प्रियंका दुबे :   जिन्हें खोजी पत्रकारिता ने दिलाई अंतर्राष्ट्रीय पहचान

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प्रियंका दुबे :   जिन्हें खोजी पत्रकारिता ने दिलाई अंतर्राष्ट्रीय पहचान

छाया : स्व.संप्रेषित

• रुखसाना मिर्ज़ा

प्रियंका दुबे द्विभाषी पत्रकार हैं, अंग्रेज़ी और हिन्दी में समान अधिकार से रिपोर्टिंग करती हैं, साथ ही हिन्दी में कविताएं और कहानियां भी लिखती हैं। मूल रूप से भोपाल की प्रियंका तीन साल से इंदौर में रह रही हैं। दिल्ली में कई प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में काम करने के दौरान उन्होंने कई राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार हासिल किए हैं।

प्रियंका का जन्म 7 अगस्त को भोपाल में हुआ। उनके पिता श्री अवधेश कुमार दुबे  भारत हेवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड (बीएचईएल) में काम करते थे और उनकी माँ श्रीमती सीता दुबे गृहणी हैं। प्रियंका और उनके दोनों छोटे भाई अभिमन्यु और निशांत का बचपन भेल कॉलोनी में और स्कूली शिक्षा वहीँ के जवाहर विद्यालय से हुई। बचपन से ही प्रियंका की रुचि साहित्य और संस्कृति में थी। स्कूल-कॉलेज की पढ़ाई के दौरान भोपाल में मंचित होने वाले लगभग सभी नाटकों और अन्य साहित्यिक कार्यक्रमों में वे बतौर दर्शक मौजूद रहती थीं।

हालाँकि वे साइंस की विद्यार्थी थीं और उनके माता-पिता चाहते थे कि इंजीनियर बनें, महाविद्यालय   में उनका दाखिला भी हो गया था लेकिन उनके मन में कुछ और ही चल रहा था इसलिए इंजीनियरिंग के बजाय उन्होंने माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय में पत्रकारिता के स्नातक कोर्स में एडमिशन ले लिया। वहां से मास्टर्स भी किया और पढ़ाई के दौरान ही भोपाल में हिन्दुस्तान टाइम्स, पायोनियर आदि में काम भी करती रहीं। 2011 मास्टर्स डिग्री पूरी होने पर उन्हें पहली नौकरी हिन्दुस्तान टाइम्स के इंदौर संस्करण में मिली। इंदौर में कुछ महीने काम करने के बाद उन्हें तहलका में काम मिला और वे भोपाल लौटीं बतौर मप्र संवाददाता के रूप में। यहां करीब डेढ़ साल काम के दौरान उन्होंने खोजी पत्रकारिता शुरू की और कई महत्वपूर्ण स्टोरीज की जिनमें सामाजिक न्याय के मुद्दे, मानव तस्करी  - खास तौर पर बच्चों की तस्करी, महिलाओं के प्रति अपराध, मध्यप्रदेश में ड्रग ट्रायल आदि विषयों पर कई खोजपूर्ण रिपोर्ट्स कीं।

उनकी रिपोर्टिंग से प्रभावित हो कर तहलका डॉट कॉम के मैनेजमेंट ने उन्हें 2013 में दिल्ली बुला लिया बतौर स्पेशल इनवेस्टिगेटिव रिपोर्टर के पद पर। वे दिल्ली में नियुक्त थीं पर उनका कार्यक्षेत्र पूरा उत्तर और उत्तर पूर्व भारत था। उन्होंने मानव अधिकार, लापता बच्चों, महिलाओं, आदिवासियों पर अत्याचार,  जेंडर इश्यूज आदि पर कई खोजपरक स्टोरीज की। वे मध्यप्रदेश में बुंदेलखंड से लेकर उत्तर प्रदेश और असम के सुदूर इलाकों तक पहुंची। उनकी शानदार खोजी रिपोर्टिंग के आधार पर ही करियर के शुरुआती दो सालों में ही उन्हें प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया और रामनाथ गोयनका अवॉर्ड   मिला। २०१६ में वे कैरेवान पत्रिका से जुड़ीं और वहां भी कई बेहतरीन रिपोर्ट्स कीं।

बीबीसी में बाइलिंगुअल रिपोर्टर

प्रियंका ने 2017 से 2021 तक बीबीसी में बाइलिंगुअल रिर्पोटर के रूप में काम किया। यहां वे हिन्दी और अंग्रेजी दोनों में काम करती थी साथ ही मल्टी मीडिया रिपोर्टर भी थीं क्योंकि वे बीबीसी रेडियो, टीवी और वेबसाइट तीनों माध्यमों में काम कर रही थीं। बीबीसी में उन्होंने महिलाओं, बच्चों के विषयों के साथ साथ स्वास्थ्य से संबंधित विषयों पर और चुनाव के दौरान राजनीतिक रिपोर्टिंग भी की।

इसी बीच 2019 में उन्होंने अपने रिपोर्टिंग के अनुभवों के आधार पर एक किताब भी लिखी- 'नो नेशन फॉर वीमेन'। यह किताब काफी चर्चित प्रशंसित रही। बेहद व्यस्त दिनचर्या के बीच वे कविताएं और कहानियां भी लिखती रहीं जो हिन्दी की सभी बड़ी साहित्यिक पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहीं।

मन की शांति और उपन्यास

लगातार काम के बोझ के कारण मन की शांति और कुछ सृजनात्मक लेखन की चाह की वजह से प्रियंका ने 2021 में बीबीसी की नौकरी छोड़ कर शिमला जाने का निर्णय लिया। हालांकि संस्थान चाहता था कि प्रियंका नौकरी न छोड़ें भले ही लंबी छुट्टी ले लें। शिमला में रहकर उन्होंने कहानियां तो लिखीं ही साथ ही एक उपन्यास पर भी काम शुरु कर दिया। इस दौरान उनकी कहानियां, कविताएं, आलोचना और समीक्षाएँ कथादेश, तद्भव, सदानीरा, समालोचना आदि साहित्यिक पत्रिकाओं, इंडियन एक्सप्रेस और स्क्रोल में छपती रहीं। 2023 में इंदौर के कवि- उपन्यासकार अम्बर पांडे से उनका विवाह हुआ और तब से वे इंदौर में हैं। फिलहाल प्रियंका ने सक्रिय पत्रकारिता से अवकाश ले रखा है ताकि अपना पहला उपन्यास पूरा कर सकें।

पुरस्कार - सम्मान

• इंडियन एक्सप्रेस फाउंडेशन का  रामनाथ गोयनका पुरस्कार  (2011)

• प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया का राजा राममोहन राय अवॉर्ड (2012)

• मुंबई प्रेस क्लब का रेड इंक अवॉर्ड (2013)

• कर्ट शॉर्क मेमोरियल फंड वाशिंगटन द्वारा कर्ट शॉर्क अवॉर्ड फॉर इंटरनेशनल जर्नलिज्म (2014)

• एशिया का पुलित्जर माना जाने वाला आईसीएफजे का नाइट इंटरनेशनल जर्नलिज्म अवार्ड (2015)

• स्त्री मुद्दों पर सतत काम के लिए तीन बार 2012 -13 और 2016 में लाडली मीडिया पुरस्कार

• मीडिया फाउंडेशन का चमेली देवी जैन पुरस्कार (2019)

 

 

सन्दर्भ स्रोत :  प्रियंका दुबे से  रुखसाना मिर्ज़ा  की बातचीत पर आधारित 

© मीडियाटिक

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