सुप्रीम कोर्ट : कागजों पर जिंदा रिश्ते का कोई अर्थ नहीं

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सुप्रीम कोर्ट : कागजों पर जिंदा रिश्ते का कोई अर्थ नहीं

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने 15 वर्षों से अलग रह रहे एक दंपति के विवाह को समाप्त करते हुए महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि वैवाहिक मुकदमों के लंबे समय तक लंबित रहने से कई बार विवाह केवल कागजों पर ही जीवित रह जाता है। कोर्ट ने राजस्थान हाईकोर्ट के तलाक संबंधी फैसले को बरकरार रखते हुए पति के पक्ष में निर्णय दिया।

यौन संबंधों से लगातार इनकार को माना मानसिक क्रूरता

जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने कहा कि भारतीय अदालतें पहले भी यह स्पष्ट कर चुकी हैं कि वैवाहिक जीवन में बिना उचित कारण के लगातार यौन संबंधों से इनकार करना गंभीर भावनात्मक तनाव पैदा करता है और विवाह की बुनियाद को कमजोर करता है। अदालत ने माना कि यह मानसिक क्रूरता की श्रेणी में आता है और हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13(1)(आईए) के तहत तलाक का वैध आधार हो सकता है।

15 साल से अलग रह रहा था दंपति

सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि दोनों पक्ष पिछले 15 वर्षों से अधिक समय से अलग रह रहे थे और उनकी कोई संतान भी नहीं थी। अदालत की ओर से कई बार सुलह कराने के प्रयास किए गए, लेकिन दोनों के बीच समझौता नहीं हो सका।

मामले में पत्नी गुजरात में और पति राजस्थान में सरकारी सेवा में कार्यरत हैं। अदालत ने कहा कि उपलब्ध तथ्यों से स्पष्ट है कि वैवाहिक संबंध पूरी तरह टूट चुके हैं और उनके पुनर्जीवित होने की कोई संभावना नहीं बची है।

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अनुच्छेद 142 के तहत दी राहत

न्याय सुनिश्चित करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी विशेष शक्तियों का उपयोग करते हुए विवाह समाप्त करने का आदेश दिया। कोर्ट ने कहा कि जब वैवाहिक संबंध पूरी तरह समाप्त हो चुके हों, तब केवल कानूनी औपचारिकता के रूप में विवाह को बनाए रखना उचित नहीं है।

विवाह केवल कानूनी अनुबंध नहीं

पीठ ने कहा कि विवाह को केवल व्यक्तिगत अधिकारों के अनुबंध के रूप में नहीं देखा जा सकता। वैवाहिक अधिकार और कर्तव्य दोनों एक-दूसरे से जुड़े होते हैं। यदि कोई पक्ष लगातार अपने वैवाहिक दायित्वों से पीछे हटता है, तो उसके कानूनी परिणाम हो सकते हैं।

पत्नी के दावों को नहीं मिला समर्थन

अदालत ने यह भी कहा कि पत्नी ने दावा किया था कि उसने गुजरात की नौकरी छोड़कर राजस्थान में रहने का प्रयास किया था, लेकिन रिकॉर्ड पर ऐसा कोई ठोस साक्ष्य नहीं मिला। इसके विपरीत उपलब्ध दस्तावेजों से स्पष्ट हुआ कि वह अब भी गुजरात में अपनी नौकरी कर रही है। कोर्ट ने माना कि उसके आचरण से पति के साथ रहने की स्पष्ट इच्छा दिखाई नहीं देती।

विवाह की पवित्रता बची नहीं थी

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अदालतें सामान्यतः विवाह की पवित्रता बनाए रखने के पक्ष में रहती हैं और केवल किसी एक पक्ष के कहने मात्र से तलाक देने में सावधानी बरतती हैं। हालांकि, इस मामले में दंपति लंबे समय से अलग रह रहा था और विवाह में अब कोई वास्तविक वैवाहिक संबंध शेष नहीं था। इसलिए तलाक का आदेश उचित माना गया। 

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