं की अनुगूँज उनके मन-मस्तिष्क में देर तक बनी रही। इसके बाद उनमें दलित साहित्य पढ़ने की गहरी रुचि जागी और वे उसे खोज-खोजकर पढ़ने लगीं। दलितों के उत्पीड़न और सामाजिक यथार्थ ने उन्हें भीतर तक उद्वेलित किया। इसी प्रेरणा से उन्होंने अनेक कवियों की कविताओं का हिंदी अनुवाद किया और उन्हें सोशल मीडिया पर साझा करना प्रारंभ किया, जिन्हें व्यापक सराहना मिली।
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आगे चलकर इन अनुवादित कविताओं का पुस्तकाकार प्रकाशन साहित्य अकादमी ( दिल्ली) द्वारा किया गया। इस पुस्तक को खूब सराहा गया। इस पर कई समीक्षाएँ प्राप्त हुईं और टाइम्स ऑफ इंडिया ने भी उनके इस प्रयास को संज्ञान में लिया। इन सभी उपलब्धियों के बीच मालिनी जी के मन में एक बात लगातार बनी रही कि उन्होंने हिन्दी साहित्य का अध्ययन उस क्रमबद्ध और व्यापक रूप में नहीं किया था, जैसा हिन्दी में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त करने वाला कोई विद्यार्थी करता है। यद्यपि वे सतत पढ़ती रहीं, लिखती रहीं और साहित्यिक जगत में सक्रिय रहीं, फिर भी उनके भीतर यह आकांक्षा थी कि हिन्दी साहित्य का विधिवत एवं शैक्षणिक अध्ययन किया जाए।
अपने इसी आत्म संकल्प के चलते वर्ष 2021 में उन्होंने बाबासाहेब आंबेडकर ओपन यूनिवर्सिटी में हिन्दी विषय से प्रवेश लिया। नियमित अध्ययन और समर्पण के साथ उन्होंने पाठ्यक्रम पूरा किया तथा अगस्त 2022 में विशेष योग्यता के साथ एम.ए. (हिन्दी) की उपाधि प्राप्त की। यह उपलब्धि केवल एक शैक्षणिक डिग्री भर नहीं थी, बल्कि अपने भीतर की उस अधूरी इच्छा को पूर्ण करने का संतोष भी थी, जिसने उन्हें निरंतर सीखते रहने की प्रेरणा दी।
लेखन की ओर मालिनी जी का मुड़ना अप्रत्याशित नहीं था, किंतु यह परिवर्तन सहज भी नहीं था। कॉलेज और घर की जिम्मेदारियों के साथ-साथ साहित्यिक गतिविधियाँ, विभिन्न आयोजनों में भागीदारी, पाठकों के पत्र, संवाद जीवन में नया स्थान बनाने लगे। प्रारंभ में जब उन्हें अंतर्देशीय या पोस्टकार्ड पर पाठकों के पत्र मिलने लगे, तो वे उन्हें पढ़कर नष्ट कर देती थीं। उन्हें आशंका रहती थी कि परिवार इन पत्रों को लेकर कैसी प्रतिक्रिया देगा। एक दिन यह बात उनके बड़े पुत्र ने अपने नाना यानी मालिनी जी के पिता को बता दी। पिता ने उन्हें समझाया कि जीवन में आए इस परिवर्तन को स्वीकार करना चाहिए, प्रशंसकों के पत्रों का उत्तर देना चाहिए और उन्हें परिवार के साथ साझा भी करना चाहिए।
उसी दौरान मालिनी जी के पति ने अपने पिता से कहा कि “अब मालिनी लेखन के अलग रास्ते पर चल रही है। ये सब चीजें पहले नहीं थीं।” उनके ससुर ने उन्हें बड़े सहज भाव से कहा-“ यह तो अच्छी बात है| उसे वह करने दो जो उसे पसंद है और तुम वह करो जो तुम्हें पसंद है। वह एक समझदार है लड़की है, एक साथ बहुत कुछ सँभाल सकती है।” ससुर जी के इस समर्थन के बाद परिस्थितियाँ सहज होने लगीं। परिवार ने उनके लेखन को स्वीकार ही नहीं किया, बल्कि उसके लिए अनुकूल वातावरण भी दिया। मालिनी जी विनम्रतापूर्वक स्वीकार करती हैं कि आज वे जिस भी मुकाम पर हैं, वहाँ तक पहुँचने में उनके पिता, पति, पुत्रों और श्वसुर का अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान रहा है।
वर्तमान में मालिनी जी अपने परिवार के साथ संतरामपुर में निवास कर रही हैं। उनके बड़े पुत्र मुक्तक बेंगलुरु में सॉफ्टवेयर डेवलपर के रूप में कार्यरत हैं, जबकि छोटे पुत्र ग्यारहवीं कक्षा के छात्र हैं। साहित्य, अध्यापन और परिवार इन तीनों के संतुलन के साथ मालिनी गौतम का जीवन निरंतर सृजन और संवेदना की दिशा में आज भी अग्रसर है।
प्रकाशित कृतियाँ
• बूँद बूँद अहसास- 2013 (कविता-संग्रह, गुजरात साहित्य अकादमी के सहयोग से)
• दर्द का कारवाँ- 2014 (ग़ज़ल-संग्रह) पहले-पहल प्रकाशन
• एक नदी जामुनी-सी- 2016 (कविता-संग्रह) बोधि प्रकाशन
• चिल्लर सरीखे दिन- 2017 (नवगीत संग्रह) बोधि प्रकाशन
• चुप्पी वाले दिन-2022 (कविता-संग्रह) भारतीय ज्ञानपीठ, दिल्ली
• गुजराती दलित कविता -2022 (चयन, अनुवाद एवं संपादन)- साहित्य अकादमी दिल्ली
• चयनित कविताएँ-मालिनी गौतम-2023 (न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन दिल्ली)
• होने और न होने के बीच-2024(कविता-संग्रह) बोधि प्रकाशन
संपादन : हिन्दी के वरिष्ठ कवि राजेश्वर वशिष्ठ के कविता संग्रह “सुनो वाल्मिकी” के गुजराती अनुवाद का संपादन (साहित्य संगम प्रकाशन, सूरत, 2021)
प्रकाशन में -
• गुजराती युवा कविता (चयन, अनुवाद एवं संपादन- वेरा प्रकाशन)
• साहित्य और संस्कृति संवाद (आलोचना-न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन)
विशेष: गुजराती, अंग्रेजी, मराठी, मलयालम, उर्दू, नेपाली, पंजाबी, बांग्ला आदि भाषाओं में कविताओं के अनुवाद हुए हैं।
चर्चित कविता संग्रह “चुप्पी वाले दिन” का सुश्री बकुला घासवाला द्वारा किया गया गुजराती अनुवाद “चुप्प रहेवाना दिवसों” इस वक्त प्रकाशन में है।
पुरस्कार/सम्मान
• परम्परा ऋतुराज सम्मान-2015, दिल्ली
• गुजरात साहित्य अकादमी पुरस्कार-2016 (कविता संग्रह-एक नदी जामुनी-सी के लिए)
• गुजरात साहित्य अकादमी पुरस्कार-2017(नवगीत संग्रह -चिल्लर सरीखे दिन के लिए)
(4) मध्यप्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन द्वारा वागीश्वरी पुरस्कार-2018 ( नवगीत संग्रह -चिल्लर सरीखे दिन के लिए)
• जनकवि मुकुट बिहारी सरोज स्मृति सम्मान-2019, ग्वालियर
• राजस्थान प्रत्रिका समूह द्वारा सृजनात्मक साहित्य पुरस्कार-2021
• गुजरात साहित्य अकादमी पुरस्कार-2022 (कविता संग्रह-चुप्पी वाले दिन के लिए)
• गुजरात साहित्य अकादमी पुरस्कार-2022 (गुजराती दलित कविता अनुवाद के लिए)
• मध्यप्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन द्वारा सप्तपर्णी सम्मान-2023 (भारतीय भाषाओं से अनुवाद हेतु)
• अमर उजाला “भाषा बंधु” शब्द सम्मान-2023 (पुस्तक गुजराती दलित कविता -2022 (चयन, अनुवाद एवं संपादन)- साहित्य अकादमी दिल्ली, के लिए)
सन्दर्भ स्रोत : मालिनी गौतम से सारिका ठाकुर की बातचीत पर आधारित
© मीडियाटिक



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