पल्लवी व्यास : जिन्हें जीवन के खालीपन

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पल्लवी व्यास : जिन्हें जीवन के खालीपन
से मिली पोषण क्रांति की प्रेरणा 

छाया : स्व संप्रेषित 

• सीमा चौबे

पल्लवी व्यास (Pallavi Vyas) केवल एक उद्यमी नहीं, बल्कि एक मिशन पर काम करने वाली महिला हैं, जिनका लक्ष्य समाज को कुपोषण मुक्त, महिलाओं को सशक्त और किसानों को आत्मनिर्भर बनाना है। इसी मक़सद से उन्होंने शांता फार्म्स के माध्यम से एक अत्याधुनिक डेयरी स्थापित की साथ ही मोरिंगा (सहजन) आधारित पोषण उत्पाद तैयार किये। एक गृहिणी के तौर पर शुरू हुआ उनकी ज़िंदगी का सफ़र अब कुपोषण के खिलाफ़ एक मजबूत आंदोलन बन चुका है।

संघर्षों में पली एक मजबूत सोच

पल्लवी व्यास (Pallavi Vyas) का जन्म 21 नवम्बर को बीकानेर में हुआ। उनके पिता युवराज पारीक इरिगेशन इंजीनियर थे और माता सुमित्रा पारीक शिक्षक। जन्म के बाद ही उनके दादा-दादी पूरे परिवार सहित ब्यावर आकर बस गए। उनकी मां लगातार संघर्ष के बाद प्रिंसिपल के पद तक पहुंची, फिर उन्होंने एम.एड. भी किया। माँ और पिता की पदस्थापना अलग-अलग और अक्सर दूर-दराज क्षेत्रों में होती थी। सभी भाई-बहन मां के साथ ही रहते थे तो उन परिस्थितियों से बहुत कुछ सीखते गए।

शिक्षा/बचपन की ज़िम्मेदारियां

पल्लवी की पढ़ाई छोटे-छोटे कस्बों के सरकारी स्कूलों में हुई, जहां कई जगह टॉयलेट जैसी मूलभूत सुविधाएं तक नहीं होती थीं। चार बहनों और एक छोटे भाई के बीच सबसे बड़ी होने के कारण पल्लवी का बचपन जिम्मेदारियों से भरा था। उन्होंने बहुत छोटी उम्र में ही घर संभालना सीख लिया। जब बाकी बच्चे खेलते थे, तब पल्लवी अपने भाई-बहनों के लिए खाना बनाती थीं, उन्हें संभालती थीं और चुपचाप जीवन को समझ रही थीं। इस तरह बचपन कब बीत गया, पता ही नहीं चला। लेकिन उनकी मां का संघर्ष और पिता का आत्मविश्वास, यही दो चीज़ें उनके व्यक्तित्व की नींव बनीं। 10वीं तक की पढ़ाई के बाद पल्लवी ने ब्यावर से सीनियर हायर सेकेंडरी और फिर वहीं के गवर्नमेंट कॉलेज से बीएससी (मैथ्स) में स्नातक और टेक्सटाइल केमिस्ट्री (textile chemistry) में एक वर्ष का डिप्लोमा भी किया।

शादी, सपने और साथ

कम उम्र में ही उनका विवाह जून 1998 में चित्तौड़गढ़ निवासी श्री संजय व्यास से हो गया। संजय 1992 से ही पढ़ाई के उद्देश्य से इंदौर में रह रहे थे और टैक्स प्रैक्टिस (tax practice) कर रहे थे, इसलिए विवाह के बाद पल्लवी भी इंदौर आ गईं। वहाँ एक नया जीवन उनका इंतज़ार कर रहा था। पति के प्रोत्साहन और सहयोग से उन्होंने एमबीए की डिग्री हासिल की। यह उनके सपने साकार करने की दिशा में पहला, लेकिन मजबूत कदम था।

2001 में बेटी प्रियल और 2007 में बेटे कर्णव का जन्म हुआ। मां बनने के बाद पल्लवी की ज़िम्मेदारियां कई गुना बढ़ गईं, लेकिन वे गृहस्थी और अपने लक्ष्य के बीच संतुलन बनाते हुए आगे बढ़ती रहीं। उन्होंने एक विज्ञापन एजेंसी में मार्केटिंग और लेखन - दोनों काम किये।

एक कठिन दौर… जिसने दिशा बदल दी

कर्णव के जन्म के कुछ समय बाद उनकी सास को ब्रेस्ट कैंसर का पता चला। एक तरफ छोटा बच्चा… दूसरी तरफ बीमारी से जूझती मां समान सास… यह समय बेहद चुनौतीपूर्ण था। उन्होंने अपने आपको परिवार और सासु माँ की सेवा के लिये पूरी तरह समर्पित कर दिया। 2009 में सास के निधन ने पल्लवी के जीवन में शून्य पैदा कर दिया। लेकिन यही शून्य उनके जीवन का एक अहम मोड़ भी बन गया।

एक संकल्प… जो मिशन बन गया

पल्लवी ने महसूस किया कि बीमारियों की जड़ हमारे भोजन और जीवनशैली में छिपी है। यहीं से उन्होंने तय किया कि अब वे स्वास्थ्य, पोषण और प्राकृतिक जीवन शैली के लिए काम करेंगी।

2011 में उनके पति ने ‘शांता ट्रेडिंग एंड एक्सपोर्ट कंपनी’ शुरू की और अमेरिका को जैविक (Organic) उत्पादों का निर्यात शुरू किया, उस समय भारत में जैविक खेती लोकप्रिय नहीं हुई थी। इस दौरान पल्लवी को यह समझने की जिज्ञासा हुई कि विदेशों में जैविक उत्पादों की इतनी मांग क्यों है। उन्होंने कीटनाशकों और खाद्य गुणवत्ता पर अध्ययन किया और समझा कि जैविक भले दिखने में आकर्षक न हो, लेकिन स्वास्थ्य के लिए बेहतर होता है। यहीं से उन्होंने जैविक क्षेत्र में काम करने का निर्णय लिया। चूंकि पल्लवी के परिवार का खेती या पशुपालन से कोई नाता तो था नहीं इसलिए उन्होंने पुणे और मुंबई के डेयरी उद्योगों का दौरा कर इसे अच्छी तरह समझा। उस समय उनके पास न ज़मीन थी, न पूंजी। था तो केवल कुछ करने का जज़्बा।

बंजर ज़मीन से डेयरी तक

2015-16 में उन्होंने 25 एकड़ बंजर जमीन खरीदी और सिर्फ 6 गायों से डेयरी की शुरुआत की। जैविक चारा, प्राकृतिक खेती और आधुनिक तकनीक के साथ उन्होंने एक नया मॉडल विकसित किया। धीरे-धीरे डेयरी बढ़ी, उत्पादन बढ़ा, पहचान बनी। लेकिन कोविड के बाद हालात बदलने लगे। इस दौरान उन्हें कई समस्याओं का सामना करना पड़ा। कुशल मजदूरों की कमी, पशुओं के लिए उचित आहार की समस्या और आर्थिक दबाव ने स्थिति को और चुनौतीपूर्ण बना दिया। उसी समय कर्ज़ की किश्तें चुकाने का दबाव और जैविक उत्पादों की सीमित मांग. इन सबने मिलकर परिस्थितियों को जटिल बना दिया। आखिरकार, उन्होंने एक साहसिक फैसला लिया डेयरी मिल्क सप्लाई को बंद करने का। यह सिर्फ एक व्यावसायिक निर्णय नहीं था,बल्कि एक भावनात्मक परीक्षा थी। एक्सपोर्ट कम्पनी में उनके पति को भी करोड़ों का नुकसान हुआ, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी।

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एक अंत… जो नई शुरुआत बना

जिस डेयरी को उन्होंने शून्य से खड़ा किया था, उसे बंद कर देना आसान नहीं था। लेकिन उसी समय, एक और विकल्प उनके सामने था - मोरिंगा। एक महत्वपूर्ण मोड़ तब आया, जब केंद्रीय मंत्री श्री गिरिराज सिंह ने India SME Award के दौरान उन्हें दूध के उत्पादन में सुधार के लिए मोरिंगा का प्रयोग करने का सुझाव दिया। पल्लवी पहले से ही इस पर छोटे स्तर पर काम कर रही थीं। अब उन्होंने इसे पूरी तरह अपनाने का निर्णय लिया।

2019 में उन्होंने दिवाली पर एक ऑर्गेनिक कॉम्बो लॉन्च किया, इस सोच के साथ कि ड्राई फ्रूट्स, चॉकलेट और मिठाइयों की जगह लोगों को शुद्ध और स्वास्थ्यवर्धक विकल्प उपहार में दिए जाएं। इस कॉम्बो में मोरिंगा पाउडर के साथ ऑर्गेनिक आटा, घी और मसाले शामिल किए गए। इसे लोगों से बेहद सकारात्मक प्रतिक्रिया मिली। लोगों ने न केवल इसे अपनाया, बल्कि पहली बार शुद्ध जैविक उत्पादों के असली स्वाद और खुशबू को भी महसूस किया।

पल्लवी बताती हैं कि कोविड के समय तक हमने अपनी सेवाओं को विस्तार देते हुए ऑनलाइन डिलीवरी शुरू कर दी थी। उस दौरान हम उन शुरुआती लोगों में शामिल थे जो ऑर्गेनिक उत्पादों की होम डिलीवरी कर रहे थे।  

मोरविटा: कुपोषण के खिलाफ एक समाधान

कोविड के उस कठिन दौर में जब लोग भय और अनिश्चितता से जूझ रहे थे, पल्लवी ने एक अलग सच्चाई को करीब से देखा- समाज में कुपोषण और एनीमिया की समस्या। उन्होंने इसके लिये ज़मीन पर उतरकर काम करने का फ़ैसला किया, जिसके तहत सबसे पहले मलिन बस्तियों में जाकर सेनिटाइज़र और मास्क के साथ-साथ मोरिंगा पाउडर (Moringa Powder) का वितरण शुरू किया। यह एक छोटा प्रयास था, लेकिन उसके परिणाम बेहद चौंकाने वाले थे। केवल तीन महीनों के भीतर कई महिलाओं और बच्चों में स्वास्थ्य के स्तर पर आश्चर्यजनक सुधार देखने को मिला।

यहीं से एक नई सोच ने जन्म लिया कि क्या हम मोरिंगा को लोगों के रोजमर्रा के खाने का हिस्सा बना सकते हैं? इसी विचार के साथ पल्लवी ने गहन रिसर्च शुरू की। चुनौती यह थी कि मोरिंगा के गुण तो अद्भुत हैं, लेकिन उसका स्वाद हर किसी को पसंद नहीं आता। कई प्रयोगों और शोध के बाद कोको के साथ एक स्वादिष्ट और पौष्टिक उत्पाद ‘मोरविटा’ तैयार किया, जिसके सेवन से बच्चों में 90% तक सकारात्मक बदलाव देखने को मिला। ये नतीजे पल्लवी की उम्मीदों से परे थे।

इस सफलता को और व्यापक स्तर पर परखने के लिए पल्लवी ने उज्जैन की एक आंगनबाड़ी में राज्य खाद्य विभाग और जिला प्रशासन के सहयोग से अति कुपोषित बच्चों के समूह को ‘मोरविटा’ देना शुरू किया और परिणाम वाकई अद्भुत थे। सिर्फ 90 दिनों में 95% बच्चे कुपोषण से मुक्त हो गए।

पल्लवी बताती हैं “उस पल ने मेरी सोच को पूरी तरह बदल दिया। मुझे एहसास हुआ कि शुद्ध दूध के माध्यम से हम सीमित लोगों तक ही पोषण पहुँचा पा रहे थे, लेकिन मोरिंगा के जरिए हम पूरे विश्व तक पोषण पहुँचाने की क्षमता रखते हैं। डेयरी में हमारा अनुभव मजबूत था, इसलिए हमने मोरिंगा को पशु स्वास्थ्य से भी जोड़ा। हमने मोरिंगा-आधारित कैटल सप्लीमेंट विकसित किए, जिनसे पशुओं के स्वास्थ्य में सुधार हुआ, प्रजनन संबंधी समस्याएं कम हुईं, बीमारियों पर नियंत्रण मिला और उच्च गुणवत्ता वाले दूध का उत्पादन भी बढ़ा। आज हम मिट्टी,पशु और मानव इन तीनों के स्वास्थ्य को साथ लेकर ‘One Health Mission’ की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। यह पहल जिला प्रशासन के सहयोग से संचालित हो रही है, जिसमें राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश से बड़ी संख्या में किसान उनके साथ जुड़ चुके हैं और 2 हज़ार एकड़ से अधिक भूमि पर मोरिंगा की खेती की जा रही है। वे महिलाओं के स्वयं सहायता समूहों के साथ काम कर रही हैं और उन्हें प्रशिक्षण देकर आत्मनिर्भर बना रही हैं।

विस्तार और प्रभाव

कंपनी द्वारा बनाए गए सभी उत्पाद पेटेंट हैं और ऑनलाइन उपलब्ध हैं। डेयरी फार्म व्यवसाय के अलावा अब पल्लवी 'हेल्दी थाली' की अवधारणा पर भी काम कर रही हैं। सभी प्रकार की दालें, खड़े अनाज, चावल ऑर्गेनिक तरीके से उगाया जा रहा है। इसके लिए देशभर के 2 हज़ार किसानों को अपने साथ जोड़ा है। वे किसानों से फसल बाजार मूल्य से अधिक कीमत पर खरीदती हैं। उनका सालाना कारोबार लगभग 7 करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है। लेकिन पल्लवी के कदम यहीं नहीं रुक गये हैं, वे कॉस्मेटिक सेक्टर, रिटेल चेन और नए उत्पादन केंद्रों पर काम कर रही हैं।

शुरुआती चुनौतियाँ

शुरुआत में सबसे बड़ा सवाल यह था कि लोगों को एक-एक लीटर दूध खरीदने के लिए कैसे तैयार किया जाए। कई लोगों ने शुरुआत में इसे खरीदने से मना कर दिया। जब गाय के दूध की होम डिलीवरी शुरू की गई, तो लोगों ने उन्हें ‘दूध वाली’ कहकर पुकारना शुरू कर दिया। लेकिन पल्लवी ने इन बातों पर ध्यान नहीं दिया और अपने काम पर लगातार फोकस बनाए रखा। इसी दृढ़ता के साथ वे आज मोरिंगा पर भी काम कर रही हैं। वे मानती हैं कि कोई भी काम छोटा या बड़ा नहीं होता। महिलाओं को अपनी क्षमताओं को पहचान कर आगे बढ़ना चाहिए और आत्मनिर्भर बनना चाहिए।

वर्तमान जिम्मेदारियां

वर्तमान में पल्लवी कई महत्वपूर्ण पदों पर कार्यरत हैं। वे स्वदेशी जागरण मंच मालवा प्रांत की महिला प्रमुख हैं। इसके साथ ही वे राजमाता कृषि विश्वविद्यालय की बोर्ड मेंबर, एसोसिएशन ऑफ इंडस्ट्रीज मप्र की एक्जीक्यूटिव कमेटी सदस्य और इंडिया SME फोरम की सदस्य भी हैं। वे लगातार किसानों, उद्यमियों और ग्रामीण विकास के क्षेत्र में काम कर रही हैं और नई तकनीक व उद्यमिता को बढ़ावा दे रही हैं। इस पहल में उनकी बेटी प्रियल भी पूरी रुचि के साथ जुड़ी हुई हैं। पेरिस से मास्टर्स डिग्री लेकर लौटी प्रियल ने भी इस कार्य को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। जब पल्लवी कुछ समय के लिए अन्य कार्यों में व्यस्त थीं, तब उनकी बेटी ने पूरे एक साल तक शांता फार्म्स की जिम्मेदारी संभाली और इसे सफलतापूर्वक आगे बढ़ाया। बेटा कर्णव (ऑटोनॉमस) प्रथम वर्ष में है। पति संजय व्यास हाईकोर्ट में टैक्सेशन अधिवक्ता हैं।

पुरस्कार, सम्मान और वैश्विक पहचान

• पल्लवी को उनके लघु और मध्यम उद्यम (MSME) क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य के लिए राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई सम्मान प्राप्त हुए हैं।

• उन्हें देश के शीर्ष 100 SME उद्यमियों में भी शामिल किया गया, जो उनकी बड़ी उपलब्धि है।

• वे भारत की उन शुरुआती महिला उद्यमियों में से हैं जिन्होंने दूध उत्पादन को एक संगठित और आधुनिक उद्योग के रूप में विकसित किया।

• पल्लवी ने अंतरराष्ट्रीय मंचों- एशिया एक्सपो 2024 (रूस), MSME डेलिगेशन (स्लोवेनिया 2022), Select USA Program (अमेरिका) और European Congress for SMEs (पोलैंड 2018) पर भी भारत का प्रतिनिधित्व किया।

• वे Startup Istanbul के टॉप 100 स्टार्टअप्स में भी शामिल रही हैं।

• नीदरलैंड्स की संस्थाओं के साथ मिलकर डेयरी क्षेत्र में कई प्रोजेक्ट्स पर काम किया।

• पोलैंड सरकार ने भी उन्हें डेयरी फार्म स्थापित करने के लिए आमंत्रित किया है। भारत में कोलकाता और पंजाब के कई उद्योगपतियों ने उनसे डेयरी प्रोजेक्ट्स के लिए सहयोग मांगा है।

• वे Goldman Sachs 10000 Women Program की प्रतिभागी रही हैं और उनका स्टार्टअप IIM Bangalore (NSRCEL) में इनक्यूबेट हुआ है। इसके साथ ही उन्हें कई स्टार्टअप और बिजनेस प्रोग्राम्स से भी मान्यता मिली है।

प्रमुख सम्मान एवं पुरस्कार

• ज़ी मीडिया नेटवर्क द्वारा मप्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के हाथोंसर्वश्रेष्ठ महिला एग्रीप्रेन्योर’ तथा नारायणी नमः पुरस्कार

•  डेयरी क्षेत्र में सतत योगदान के लिए केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह द्वारा सम्मानित (2017)

•  इंडिया एसएमई फोरम द्वारा नारी शक्ति पुरस्कार (2017)

•  ब्लाइन्ड विंक द्वारा इंडिया अचीवर्स अवार्ड (2019)

•  IIM एवं IIT इंदौर द्वारा बेस्ट स्टार्टअप अवार्ड (2016)

• इंडो ग्लोबल SME चैंबर द्वारा वूमेन एंड बिजनेस अवार्ड (2018)

•  विश्व दुग्ध दिवस 2022 के अवसर पर AHFD द्वारा इंडिया SME 100 अवार्ड  (33,000+ आवेदकों में 10/10 स्कोर प्राप्त)

•  एग्रीकल्चर उदय ग्रुप द्वारा इंडिया डेयरी अवॉर्ड्स 2021

• दैनिक भास्कर द्वारा वुमन अचीवर्स अवार्ड 2024-25

•  न्यूज़18 द्वारा तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के हाथों मिशन साहस पुरस्कार (2021)

सन्दर्भ स्रोत : पल्लवी व्यास से सीमा चौबे की बातचीत पर आधारित 

@ मीडियाटिक 

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