छाया : स्व संप्रेषित
• सीमा चौबे
इंदौर। अंजना सक्सेना संत कबीर की वाणी को अपनी आवाज के जरिए जन-जन तक पहुंचाने वाली ऐसी गायिका हैं, जिन्होंने मालवा और निमाड़ अंचल में अपनी एक अलग पहचान बनाई है। संगीत में उनकी शुरुआत यूं तो कथक सीखने से हुई थी, लेकिन नियति को कुछ और मंजूर था... आज उनकी असली पहचान उनका गायन बन चुकी है।
शास्त्रीय संगीत की गहराई और कबीर वाणी की सादगी को साथ लेकर चलने वाली अंजना सिर्फ मंचीय कलाकार नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना की वाहक भी हैं। गांव-गांव जाकर कबीर गाने से लेकर बस्तियों के बच्चों को निशुल्क संगीत सिखाने तक उनका सफर संघर्ष, प्रेरणा और साधना से भरा रहा है।
परिवार से विरासत में मिला संगीत
5 अप्रैल 1968 को नर्मदापुरम (होशंगाबाद) में श्रीमती शकुंतला देवी सक्सेना और श्री कैलाश नारायण सक्सेना के घर जन्मी अंजना को संगीत और साहित्य से सुरभित वातावरण अपने परिवार से विरासत में मिला।
अंजना के पिता मध्यप्रदेश पीडब्ल्यूडी विभाग में कार्यरत थे और एई पद से सेवानिवृत्त हुए। उनकी मां गृहिणी थीं, लेकिन संगीत में गहरी रुचि रखती थीं। वे बुंदेलखंडी लोकगीत गाती थीं और ढोलक भी बेहद मधुर बजाती थीं। वहीं दादाजी हारमोनियम बजाते थे और प्रतिदिन संतवाणी गाया करते थे।
बचपन से घर में मिले इसी संगीत वातावरण ने उनके भीतर संगीत का बीज बो दिया। परिवार में पांच भाई-बहन थे, लेकिन कम उम्र में भाई का निधन हो गया। चार बहनों में केवल अंजना की ही रुचि संगीत में रही।
बचपन से हर क्षेत्र में आगे रहीं अंजना
पिता की नौकरी के कारण उनकी पढ़ाई मध्यप्रदेश के अलग-अलग शहरों में हुई। बचपन अजयगढ़ और गढ़ी मलहरा में बीता, जहां उन्होंने सरस्वती शिशु मंदिर में पढ़ाई की। वे पढ़ाई के साथ खेलकूद, नृत्य और सांस्कृतिक गतिविधियों में भी हमेशा आगे रहीं।
उन्होंने स्कूल में एनसीसी ज्वाइन किया और खो-खो में स्टेट लेवल तक खेला। मात्र आठ साल की उम्र में पन्ना में उन्हें संगीत विद्यालय मिला, जहां से उनके संगीत सफर की शुरुआत हुई।
कथक सीखने गईं लेकिन गायन ने बना दी पहचान
पन्ना में उन्होंने कथक सीखना शुरू किया, लेकिन वहां के शिक्षकों ने उनकी आवाज पहचान ली। शिक्षकों ने उनके पिता से कहा कि अंजना को गायन में आगे बढ़ाना चाहिए। इसके बाद चौरसिया सर ने पांच साल तक घर आकर उन्हें गायन की बारीकियां सिखाईं।
हालांकि बाद में पिता का तबादला भिंड हो गया, जहां लड़कियों के प्रति रूढ़िवादी सोच के कारण संगीत कुछ समय के लिए छूट गया। भिंड के सरकारी कॉलेज से उन्होंने बीएससी की पढ़ाई पूरी की।
शादी और गृहस्थी के बीच संगीत से रिश्ता
ग्वालियर में कुछ समय रहने के बाद वर्ष 1992 में उनकी शादी देवास निवासी इंजीनियर श्री सचिन सक्सेना से हुई, जो भवन निर्माण व्यवसाय से जुड़े थे। वर्ष 1999 में परिवार इंदौर आ गया। इसी दौरान वे दो बच्चों की मां भी बनीं, लेकिन घर-गृहस्थी की जिम्मेदारियों के बीच भी उनका मन संगीत में ही लगा रहता था।
उनके पति ने हमेशा उन्हें प्रोत्साहित किया और संगीत सीखने के लिए प्रेरित किया। बच्चों के स्कूल जाने के बाद उन्होंने फिर से संगीत की शिक्षा शुरू की। उन्होंने मोहन मूंगरे जी से विधिवत संगीत सीखा और संगीत विशारद की डिग्री हासिल की। साथ ही कंठ संगीत (vocal) और हिंदी विषय में एमए भी किया। बाद में आकाशवाणी इंदौर के निदेशक स्वतंत्र कुमार ओझा से सुगम संगीत का प्रशिक्षण लिया और रमाकांत दुबे से शास्त्रीय संगीत सीखा।
कबीर वाणी ने बदल दी जिंदगी
अंजना पहले फिल्मी भजन और गजल गाती थीं, लेकिन तबला वादक महेश यादव से मुलाकात के बाद उनका रुझान संतवाणी की ओर बढ़ा। महेश यादव के परिवार का जुड़ाव कबीर गायन से था। उनके पिता तेजूलाल यादव और मामा प्रहलाद सिंह टिपानिया कबीर वाणी के प्रसिद्ध गायक रहे हैं।
अंजना बताती हैं कि जब उन्होंने आबिदा परवीन और प्रहलाद सिंह टिपानिया को सुना, तो महसूस हुआ कि संगीत केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज को दिशा देने का माध्यम भी हो सकता है। भले ही उन्होंने शास्त्रीय संगीत की विधिवत शिक्षा हासिल की, लेकिन भक्ति संगीत और संतवाणी ने हमेशा उनके मन को सबसे अधिक आकर्षित किया।
अनेक प्रस्तुतियों और मंचीय अनुभवों के बाद उन्हें कबीर गायन में वह आत्मिक संतोष मिला, जिसकी तलाश उन्हें वर्षों से थी। वे कहती हैं कि कबीर के शब्दों ने उनके जीवन को बदल दिया। कबीर की सामाजिक चेतना, मानवता और कुरीतियों के खिलाफ विचारों ने उन्हें भीतर तक प्रभावित किया।
गांव-गांव जाकर गाई कबीर वाणी
शुरुआती दौर में उन्होंने छोटे-छोटे गांवों में जाकर कबीर वाणी गाई। मालवा-निमाड़ में जहां स्थानीय बोली में कबीर गायन अधिक प्रचलित था, वहीं अंजना ने हिंदी में अपनी अलग शैली विकसित की, ताकि आम लोग कबीर के शब्दों को आसानी से समझ सकें। वे मानती हैं कि संगीत तभी सार्थक है, जब लोग उसके भाव को समझ सकें। यही वजह है कि उन्होंने शास्त्रीयता और सरलता के बीच संतुलन बनाकर गायन किया।
मोहनखेड़ा से शुरू हुई कबीर गायन यात्रा
उनकी कबीर गायन यात्रा मोहनखेड़ा-राजगढ़, जिला धार में पद्मश्री प्रहलाद सिंह टिपानिया के साथ प्रारंभ हुई। यहीं से उनके जीवन में संगीत और कबीर के विचारों के प्रति गहरी आस्था और जुड़ाव बना। 2012 से 2014 तक उन्होंने विभिन्न सांस्कृतिक और साहित्यिक मंचों पर अपनी गायकी से एक अलग पहचान बनाई। इस दौरान उन्होंने अपनी गायकी और कबीर के विचारों को फैलाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए।
प्रहलाद सिंह टिपानिया के साथ पहली प्रस्तुति बनी यादगार
मोहनखेड़ा में उनकी पहली बड़ी प्रस्तुति पद्मश्री प्रहलाद सिंह टिपानिया के साथ हुई। अंजना बताती हैं कि उस समय तक वे प्रहलाद जी से कभी नहीं मिली थीं। कार्यक्रम में जब उन्होंने मीरा के पद गाए, तो टिपानिया जी ने उनकी जमकर तारीफ की और उनका हौसला बढ़ाया। वे आज भी उन्हें अपनी प्रेरणा मानती हैं।
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कबीर गायन को बनाया सामाजिक बदलाव का माध्यम
अंजना मानती हैं कि संत कबीर केवल आध्यात्मिक कवि नहीं, बल्कि सामाजिक क्रांतिकारी भी थे। वे अपने गायन में सामाजिक कुरीतियों, मानवता और समानता के संदेश को प्रमुखता देती हैं। वे कहती हैं कि एक कार्यक्रम में उन्हें यह तक सुनना पड़ा कि “ऊंची जाति की महिला कबीर क्यों गाएगी”, लेकिन उन्होंने इसका जवाब शब्दों से नहीं, बल्कि उनके गायन और तालियों की गूंज ने सबको जवाब दे दिया।
बस्तियों के बच्चों के लिए शुरू किया मोबाइल म्यूजिक स्कूल
वर्ष 2014 में अंजना और महेश यादव ने मिलकर ‘स्वरांगिनी जन विकास समिति’ की स्थापना की। इसी के तहत ‘मोबाइल म्यूजिक स्कूल’ शुरू किया गया। संस्था का उद्देश्य संत कबीर की वाणी को जन-जन तक पहुंचाना और बच्चों व युवाओं को संत संस्कृति से जोड़ना था।
संस्था के माध्यम से उन्होंने संगीत शिक्षा के साथ-साथ सामाजिक कार्यों की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए। स्वरांगिनी संगीत अकादमी में वे बच्चों को निःशुल्क संगीत शिक्षा देती हैं और कबीर के विचारों का प्रसार करती हैं।
शुरुआत में अंजना अपनी कार में संगीत के वाद्ययंत्र रखकर बस्तियों में जातीं और गरीब बच्चों को निशुल्क संगीत सिखातीं। इन बच्चों को मंच भी दिया गया और उनके साथ कबीर वाणी के कार्यक्रम आयोजित किए गए।
उनकी कार्यशैली में संगीत और सामाजिक कार्यों का अद्भुत संगम है। 2014 से वे तलावली चांदा के सरकारी स्कूल में बच्चों को संगीत सिखा रही हैं। उन्हीं बच्चों में से एक छात्र ने बाद में यूट्यूब चैनल बनाकर तबला और गायन को अपना करियर बनाया।
स्वरांगिनी संस्था हर वर्ष कबीर उत्सव ‘वह आज भी जागता है’ का आयोजन करती है, जिसमें संत कबीर के विचारों का प्रचार-प्रसार किया जाता है। इस उत्सव में मलिन बस्तियों के बच्चों को मंच पर प्रस्तुति का अवसर दिया जाता है, साथ ही देशभर के कलाकार भी अपनी प्रस्तुतियाँ देते हैं। यह आयोजन संत कबीर की वाणी को जीवित रखने और समाज में जागरूकता फैलाने का एक बड़ा माध्यम बन चुका है।
महेश यादव के निधन के बाद भी नहीं रुका सफर
वर्ष 2021 में महेश यादव के निधन के बाद अंजना कुछ समय के लिए हताश हो गईं, लेकिन पति और बच्चों के सहयोग ने उन्हें संभाला। उन्होंने फिर से संस्था और संगीत यात्रा को आगे बढ़ाया। अंजना जी ने संस्था की कार्यकारिणी समिति के साथ मिलकर संस्था के कार्यों का संचालन शुरू किया।
वे आज भी ‘वह जागता है’ कार्यक्रम के जरिए कबीर वाणी को लोगों तक पहुंचा रही हैं। यह कार्यक्रम वृद्धाश्रम, स्कूलों और सामाजिक मंचों पर आयोजित किया जाता है।
अंजना जी ने कबीर के विचारों का प्रसार करते हुए 8-10 किलोमीटर की पैदल यात्रा की है, ताकि अधिक से अधिक लोग संत कबीर के संदेश से अवगत हो सकें।
स्वरांगिनी संस्था समय-समय पर वृद्धाश्रम, अनाथालय और विभिन्न विद्यालयों में न केवल संगीत शिक्षा देती है, बल्कि आवश्यक वस्तुएं भी मुहैया कराती है। इसका उद्देश्य निचली बस्तियों के बच्चों और युवाओं को संत-संस्कृति से जोड़ने के साथ-साथ उनके जीवन को बेहतर बनाना है।
डिजिटल प्लेटफॉर्म पर भी पहुंचा रहीं कबीर वाणी
आज की युवा पीढ़ी तक पहुंचने के लिए अंजना सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म का भी सहारा ले रही हैं। उनका यूट्यूब चैनल ‘कबीर सूफियाना’ कबीर वाणी को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का माध्यम बन रहा है।
वे मानती हैं कि डिजिटल माध्यमों के अपने फायदे और नुकसान हैं, लेकिन सही दिशा में उपयोग किया जाए तो यह संत साहित्य को युवाओं तक पहुंचाने का सबसे प्रभावी तरीका बन सकता है।
लेखन में भी सक्रिय हैं अंजना
संगीत के साथ-साथ अंजना लेखन में भी सक्रिय हैं। अंजना जी का लेखन 2016 में शुरू हुआ। वे फेसबुक पर विभिन्न साहित्यिक समूहों से जुड़ीं। उन्होंने 2022 में उज्जैन के युवा जागृति मंच द्वारा आयोजित कवि सम्मेलन में पहली बार कविता पाठ किया।
वे नियमित रूप से ‘वृतांत’ नामक ब्लॉग पर लेखन करती हैं और विभिन्न साहित्यिक मंचों पर सम्मानित भी होती रही हैं।
वे 80 से अधिक कविताएं लिख चुकी हैं, जिनके प्रकाशन की तैयारी चल रही है। साहित्यिक मंचों से जुड़कर उन्होंने कई पुरस्कार भी हासिल किए हैं।
युवाओं के लिए संदेश
अंजना कहती हैं कि यदि युवा संतों की बातों और भारतीय संस्कृति के मूल्यों को समझें, तो समाज की कई समस्याएं खत्म हो सकती हैं। वे चाहती हैं कि संगीत और कबीर वाणी के जरिए युवा पीढ़ी को सही दिशा मिले और समाज में मानवता और समानता का भाव मजबूत हो।
अंजना सक्सेना आज भी लगातार संगीत और कबीर वाणी के जरिए समाज में जागरूकता फैलाने का काम कर रही हैं। संगीत में रुचि रखने वाली उनकी बेटी अलंकृति आर्किटेक्ट हैं और इंटीरियर डिजाइनर के रूप में फ्रांस में कार्यरत हैं। वहीं बेटे आर्यन ने मैनचेस्टर यूनिवर्सिटी से बीकॉम की डिग्री हासिल की है और वे एक अच्छे फुटबॉलर भी हैं।
उपलब्धियां एवं सम्मान
• कबीर जन विकास समिति द्वारा प्रतीक चिन्ह सम्मान (2015)
• सवाद संस्था, उज्जैन - मंगल मूर्ति महोत्सव में सम्मान (2015)
• उमा सांझी महोत्सव, उज्जैन (महाकालेश्वर प्रांगण) में सम्मान (2016)
• कबीर शोध संस्थान, लूणा खेड़ी- कबीर यात्रा में सम्मान (2016)
• कैथी फिल्म महोत्सव, वाराणसी- संत रैदास सम्मान (2016)
• अयोध्या फिल्म फेस्टिवल - कबीर सम्मान (2016)
• शहीद मेला, बेवर मैनपुरी (उप्र) - सम्मान (2018)
• कबीर जन विकास समिति, इंदौर- 'शबद निरंतर सम्मान' (2022)
• कायस्थ समाज- 'स्वयं सिद्धा सम्मान' (2023)
• कबीर उत्सव, लखनऊ- कबीर सम्मान (2024)
प्रमुख मंचीय प्रस्तुतियाँ
• उत्तराधिकारी कार्यक्रम, जनजातीय संग्रहालय, संस्कृति विभाग (2017)
• मध्यप्रदेश दिवस, इंदौर (2018)
• अहमदाबाद विश्वविद्यालय, गुजरात (2019)
• कबीर समाधि स्थल, मगहर (संत कबीर नगर, उत्तर प्रदेश) (2019)
• संस्कृति विभाग, मध्यप्रदेश – गमक श्रृंखला (2020)
• दूरदर्शन, इंदौर (2024)
अन्य महत्वपूर्ण प्रस्तुतियाँ
• कबीर महोत्सव, भोपाल (2016)
• कैथी फिल्म फेस्टिवल - 'आवाम का सिनेमा' (2016)
• अयोध्या फिल्म फेस्टिवल (2016)
• शहीद मेला, बेवर (मैनपुरी) - 2017 से 2020 तक निरंतर प्रस्तुतियाँ
• 'बुद्ध से कबीर' यात्रा -अहमदाबाद से मगहर (2019)
• उमा सांझी महोत्सव, उज्जैन (महाकाल मंदिर परिसर) (2015)
• उज्जैन सिंहस्थ - 7 मंचीय प्रस्तुतियाँ (2016)
• संस्कृति विभाग के कार्यक्रम 'उत्तराधिकार' एवं अन्य आयोजन (2017)
• कोविड काल में विभिन्न चैनलों पर ऑनलाइन प्रस्तुतियाँ (2020–2021)
• कुमार गंधर्व जी की साधना स्थली देवास में प्रस्तुति (2022)
• प्रथम महिला कबीर यात्रा में प्रस्तुति (2023)
सन्दर्भ स्रोत : अंजना सक्सेना से सीमा चौबे की बातचीत पर आधारित
@ मीडियाटिक



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