शिवपुरी जिले के पिछोर विकासखंड के नांगली गांव की महिलाओं ने सामाजिक बंधनों को तोड़ते हुए आत्मनिर्भरता की नई मिसाल कायम की है। घूंघट और घरेलू जिम्मेदारियों तक सीमित मानी जाने वाली इन महिलाओं ने जैविक खाद निर्माण के क्षेत्र में पहचान बनाई है और अब वे अच्छी आय अर्जित कर रही हैं।
चुनौतियों के बीच नहीं टूटा हौसला
शुरुआत में घर से बाहर निकलने पर सामाजिक ताने और पारिवारिक संकोच जैसी कई बाधाएं सामने आईं। लेकिन मेहनत, धैर्य और आत्मविश्वास के बल पर महिलाओं ने हार नहीं मानी। आज वही परिवार और समाज उनकी सफलता पर गर्व महसूस कर रहा है।
ग्रामीण आजीविका मिशन से मिला सहारा
महिलाएं राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन ( National Rural Livelihood Mission -एनआरएलएम) से जुड़कर प्रशिक्षण प्राप्त कर रही हैं। इस योजना के तहत उन्हें जैविक खाद बनाने की तकनीक सिखाई गई, जिससे उन्होंने समूह बनाकर उत्पादन शुरू किया।
महिलाओं द्वारा तैयार की जा रही वर्मी कम्पोस्ट खाद पूरी तरह ऑर्गेनिक विधि से बनाई जाती है। इसमें किसी भी प्रकार के रासायनिक कीटनाशक या दवाओं का उपयोग नहीं किया जाता। किसानों का कहना है कि इस खाद के उपयोग से मिट्टी की उर्वरक क्षमता बढ़ रही है और फसलों की गुणवत्ता व उत्पादन में सुधार देखा गया है।
मात्र ₹15 प्रति किलो में उपलब्ध
बाजार में मिलने वाली रासायनिक खाद, खासकर DAP, महंगी पड़ती है और लंबे समय में मिट्टी की सेहत को नुकसान पहुंचाती है। इसके मुकाबले महिलाओं की तैयार जैविक खाद लगभग ₹15 प्रति किलो की दर से उपलब्ध है। इससे किसानों की लागत घट रही है और पर्यावरण भी सुरक्षित रह रहा है।
घर बैठे ₹8 से ₹10 हजार तक मासिक आय
महिलाओं ने बताया कि वे घरेलू कार्यों के साथ-साथ खाद निर्माण का काम करती हैं। कई महिलाओं की मासिक आय ₹8,000 से ₹10,000 तक पहुंच गई है। अब उन्हें बाहर नौकरी करने की जरूरत नहीं पड़ती। इससे वे आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनी हैं और परिवार की स्थिति भी मजबूत हुई है।
अन्य महिलाओं के लिए बनीं प्रेरणा
नांगली गांव की यह पहल ग्रामीण महिलाओं के लिए प्रेरणास्रोत बन रही है। जैविक खेती को बढ़ावा देने के साथ-साथ ये महिलाएं पर्यावरण संरक्षण और सतत कृषि की दिशा में भी महत्वपूर्ण योगदान दे रही हैं।
सन्दर्भ स्रोत/छाया : न्यूज 18
सम्पादन : मीडियाटिक डेस्क



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