छाया: राइट्स ऑफ इक्वलिटी
भोपाल। कभी अमरीका में कैंसर रिसर्चर रहीं मध्य प्रदेश के नरसिंहपुर की माया विश्वकर्मा अमेरिका में अपनी नौकरी छोड़कर आज ग्रामीण महिलाओं को नैपकिन व पैड बनाने की ट्रेनिंग देने के साथ उन्हें स्वास्थ्य और मासिक धर्म के प्रति जागरुक करने का काम कर रही हैं। गांवों में महिलाओं को जागृत करना उनकी दिनचर्या का हिस्सा बन गया है।
माया के माता-पिता खेतिहार मजदूर थे, लेकिन अपनी बेटी को उन्होंने खूब पढ़ाया। माया ने जबलपुर के एक विश्वविद्यालय से बॉयोटेक्नोलॉजी में पोस्ट ग्रेजुएशन किया। साथ ही दिल्ली एम्स में रिसर्च भी किया और बाद में अमेरिका चली गई। जहां यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया, सैन फ्रांसिस्को में ब्लड कैंसर पर रिसर्च किया। साल 2008 में उन्होंने अपनी पीएचडी पूरी की। इसके बाद माया अमेरिका की ऐशो आराम की जिंदगी छोड़ अपने देश वापस आ गई। यहां आकर उन्होंने महिलाओं के लिए सामाजिक कार्य करना शुरु कर दिया।
समाजसेवा से जुड़ने राजनीति में रखा कदम
स्वदेश वापसी के बाद उन्होंने राजनीति में कदम रखा। इसका सबसे बड़ा कारण यह था कि उन्हें लगा कि राजनीति में आकर वह समाज के लिए कुछ अच्छा कर पाएंगी। जिसके लिए वह लगातार प्रयासरत थीं। राजनीति में कदम रखने के बाद साल 2014 में पहली बार लोकसभा चुनाव में उन्होंने आम आदमी पार्टी के टिकट से नर्मदापुरम लोकसभा क्षेत्र (नरसिंहपुर-होशंगाबाद संसदीय क्षेत्र) से चुनाव लड़ा जहां उन्हें हार का सामना करना पड़ा। लेकिन उन्होंने राजनीति नहीं छोड़ी। पिछले साल हुए मध्यप्रदेश पंचायत चुनाव में वह नरसिंहपुर के साईं खेड़ा तहसील में निर्विरोध सरपंच चुनी गईं।
क्यों हैं पैड वुमेन के नाम से मशहूर?
माया महिलाओं को मासिक धर्म, हाइजीन और स्वास्थ्य को लेकर जागरूक करने के लिए कार्य करती हैं। गांवों और कस्बों में जाकर गरीब बस्तियों की महिलाओं को माहवारी के दौरान होने वाली समस्याओं के बारे में जागरूक करती हैं। उनकी समाजसेवा और जागरूकता कार्यक्रमों के कारण माया विश्वकर्मा को कई सामाजिक पुरस्कार भी मिल चुके हैं।
खुद 26 साल की उम्र में उपयोग किया था सैनेटरी पैड, खुद पर गुजरी तो आया आइडिया
हैरानी की बात यह है कि महिलाओं को पीरियड्स और स्वच्छता से जुड़ी जानकारियां देने वाली माया ने खुद भी 26 साल तक सैनेटरी पैड का उपयोग नहीं किया था क्योंकि उन्हें इस बारे में कोई जानकारी ही नहीं थी। माया कहती हैं कि मेरी मां पीरियड्स के बारे में खुलकर बात ही नहीं करती थी और मुझे कपड़े ही उपयोग करने के लिए देती थी लेकिन इसे साफ रखने के बारे में नहीं बताया। इस कारण मुझे बार-बार गंभीर इंफेक्शन हो जाता था इसलिए मैं चाहती थी कि मेरे गांव की लड़कियां इसके बारे में ज्यादा जानें और मैंने इस चुनौती को स्वीकार किया।
'पैडमैन' से मुलाकात के बाद शुरू किया सफर
जब रिसर्च पूरी करने के बाद माया भारत लौटीं तब उनकी मुलाकात पैडमैन के नाम से मशहूर अरुणाचलम मुरुगनाथम से हुई। वह उनके काम से काफी प्रेरित थी इसलिए उनसे मुलाकात के बाद उन्होंने एक मशीन खरीदकर सस्ते पैड्स बनाने शुरू किए। वह जरूरतमंद महिलाओं पैड्स बांटने के साथ उन्हें इसके प्रति जागरूक भी करती रहीं। इसके बाद उन्होंने अपनी सारी जमा पूंजी 2016 में सुकर्मा फाउंडेशन खोलने के लिए खर्च कर दी। अब गांव की करीब कई महिलाएं इस काम में उनकी मदद करती हैं, जिन्हें बाद में वह फ्री में आदिवासी महिलाओं को बांट देती हैं। उन्होंने अपने पैड्स ब्रांड का नाम 'नो टेंशन' रखा है। माया 15 जिलों में काम कर चुकी हैं। उनका उद्देश्य महिलाओं को जागरूक करने के साथ ही रोजगार देना भी है। अभी करीब 26 महिलाओं को रोजगार मिल रहा है। उन्हें दूसरे राज्यों से भी हेल्थ सेशन के लिए बुलाया जाता है।
ऐसे करती हैं जागरूक
माया बताती हैं माहवारी जागरूकता के लिए महिलाओं-बालिकाओं को 20 मिनट की एनिमेशन फिल्म दिखाई जाती है। बाद में उस विषय पर चर्चा के दौरान बीमारियों और समस्याओं से जुड़े सवालों के जवाब दिए जाते हैं। माहवारी जागरूकता के लिए हमने कैलेंडर भी बनाया है।
संदर्भ स्रोत : द मूकनायक/पत्रिका/पंजाब केसरी
संपादन: मीडियाटिक डेस्क



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