इंदौर। महू के नजदीक स्थित ‘संवेदना स्पेशल स्कूल’ एक ऐसा संस्थान बन चुका है, जो 52 मानसिक दिव्यांग बच्चों के लिए शिक्षा, प्रशिक्षण और देखभाल का केंद्र है। इस स्कूल में बच्चों को न केवल पढ़ाया जाता है, बल्कि उन्हें जीवन की आवश्यक गतिविधियाँ सिखाने के साथ-साथ आत्मनिर्भर बनाने की भी कोशिश की जाती है। यहाँ 17 बच्चे वेटिंग लिस्ट पर हैं, लेकिन संसाधन सीमित होने के बावजूद स्कूल का उद्देश्य बहुत बड़ा है। यह स्कूल एक संघर्ष की कहानी है, जो एक साधारण गृहिणी के सपनों और संघर्षों से जुड़ी है। ‘संवेदना स्पेशल स्कूल’ की शुरुआत 2 बच्चों से हुई थी, लेकिन यह सफर न केवल संघर्ष बल्कि भावनात्मक बल और समाज सेवा के जज्बे से भरा हुआ है।
संस्था की शुरुआत और प्रेरणा
निशा धीरज शर्मा, जो पहले एक घरेलू महिला थीं ने कभी भी समाज सेवा का सोचा नहीं था। 1997 में बेटे के जन्म के बाद सब कुछ सामान्य था, लेकिन 2002 में उनके छोटे बेटे को अचानक बुखार आया और वह बेहोश हो गया। इलाज के दौरान यह पता चला कि उनका बेटा अब सामान्य नहीं रहेगा और वह विशेष बच्चा बन चुका था। इसके बाद कई महीनों तक विभिन्न अस्पतालों में इलाज कराया गया, लेकिन कोई सुधार नहीं हुआ। इसके बाद निशा ने अपने बेटे को अपने जीवन का उद्देश्य मानते हुए उसकी देखभाल करना शुरू किया। इस सेवा में बड़े बेटे और पति का भी सहयोग रहा। समय के साथ उन्होंने विशेष बच्चों के लिए बनाये गए स्कूलों से संपर्क किया और यह समझा कि इन बच्चों के लिए शिक्षा और प्रशिक्षण कितना महत्वपूर्ण है। खुद की पढ़ाई को फिर से शुरू करते हुए निशा ने एमफिल और बी.एड की डिग्री प्रथम स्थान के साथ हासिल की।
संवेदना स्कूल की स्थापना
2005 में महू में ‘संवेदना स्कूल’ की स्थापना की गई। शुरुआत में यह स्कूल केवल 2 बच्चों के लिए था, लेकिन निशा ने अपने बेटे के साथ-साथ अन्य विशेष बच्चों के लिए भी प्रशिक्षण देने का संकल्प लिया। धीरे-धीरे स्कूल के प्रति लोगों का भरोसा बढ़ा और बच्चों की संख्या भी बढ़ने लगी। निशा ने बताया कि इस स्कूल में 12 लोग काम करते हैं, जो बच्चों को निशुल्क प्रशिक्षण देते हैं। साथ ही, बच्चों को एक समय का निःशुल्क भोजन भी दिया जाता है। स्कूल का संचालन सामाजिक न्याय विभाग, छावनी परिषद महू और दानदाताओं के सहयोग से किया जाता है।
समर्पित शिक्षा और अनुकूल प्रशिक्षण
संवेदना स्कूल में बच्चों को उनकी विशेषताओं के आधार पर सिखाया जाता है। चाहे वह बोलने में कठिनाई हो या दैनिक जीवन की गतिविधियों में परेशानी, प्रत्येक बच्चे के लिए अलग-अलग तरीका अपनाया जाता है। अभिभावकों का कहना है कि यहां आने के बाद उनके बच्चों में सकारात्मक बदलाव दिखाई देता है।
कठिन समय और पुनः संकल्प
31 दिसंबर 2012 को निशा के दूसरे बेटे का भी निधन हो गया। इस दुखद घटना के बाद वह अपने सेवा कार्य को रोकने की सोच रही थीं, लेकिन अभिभावकों और अधिकारियों ने उन्हें समझाया कि यह कार्य केवल उनके बेटे के लिए नहीं बल्कि दर्जनों अन्य परिवारों के लिए भी महत्वपूर्ण है। इस समझाइश के बाद, निशा ने फिर से सेवा कार्य शुरू किया, और आज यह स्कूल महू और आसपास के क्षेत्रों में एक जाना-पहचाना नाम बन चुका है।
अभिभावकों का विश्वास
संवेदना स्कूल ने अपनी शिक्षा और समर्पण से न केवल बच्चों की जिंदगी में बदलाव किया है, बल्कि अभिभावकों को भी यह भरोसा दिलाया है कि उनके बच्चों को यहां अपनापन और सम्मान मिलेगा। संवेदना स्कूल आज भी समाज में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है, जो विशेष बच्चों को उनके अधिकार और सम्मान प्रदान करता है, साथ ही उन्हें आत्मनिर्भर बनाने के लिए हर संभव प्रयास करता है।
सन्दर्भ स्रोत एवं छाया : निशा शर्मा के फेसबुक अकाउंट से
संपादन : मीडियाटिक डेस्क



Comments
Leave A reply
Your email address will not be published. Required fields are marked *