एम वाय अस्पताल में बेसहारा रोगियों की माँ बनीं सीमा

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एम वाय अस्पताल में बेसहारा रोगियों की माँ बनीं सीमा

छाया: स्व. संप्रेषित

 

अपने लिए तो सभी जीते हैं, पर दूसरों के लिए जीना उनके सुख दुःख में सहभागी बनना, ऐसा कम लोग ही कर पाते हैं। लेकिन कुछ ऐसे लोग भी होते हैं, जिनका उद्देश्य जरूरतमंदों और बेसहारा लोगों की मदद करना ही होता है। इंदौर के एमवाय अस्पताल के सहारा वार्ड में बेसहारा मरीजों की सेवा करने वाली नर्स सीमा सिंह उन्हीं में से एक हैं।अस्पताल के ‘सहारा वार्ड’ में आने वाला हर रोगी सीमा का अपना है। माँ की तरह मरीजों का ख्याल रखने वाली सीमा को यहाँ भर्ती सभी मरीज प्यार से माँ कहकर ही बुलाते हैं। वे हर त्योहार क्या होली, क्या दिवाली और क्या क्रिसमस इन्हीं बेसहारा लोगों के बीच मनाती हैं। उनका मानना है ‘जब इन मरीजों को अस्पताल में भी घर की तरह प्यार मिलेगा, तभी उनके जल्दी ठीक होने की संभावनाएं बढेंगी। दीन दुखियों की जितनी संभव हो, मदद करनी चाहिए, बस मैं उसी दिशा में कार्य कर रही हूं।‘

सीमा पूरी शिद्दत से अपनी जिम्मेदारी निभाने के अलावा अस्पताल में भर्ती मानसिक रूप से विक्षिप्त मरीजों के नाखून काटना, उन्हें नहलाने का काम भी करती हैं। इतना ही नहीं,  वे बेसहारा व बिछड़े लोगों को उनके घरवालों से मिलवाने का काम भी करती हैं। उन्होंने दो ऐसे बेसहारा लोगों को उनके घरवालों से मिलवाकर उनके घर भेजा है, जो कई सालों से बिछड़े हुए थे। कई ऐसे लोग भी हैं, जिनका कोई आसरा नहीं था, उन्हें  इंदौर के ज्योति निवास आश्रम, निराश्रित सेवा धाम तथा उज्जैन के आश्रमों में पहुंचाया। आश्रम भेजने के बाद सीमा उनसे सम्पर्क बनाएं रखतीं हैं। इतना ही नहीं, इलाज के दौरान अगर किसी बेसहारा मरीज की मौत हो जाती है, तो उसके अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी भी उठाती हैं। इस कार्य के लिए वे इंदौर के महाकाल सेवा संस्थान जो निराश्रितों का अंतिम संस्कार करती है, से जुड़ी हैं। अंतिम संस्कार से लेकर अस्थि विसर्जन तक के कार्य में आर्थिक मदद करती हैं।   

वार्ड में आने वाले सैंकड़ों मरीज ऐसे हैं, जो उनके मुंह बोले बेटे हैं। कई ऐसे भी हैं जो  स्वस्थ होकर अपने पैरों पर खड़े हो चुके हैं, लेकिन वे भी समय-समय पर फोन करते हैं। हालचाल जानते हैं, अपनी खुशियाँ और गम साझा करते हैं।  वे बताती हैं कमलेश, जो एचआईवी पॉजिटिव  था, उपचार से ठीक होकर महाराष्ट्र चला गया। वह अपने खानपान से लेकर जॉब तक की बातें अपनी सीमा माँ से साझा करता है। दूसरा मरीज विवेक मासूम था, तब उसकी माँ का देहांत हो चुका था, वह उन्हें मासूमियत से बुआ कहकर बुलाता है।

अवसाद के दौरान एक सलाह ने बदला जीवन 

12 वर्ष पहले उनका विवाह हुआ, लेकिन वे मां नहीं बन पाईं। तमाम उपचार के बाद जब डॉक्टरों ने उनके माँ नहीं बन पाने की बात बताई तो सीमा पूरी तरह टूट चुकी थीं। करीब डेढ़ वर्ष गहरे अवसाद में रहने के बाद सहारा वार्ड में अपनी ड्यूटी लगवाने की  एक सलाह ने उनका जीवन बदल दिया। इसके पहले वे 10 साल तक मेडिसिन वार्ड में थीं. पिछले छह वर्षों से सहारा वार्ड के बेसहारा ही उनका घर संसार है। 

सन्दर्भ स्रोत -पीपुल्स समाचार और सीमा सिंह से बातचीत पर आधारित

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