झारखंड हाईकोर्ट ने महिलाओं की वित्तीय सुरक्षा को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए तलाकशुदा पत्नी का स्थायी गुजारा भत्ता 40 लाख रुपये से बढ़ाकर 70 लाख रुपये कर दिया। अदालत ने कहा कि किसी भी महिला को शादी टूटने के बाद वित्तीय बेबसी में नहीं छोड़ा जा सकता और उसे सम्मानजनक जीवन जीने का पूरा अधिकार है।
जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और संजय प्रसाद की खंडपीठ ने कहा कि गुजारा भत्ता का मकसद केवल जीवनयापन कराना नहीं, बल्कि पत्नी को वही जीवन स्तर देना है जिसकी वह वैवाहिक जीवन में आदी रही हो। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि महिला को उसके माता-पिता के भरोसे छोड़ना कानून की भावना के खिलाफ है।
कोर्ट ने किन बातों पर दिया जोर?
• पत्नी की वर्तमान उम्र 32 वर्ष है, इसलिए अदालत ने उसकी आने वाली लगभग 38 वर्षों की जरूरतों को ध्यान में रखा।
• भविष्य की महंगाई, रोजमर्रा के खर्च और सुरक्षित जीवन के लिए पर्याप्त आर्थिक व्यवस्था जरूरी मानी गई।
• अदालत ने कहा कि यदि पति अपनी असली आय छिपाता है, तो कोर्ट उसके रहन-सहन, बैंक लेनदेन और शैक्षणिक योग्यता के आधार पर वास्तविक आय का अनुमान लगा सकती है।
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विवाद की पृष्ठभूमि
दोनों की शादी 2019 में हुई थी और बाद में वे पुणे में रहने लगे, जहां पति एक सीनियर सॉफ्टवेयर इंजीनियर के रूप में कार्यरत था। कुछ समय बाद दोनों के रिश्तों में तनाव बढ़ गया और दोनों ने एक-दूसरे पर गंभीर आरोप लगाए
• पति ने पत्नी पर झूठे आरोप और मानसिक प्रताड़ना का आरोप लगाया।
• पत्नी ने पति पर अवैध संबंध, मानसिक उत्पीड़न और जान से मारने की कोशिश जैसे गंभीर आरोप लगाए।
• इसके बाद पति ने 2023 में तलाक की याचिका दायर की। फैमिली कोर्ट ने 2024 में तलाक मंजूर करते हुए पत्नी को 40 लाख रुपये एलिमनी देने का आदेश दिया था, जिसे दोनों पक्षों ने हाईकोर्ट में चुनौती दी।
हाईकोर्ट का अंतिम आदेश
हाईकोर्ट ने पति की बेहतर और स्थिर आय को देखते हुए गुजारा भत्ता बढ़ाकर 70 लाख रुपये कर दिया। अदालत ने निर्देश दिया कि यह राशि 12 महीनों के भीतर 4 किस्तों में चुकाई जाए, जिसकी पहली किस्त 2 महीने के अंदर देनी होगी।
अदालत ने अपने फैसले में साफ कहा कि हर महिला को तलाक के बाद भी गरिमा और सम्मान के साथ जीवन जीने का अधिकार है।



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