चित्तरूपा पालित : जन आंदोलन, संघर्ष और जेल यात्रा की दास्तान

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चित्तरूपा पालित : जन आंदोलन, संघर्ष और जेल यात्रा की दास्तान

छाया : स्व सम्प्रेषित 

• विभा सिंह

चार दशक से ज्यादा समय से नर्मदा घाटी (Narmada Valley) में जल जंगल जमीन और विस्थापन (Displacement) के सवालों पर संघर्ष कर रहीं चित्तरूपा पालित (Chitrupa Palit) जिन्हें साथी ‘सिल्वी’ के नाम से जानते हैं, उन दुर्लभ सामाजिक कार्यकर्ताओं (Social Activists) में हैं जिन्होंने अपनी पूरी जिंदगी जन आंदोलन (People’s Movement) के बीच गुजार दी। कोलकाता में जन्मी सिल्वी का बचपन पिता की रेलवे (Railway) की नौकरी के कारण अलग-अलग शहरों में बीता—कभी लिलुआह, कभी गुवाहाटी फिर बिलासपुर और लखनऊ। प्रकृति, साहित्य और एक बड़े संयुक्त परिवार के बीच पली-बढ़ीं सिल्वी के जीवन को सबसे गहरे रूप में उनके 11 साल के भाई की अचानक हुई मौत ने प्रभावित किया। उस दुख ने पूरे परिवार को भीतर तक तोड़ दिया, लेकिन उनकी मां ने बेटियों को ही अपना “हीरा” कहकर जिस दृढ़ता से संभाला, उसने सिल्वी की सोच और संवेदनाओं को भी आकार दिया। उनकी जीवन यात्रा (Life Journey) संघर्ष और सृजन का अनोखा मेल है, आइए विस्तार से जानते हैं…

बचपन: प्रकृति, संवेदनाएं और एक गहरा दुख

संघर्ष और जन आंदोलनों (People’s Movements) का पर्याय बन चुकीं चित्तरूपा पालित (Chitrupa Palit) यानी ‘सिल्वी’ के घर पहुंचते ही प्रकृति (Nature) से उनका गहरा रिश्ता महसूस होने लगता है। पेड़-पौधों, किताबों और बेहद सादगी भरे जीवन (Simple Life) के बीच रहने वाली सिल्वी का जन्म 10 फरवरी 1964 को कोलकाता के सियालदाह स्थित पूर्वी रेलवे (Eastern Railway) के बीआर सिंह हॉस्पिटल (B R Singh Hospital) में हुआ। वे जुड़वा बहनों में बड़ी हैं। उनकी छोटी बहन महातपा उनसे एक घंटा दस मिनट छोटी हैं। भाई-बहनों में सिल्वी दूसरे नंबर पर थीं। उनसे सात साल बड़ा एक भाई था, जिसे कम उम्र में ही पढ़ाई के लिए पटना के सेंट जेवियर्स स्कूल (St Xavier’s School) भेज दिया गया था।

पिता बिमल कुमार पालित (Bimal Kumar Palit) रेलवे में इंजीनियर (Engineer) थे। वे अपने दस भाई-बहनों में दूसरे नंबर पर थे, इसलिए परिवार की बड़ी जिम्मेदारियां भी उनके कंधों पर थीं। बड़ा संयुक्त परिवार (Joint Family), लगातार तबादले और अलग-अलग शहरों में रहना—इन सबने सिल्वी के बचपन को सामान्य बच्चों से अलग बनाया। शुरुआती चार साल हावड़ा के पास लिलुआह (Liluah) में बीते। रेलवे (Railway) की नौकरी के कारण परिवार लगातार घूमता रहा। शायद यही वजह थी कि कम उम्र में ही सिल्वी ने देश की विविधता, भाषाओं और प्रकृति (Nature) को करीब से देखना शुरू कर दिया।

1969 में पिता का तबादला गुवाहाटी (Guwahati) हो गया। वहां का सेंट मैरी हायर सेकेंडरी स्कूल (St Mary Higher Secondary School) सिल्वी (Silvi) का पहला स्कूल बना। वे याद करती हैं कि स्कूल की खिड़कियों से कामाख्या पहाड़ (Kamakhya Hills) दिखाई देता था। लेकिन गुवाहाटी का यह दौर परिवार के जीवन का सबसे बड़ा दुख भी लेकर आया। छुट्टियों में घर आए उनके 11 वर्षीय भाई की सड़क दुर्घटना में मौत हो गई। इस हादसे ने पूरे परिवार को भीतर तक तोड़ दिया।

भाई की मौत के बाद लोगों ने माता-पिता को दूसरा बेटा पैदा करने की सलाह दी, लेकिन उनकी मां सुलेखा पालित (Sulekha Palit) ने दोनों बेटियों को ही अपना “हीरा” कहकर सबको चुप करा दिया। इस दुख से उबरने के लिए पिता ने 1970 में बिलासपुर (Bilaspur) ट्रांसफर ले लिया, लेकिन मां कई साल तक उस सदमे से बाहर नहीं निकल सकीं। इस दुःख से उबरने की कोशिश में उसी दौरान उन्होंने बिलासपुर कॉलेज (Bilaspur College) से अंग्रेजी में एमए (MA in English) किया, बाद में गवर्नमेंट विमेंस डिग्री कॉलेज (Government Women’s Degree College) में पढ़ाना शुरू किया। पढ़ाई, पीएचडी (PhD) की तैयारी, खेती और परिवार—सब कुछ वे साथ संभालती रहीं।

बिलासपुर (Bilaspur) की रेलवे कॉलोनी (Railway Colony) में घर के साथ तीन-चार एकड़ जमीन भी थी। यही वह समय था जब सिल्वी और उनकी बहन की परवरिश कुछ सालों तक उनकी नानी ने की। नानी की वजह से दोनों बहनों का बंगला भाषा (Bengali Language) और साहित्य से गहरा रिश्ता बना। कम उम्र में ही उन्होंने महाश्वेता देवी (Mahasweta Devi) का ‘अरण्येर अधिकार (Aranyer Adhikar)’ पढ़ लिया था। जल जंगल जमीन (Water Forest Land) और आदिवासी अधिकार (Tribal Rights) पर लिखी इस किताब ने उनके भीतर गहरी बेचैनी पैदा की। आशापूर्णा देवी (Ashapurna Devi) की स्त्री-विमर्श (Feminist Literature) केंद्रित रचनाओं, खासकर ‘सत्यवती त्रयी (Satyavati Trilogy)’ ने भी उन पर गहरा असर डाला। सिल्वी कहती हैं कि उन उपन्यासों को पढ़ने के बाद कई दिनों तक उनका मन भीतर से भारी रहता था।

पढ़ाई, नेतृत्व और सामाजिक चेतना

सातवीं तक की पढ़ाई बिलासपुर (Bilaspur) में हुई। 1976 में पिता का तबादला लखनऊ (Lucknow) हो गया। शुरुआत केंद्रीय विद्यालय (Kendriya Vidyalaya) से हुई, लेकिन बाद में दोनों बहनों का दाखिला लोरेटो स्कूल (Loreto School) में करा दिया गया। स्कूल घर से 11-12 किलोमीटर दूर था। रोज पैदल चलना, बसें बदलना और लंबा सफर तय करना उनकी दिनचर्या का हिस्सा बन गया।

दाखिले के दौरान अंग्रेजी (English) में उनकी पकड़ देखकर शिक्षक भी हैरान रह गए थे। सिल्वी बताती हैं कि जब उनकी मां अंग्रेजी साहित्य में एमए (MA in English Literature) कर रही थीं, तब वे भी साथ-साथ शेक्सपीयर (Shakespeare) और एम.ए. के कई पाठ्यक्रम पढ़ चुकी थीं। इसी स्कूल में पढ़ते हुए उन्हें मदर टेरेसा (Mother Teresa) को दो बार सुनने का अवसर मिला। सेवा और करुणा को लेकर उनकी बातें सिल्वी के मन में गहराई तक उतर गईं।

1979 में उन्होंने ICSE (ICSE Board) से दसवीं और 1981 में यूपी बोर्ड (UP Board) से बारहवीं पास की। करियर को लेकर परिवार ने कभी दबाव नहीं डाला। 1981 से 1984 तक उन्होंने दिल्ली (Delhi) के इंद्रप्रस्थ कॉलेज (Indraprastha College) से अर्थशास्त्र ऑनर्स (Economics Honours) में बीए (BA) किया। यहीं उनके भीतर नेतृत्व के गुण विकसित हुए और वे छात्रसंघ (Students Union) की निर्विरोध जनरल सेक्रेटरी (General Secretary) चुनी गईं।

लेखन (Writing) और पढ़ने का शौक बचपन से था, जिसका फायदा कॉलेज में मिला। उन्होंने लेखन प्रतियोगिताओं में कई पुरस्कार जीते। महिला सुरक्षा (Women Safety) और छात्र अधिकार (Student Rights) समेत कई मुद्दों पर विरोध प्रदर्शन किए। इसी दौरान उनकी सामाजिक-राजनीतिक समझ (Socio-Political Understanding) गहरी हुई। अर्थशास्त्र की किताबों में दिखने वाला विकास (Development) और जमीन पर दिखाई देने वाली असमानता (Inequality) उन्हें लगातार बेचैन करती रही।

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विस्थापितों की आवाज़ बनीं मेधा पाटकर

अपनी पहचान (Identity) बनाने और समाज को करीब से समझने की यह बेचैनी उन्हें गुजरात के आणंद (Anand, Gujarat) स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ रूरल मैनेजमेंट (IRMA – Institute of Rural Management Anand) ले गई। 1984 से 1986 के बीच उन्होंने वहां से पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा (Post Graduate Diploma) किया। पढ़ाई के दौरान गांवों में जाकर दुग्ध संघ (Dairy Cooperatives) के साथ महिलाओं के बीच काम करने का मौका मिला। पहली बार उन्होंने इतने करीब से ग्रामीण महिलाओं के श्रम (Labour), संघर्ष और आत्मनिर्भरता (Self-reliance) को देखा।

पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी (Rajiv Gandhi) के हाथों डिग्री प्राप्त करने के बाद वे प्रदान’ (PRADAN) संस्था के साथ जबलपुर में काम करने लगीं। घमापुर (Ghamapur) क्षेत्र में शराबबंदी (Alcohol Prohibition) समेत महिलाओं से जुड़े कई अभियानों में हिस्सा लिया। लेकिन संस्थागत असमानता और वित्तीय फैसलों को लेकर मतभेद बढ़ने लगे। दो साल बाद उन्होंने संस्था छोड़ दी और दिल्ली लौट आईं। धीरे-धीरे उन्होंने तय कर लिया कि वे वेतन या करियर (Career) से ज्यादा अपने विश्वासों के साथ खड़ी रहेंगी।

इस बीच 1989-91 में उन्होंने दिल्ली यूनिवर्सिटी से पॉलिटिकल साइंस में एमए किया। पढ़ाई के प्रति उनकी रूचि ही है कि लॉ और पीएचडी करने की कोशिश वे अब भी कर रही हैं।

निजी जीवन और आंदोलन की ओर बढ़ते कदम

जबलपुर में काम के दौरान भोपाल (Bhopal) की एक कार्यशाला में उनकी मुलाकात लेखक और समाजसेवी राकेश जी (Rakesh Ji) से हुई। कुछ वर्षों की दोस्ती के बाद 1991 में दोनों ने शादी की, हालांकि शुरुआत में सिल्वी के परिवार में इसे लेकर काफी विरोध और तनाव रहा। लेकिन कुछ सालों बाद सिल्वी के संघर्ष (Struggle) में पूरी तरह डूब जाने के बाद यह विवाह लंबा न चल सका और 1997-98 तक दोनों अलग हो गए। 2018 में औपचारिक रूप से तलाक (Divorce) हो गया। इसके बावजूद सिल्वी का अपने ससुराल (In-laws) और खासकर अपनी सास से गहरा भावनात्मक रिश्ता बना रहा।

1988 में वे झाबुआ जिले की अलीराजपुर (Alirajpur) तहसील - जो अब जिला बन चुकी है, में खेड़ूत मजदूर चेतना संघ (Khedut Mazdoor Chetna Sangh)’ के साथ काम करने लगीं। उसी दौरान नर्मदा नदी (Narmada River) पर बन रहे सरदार सरोवर बांध (Sardar Sarovar Dam) के विरोध में काम कर रहीं सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर (Medha Patkar) वहां पहुंचीं। यही सिल्वी और मेधा पाटकर की पहली मुलाकात थी।

हालांकि नर्मदा आंदोलन (Narmada Movement) से उनका परिचय इससे पहले ही हो चुका था। इंद्रप्रस्थ कॉलेज (Indraprastha College) और IRMA में पढ़ाई के दौरान सरदार सरोवर परियोजना के विरोध में पोस्टर और चर्चाएं वे देखती रही थीं। लेखक और शिक्षाविद अजय स्कारिया (Ajay Skaria) का एक लेख पढ़ने के बाद उन्होंने अपने माता-पिता से इस आंदोलन से जुड़ने की इच्छा भी जताई थी।

अलीराजपुर की बैठकों में यह तय हुआ कि महाराष्ट्र, गुजरात और मध्यप्रदेश के प्रभावित लोग साझा संघर्ष करेंगे। 1989 में विभिन्न समूहों और समितियों को साथ लेकर ‘नर्मदा बचाओ आंदोलन’ अस्तित्व में आया। तब तक यह लड़ाई केवल बेहतर मुआवजे की मांग तक सीमित नहीं रह गई थी, बल्कि विकास की पूरी अवधारणा और बड़े बांधों की राजनीति पर सवाल उठाने लगी थी।

नर्मदा आंदोलन: गांव-गांव तक पहुंचा संघर्ष

सिल्वी महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश के डूब क्षेत्र (Submergence Areas) में लगातार सक्रिय रहीं। वे गांव-गांव जाकर लोगों को उनके अधिकारों (Rights) के प्रति जागरूक करतीं, खासकर महिलाओं को संगठित करतीं। बड़े बांधों से होने वाले पर्यावरणीय नुकसान (Environmental Damage), विस्थापन (Displacement) और पुनर्वास (Rehabilitation) के सवालों को उन्होंने धरना (Protest), जनसभाओं और अदालतों तक पहुंचाया।

आदिवासी इलाकों (Tribal Areas) में शिक्षा की भयावह स्थिति देखकर आंदोलन ने “पढ़ाई-लड़ाई साथ-साथ (Education and Struggle Together)” का रास्ता चुना। कई गांवों में स्कूल सिर्फ कागजों पर मौजूद थे। ऐसे में 14 जीवनशालाओं (Jeevanshalas)’ की शुरुआत हुई। इन स्कूलों के लिए पाठ्य सामग्री (Study Material) तैयार करने, शिक्षकों के प्रशिक्षण और लाइब्रेरी (Library) निर्माण जैसे कामों में प्रसिद्ध शिक्षाविद अनिल सदगोपाल (Anil Sadgopal) जैसे लोगों को जोड़ा गया।

सिर्फ आंदोलन (Movement) ही नहीं, आदिवासी समाज (Tribal Society) की भाषा, संस्कृति (Culture) और पारंपरिक बीजों (Traditional Seeds) को सहेजने का काम भी शुरू किया गया। जल जंगल जमीन (Water Forest Land) के सवाल को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों तक ले जाया गया। इसी संघर्ष का असर था कि 1993 में विश्व बैंक (World Bank) ने पुनर्वास और पर्यावरण मानकों (Environmental Standards) के उल्लंघन का हवाला देते हुए सरदार सरोवर परियोजना (Sardar Sarovar Project) से वित्तीय समर्थन वापस ले लिया। यह आंदोलन की सबसे बड़ी उपलब्धियों में गिना गया।

1994 में सरदार सरोवर बांध का काम रुकने के बाद मध्यप्रदेश सरकार ने दूसरी परियोजनाओं पर काम तेज किया। तब आंदोलन महेश्वर (Maheshwar), इंदिरा सागर (Indira Sagar), ओंकारेश्वर (Omkareshwar), मान, वेदा, गोई और जोबाट बांधों तक फैल गया। ‘संघर्ष और पुनर्निर्माण (Struggle and Reconstruction)यह विचार इस लंबे आंदोलन की वैचारिक नींव बना।

महेश्वर से हरसूद तक: महिलाओं के नेतृत्व में लड़ाई

करीब 13-14 साल सरदार सरोवर क्षेत्र (Sardar Sarovar Region) में काम करने के बाद 1997 में सिल्वी ने आलोक अग्रवाल (Alok Agarwal) के साथ खरगोन (Khargone) जिले में महेश्वर बांध (Maheshwar Dam) के खिलाफ काम शुरू किया। यह परियोजना बिजली उत्पादन (Power Generation) के लिए बनाई जा रही थी, लेकिन हजारों परिवारों के विस्थापन (Displacement) का कारण बन रही थी।

महिलाओं (Women) के मजबूत संगठन के कारण यह आंदोलन बेहद प्रभावशाली बना। बांध को आर्थिक मदद दे रही भारतीय वित्तीय संस्थाओं (Indian Financial Institutions) का घेराव किया गया। हजारों महिलाओं ने गिरफ्तारियां दीं। सिल्वी भी कई बार जेल (Jail) गईं। वे बताती हैं कि जेल के भीतर भी बैठकों और कार्यशालाओं (Workshops) के जरिए संघर्ष जारी रहता था।

कानूनी लड़ाई (Legal Battle) और जन दबाव (Public Pressure) के कारण अंततः सरकार को यह परियोजना भी बंद करनी पड़ी। खुद को हमेशा लाइमलाइट (Limelight) से दूर रखने को लेकर वे कहती हैं—“आंदोलन (Movement) बड़ा होना चाहिए, व्यक्ति नहीं। कैमरा दिखता था तो पीछे हो जाती थी, लेकिन पुलिसिया कार्रवाई के सामने सबसे आगे रहती थी।”

इसके बाद वे खंडवा जिले में इंदिरा सागर बांध (Indira Sagar Dam) और हरसूद विस्थापन (Harsud Displacement) से जुड़े संघर्ष में सक्रिय हुईं। 2004 में हरसूद की स्थिति बेहद भयावह थी। पूरा शहर डूब क्षेत्र (Submergence Zone) में आ चुका था और लोग मामूली मुआवजे (Compensation) पर घर छोड़ने को मजबूर थे। संघर्ष की उन कहानियों को याद करते हुए आज भी कई बार उनका गला भर आता है।

उन्होंने अपने संघर्षशील जीवन में जहाँ अनगिनत जेल यात्राएं (Jail Terms) कीं, 37 दिन, 29 दिन, 21 दिन तक के अनेक उपवास (Fasts) किये वहीं दूसरी ओर लोगों के अधिकारों (Rights) के मुद्दों पर सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) और उच्च न्यायालय (High Court) में स्वयं पैरवी की और जीत हासिल की। वह हँसते हुए बताती हैं कि ओंकारेश्वर बांध (Omkareshwar Dam) प्रभावितों के एक केस में मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय (Madhya Pradesh High Court) में राज्य सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता और पूर्व क़ानून मंत्री रवि शंकर प्रसाद (Ravi Shankar Prasad) को उनके सामने खड़ा किया। श्री प्रसाद हर सुनवाई पर चार्टर्ड प्लेन से आते थे। पर अंत में हम जीत गए और सरकार हार गई।

ओंकारेश्वर बांध (Omkareshwar Dam) के खिलाफ लंबा जल सत्याग्रह (Water Satyagraha) हो या गांव-गांव जाकर सर्वे (Survey) करना—उन्होंने दिन-रात काम किया। सरकारी अधिकारियों द्वारा मुआवजे (Compensation) में की गई धांधली को भी अदालत तक पहुंचाया। उनकी कोशिश रही कि किसान (Farmers), मजदूर (Labourers), विधवा महिलाएं (Widowed Women) और वयस्क बच्चे—कोई भी पुनर्वास (Rehabilitation) से वंचित न रहे।

प्रभावित परिवारों की बारीक जानकारी और मजबूत कानूनी तैयारी (Legal Preparation) के कारण सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने आंदोलन के पक्ष में फैसला दिया और ब्याज सहित पुनर्वास राशि देने का आदेश दिया। अधिकांश लोगों को मुआवजा मिल चुका है, लेकिन जो अब भी वंचित हैं, उनके लिए सिल्वी आज भी संघर्ष कर रही हैं।

करीब चार दशक (Four Decades) तक उन्होंने सिर्फ बांधों (Dams) और विस्थापन (Displacement) के खिलाफ लड़ाई नहीं लड़ी, बल्कि सामाजिक रूढ़ियों (Social Norms) और पितृसत्तात्मक ढांचों (Patriarchal Structures) को भी लगातार चुनौती दी।

राजनीति, सादगी और जीवन-दर्शन

इसी दौरान जाने-माने वकील प्रशांत भूषण (Prashant Bhushan) के आग्रह पर वे शुरुआती दौर में आम आदमी पार्टी (Aam Aadmi Party) से भी जुड़ीं। माता-पिता के निधन के बाद उन्होंने दिल्ली (Delhi) का घर बेचकर मिली बड़ी राशि पार्टी को खड़ा करने में लगा दी।

इतनी बड़ी रकम दान करने के सवाल पर वे बेहद सहज ढंग से कहती हैं—“मेरी जरूरतें हमेशा बहुत सीमित रही हैं। रहने-खाने की बुनियादी जरूरतें पूरी हो जाएं और मेरी डॉग ‘भूरी रानी (Bhuri Rani)’ के इलाज के लिए कुछ पैसे हों, इससे ज्यादा कभी कभी नहीं चाहा।”

वे पार्टी में मध्यप्रदेश (Madhya Pradesh) की महिला संगठन की अध्यक्ष, पीएसी (PAC) सदस्य और 2018 विधानसभा चुनाव (2018 Assembly Elections) की ‘प्रत्याशी चयन समिति’ की अध्यक्ष रहीं। 2018 विधानसभा चुनाव में स्टार प्रचारक भी बनीं। लेकिन राजनीति से ज्यादा उनका मन हमेशा जनसंगठनों और आंदोलनों में रमा। सन 2019 में उन्होंने आम आदमी पार्टी (Aam Aadmi Party) से त्यागपत्र दे दिया।

सिल्वी को सबसे ज्यादा आकर्षित करती हैं—संघर्ष करती महिलाएं (Struggling Women), आदिवासी समाज (Tribal Society) की सादगी, पैसे के प्रति उनका गैर-लालची नजरिया (Non-greedy Attitude) और जमीन-प्रकृति के प्रति उनका सम्मान। शायद यही वजह है कि चार दशक (Four Decades) लंबे संघर्ष के बाद भी वे खुद को किसी नेता (Leader) का चेहरा नहीं, बल्कि आंदोलन (Movement) का एक साधारण साथी मानती हैं।

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