शहर में कई लोग ऐसे हैं जो सामाजिक सरोकारों से जुड़कर समाज में बदलाव ला रहे हैं। डॉ. मेनका जादौन भी उन्हीं में से एक हैं। उन्होंने खासतौर पर आदिवासी क्षेत्र की छात्राओं की सेहत सुधारने के लिए एक ऐसी पहल शुरू की, जिसमें महंगी सुविधाओं के बजाय छोटे और व्यवहारिक उपायों पर जोर दिया गया। अपनी इस पहल के तहत वे 100 से ज्यादा निशुल्क स्वास्थ्य जांच शिविर लगाकर सैकड़ों लड़कियों के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाने में कामयाब रही हैं।
डॉ. मेनका जादौन का मानना है कि स्वास्थ्य सुधार केवल दवाइयों से नहीं, बल्कि रोजमर्रा की आदतों में बदलाव से भी संभव है। इसी सोच के साथ उन्होंने छात्राओं में एनीमिया और थैलेसीमिया जैसी समस्याओं के खिलाफ अभियान शुरू किया। इस पहल में छात्राओं को केवल दवाइयां देने तक बात सीमित नहीं रखी गई, बल्कि उन्हें नियमित स्वास्थ्य जांच, पोषण और जीवनशैली से जुड़ी जरूरी जानकारी भी दी गई।
स्वास्थ्य के साथ बढ़ा आत्मविश्वास
कुछ ही महीनों में इस प्रयास का असर दिखाई देने लगा। जिन छात्राओं में पहले कमजोरी, थकान और ध्यान की कमी जैसी समस्याएं थीं, उनमें सुधार दर्ज किया गया। स्वास्थ्य बेहतर होने के साथ उनका आत्मविश्वास भी बढ़ा। डॉ. मेनका बताती हैं कि शुरुआत में कई छात्राएं शारीरिक रूप से कमजोर थीं और उनमें खून की कमी के लक्षण दिखते थे। नियमित जांच और सही खानपान के बाद स्थिति में धीरे धीरे सुधार आया। इसके बाद इन लड़कियों में से कई ने जॉब शुरू की और अपने पैरों पर खड़ी हो रही हैं।
30 देशों की महिलाओं को जोड़ा अभियान से
डॉ. मेनका स्वास्थ्य के साथ साथ बालिकाओं को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में भी काम कर रही हैं। आज उनके साथ 1000 से ज्यादा लड़कियां जुड़ी हुई हैं, जिन्हें वे सेल्फ इम्प्लोयमेंट के जरिए अपने पैरों पर खड़ा होना सिखा रही हैं। करीब 30 देशों की यात्राओं के दौरान उन्होंने युवा महिला वैज्ञानिकों और उद्यमियों का एक समूह भी बनाया है, जो जनजातीय क्षेत्र के बच्चों और युवतियों को बिजनेस और उद्यमिता की दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करता है। वे ग्लोबल मार्केट फोर्स पर आधारित एक शिक्षण केंद्र भी चला रही हैं, जहां शहर की कई प्रमुख महिलाएं जुड़ी हुई हैं।
सन्दर्भ स्रोत एवं छाया : दैनिक भास्कर



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