छाया:शुचि के फेसबुक अकाउंट से
• अपने शौक को दी अलग पहचान
भोपाल। अपने शौक को हुनर में तब्दील करना भले ही किसी को मुश्किल काम लगता हो, लेकिन शहर की शुचि अग्रवाल ने इस मुश्किल काम को ही अपनी आजीविका का माध्यम भी बनाया। शुची तरह तरह की घड़ियों की डिजाइन करने में माहिर है। ख़ास बात यह है कि उन्होंने इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने के बाद मिली नौकरी को ठुकराते हुए इस पेशे को चुना। इनके द्वारा ख़ास मौकों पर थीम के अनुसार घड़ियों को स्वरूप दिया जाता है। वर्ष 2016 से तरह-तरह की घड़ियाँ बना रहीं शुचि घड़ियाँ डेकोरेट कर कई राज्यों में प्रदर्शनी लगा चुकी हैं। भारत के अलावा उनके काम को विदेशों में भी पसंद किया जा रहा है।
नौकरी तो सभी करते हैं लेकिन अपने शौक और कुछ अलग करने के जूनून के चलते शुचि नेघड़ियाँ बनाना शुरू किया। प्रदर्शनी लगाईं, जब कामयाबी मिलने लगी तो इसे ही करियर के रूप में अपना लिया। इंजीनियरिंग करने के बाद जब नौकरी की बात आई तो शुचि काफी दुविधा में थी कि क्या करना चाहिए। वे आर्ट में ही कुछ करना चाहती थीं,जब परिवार वालों से शुचि ने अपनी रुचि के बारे में बताया तो उन्होंने अपनी बेटी का हौंसला बढ़ाते हुए उसका साथ दिया और कहा कि तुम जो करना चाहती हो, वही करो। इसके बाद शुचि ने प्रोफेशनल आर्टिस्ट के तौर पर वुडन आर्ट के साथ रेसिन आर्ट पर भी काम शुरू किया।
• वर्ष 2016 से बना रही हैं घड़ियाँ
शुचि बताती है इंजीनियरिंग करने के दौरान 2016 में कॉलेज में टीचर्स डे पर प्रोफेसर को गिफ्ट देना था। सबसे पहले विचार आया कि एक कार्ड बनाकर दे देते हैं, लेकिन तभी सोचा कि कार्ड तो कुछ समय बाद खराब हो जाएगा, क्यों न ऐसा कुछ दिया जाए, जो प्रोफेसर के लिए यादगार बन जाए। मेरे पास एक लकड़ी थी। मां ने कहा कि तुम इस पर एक क्लॉक बनाओ। मैंने वरली आर्ट में उसे वुडन क्लॉक को तैयार किया और प्रोफेसर को भेंट कर दी। उन्हें वह बहुत पसंद आई। आज भी उनके रूम में वह क्लॉक रखी हुई है। वहां से एक कलाकार के तौर पर मेरी यात्रा शुरू हुई।
शुचि पढ़ाई के साथ कुछ न कुछ बनाती रहती थी। 2017 में उन्होंने अपनी पहली एग्जीबिशन लगाई, इस एक्जिबिशन में काफी अच्छा प्रतिसाद मिला। राष्ट्रीय स्तर के अनेक कलाकार इसमें आए थे, उन्होंने शुचि के काम को सराहा. इसके बाद व्यावसायिक रूप से इस कार्य की शुरुआत की।
• सभी पेंटिंग में मिलता है कुछ अलग, पेड़ों की छाल का भी प्रयोग
उनकी बनाई गई पेटिंग कुछ न कुछ अलग देखने को मिलता है। पेंटिंग्स को बनाने के लिए ऑइल पेंटिंग, एक्रेलिक और पेड़ों की छाल का भी प्रयोग करती हैं। उन्हें एमपी टूरिज्म की ओर से 2014 में स्टेट लेवल पर पहला, विश्व गौरेया दिवस पर वन विभाग की ओर से दूसरा और नगर निगम की ओर से 2015 में सम्मानित करने के अलावा स्थानीय स्तर पर कई बार सम्मानित किया जा चुका है।
• विदेशों में भी है मांग
शुचि बताती हैं "अभी हम रेसिन पर काम कर रहे हैं। सोशल मीडिया और अन्य माध्यमों से ग्राहक हमसे संपर्क करते हैं। कुछ अन्य संगठनों और संस्थाओं के साथ मिलकर भी काम कर रहे हैं। जब ज्यादा काम आता है, तो जरूरत के अनुसार मैं स्वतंत्र रूप से कर कर रहे कलाकारों का सहयोग भी लेती हूँ। पूरे भारत के अलावा यूएस, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया में भी हमारे ग्क्लाराहक हैं, जहां मांग के अनुरूप अपने आर्ट वर्क भेजती हूं।"
संदर्भ स्रोत: पत्रिका
संपादन: मीडियाटिक डेस्क



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