राजस्थान हाईकोर्ट ने 13 वर्षों से अलग रह रहे दंपती के विवाह को समाप्त करते हुए महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। अदालत ने कहा कि इतने लंबे समय तक अलग रहने के बाद किसी को साथ रहने के लिए मजबूर करना मानसिक क्रूरता के बराबर है।
अपील मंजूर
जस्टिस अरुण मोंगा और जस्टिस सुनील बेनीवाल की खंडपीठ ने बीकानेर निवासी महिला की अपील को स्वीकार किया। साथ ही फैमिली कोर्ट के आदेश को आंशिक रूप से रद्द कर दिया गया।
विदेश में उत्पीड़न का आरोप
मामले के अनुसार, दोनों की शादी 2010 में हुई थी और उनका एक बेटा भी है। पत्नी ने आरोप लगाया कि पति शादी के बाद अमेरिका चला गया और दहेज के बाद ही उसे साथ रखा। वहां उसके साथ मारपीट और मानसिक उत्पीड़न हुआ।
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2013 से अलग रह रहा है दंपती
पत्नी वर्ष 2013 में बच्चे के साथ भारत लौट आई और तब से दोनों अलग रह रहे हैं। लंबे समय तक संबंध सुधारने के प्रयास भी सफल नहीं हो सके।
विदेशी तलाक डिक्री को मान्यता नहीं
पति ने 2015 में अमेरिका की अदालत से एकतरफा तलाक लेने की बात स्वीकार की। हालांकि हाईकोर्ट ने कहा कि इस विदेशी डिक्री को भारतीय कानून के तहत प्रमाणित नहीं किया गया, इसलिए इसे मान्यता नहीं दी जा सकती।
मानसिक क्रूरता का आधार बना लंबा अलगाव
अदालत ने माना कि पति द्वारा वर्षों तक दूरी बनाए रखना, पत्नी और बच्चे से संबंध सुधारने का प्रयास न करना मानसिक क्रूरता है। लंबे अलगाव और असफल सुलह प्रयास यह दर्शाते हैं कि रिश्ता पूरी तरह खत्म हो चुका है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि लंबे समय का अलगाव भी मानसिक क्रूरता का आधार बन सकता है। अदालत ने विवाह को समाप्त घोषित करते हुए कहा कि अब इस रिश्ते को बनाए रखना केवल औपचारिकता रह गया था। यह फैसला स्पष्ट करता है कि भारतीय न्याय व्यवस्था में रिश्तों की वास्तविक स्थिति को प्राथमिकता दी जाती है।



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