छाया: डॉ. चारु कुमार के फेसबुक अकाउंट से
अगर आप किसी काम को शिद्दत से करना चाहो, तो कोई आपको वह काम करने से नहीं रोक सकता अपने हुनर को निखारकर पहचान बनाने की चाहत होती है तो हर जिम्मदारी निभाते हुए आप मंजिल की ओर बढ़ते जाते हैं. इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप कितने सालों बाद फिर से यह काम कर रहे हैं या आपने किस विषय की पढ़ाई की है। बस जरुरत होती है, हुनर को पहचानने और उसमें डूबकर काम करने की। ऐसी ही शख्सियत हैं भोपाल की आर्टिस्ट डॉ. चारू कुमार जिन्होंने शादी के 10 साल बाद पेंटिंग बनाना शुरू किया, लेकिन इस बार उन्होंने अपनी रुचि को विराम नहीं दिया और लगातार अपना काम करती रहीं, नतीजा आज उनकी पेंटिंग्स की देश भर में मांग है।
दिल्ली के लेडी इरविन कॉलेज से टेक्सटाइल डिजाइनिंग में ग्रेजुएशन करने के बाद उनकी शादी हो गई। शादी के बाद पारिवारिक जिम्मेदारियों के बीच काम करने का मौका नहीं मिला। लेकिन शादी के 10 साल बाद जब पारिवारिक दायित्व कुछ कम हुए तो उन्होंने ग्लास पेंटिंग करना शुरू की। चारू हर तरह की पेंटिंग करती थीं, लेकिन ग्लास पेंटिंग उन्हें सबसे ज्याद पसंद थी। जब उन्होंने काम शुरू किया, तो लगा कि अब आगे और अपनी पढ़ाई करनी चाहिए। परिवार, काम के साथ ही एमए ड्राइंग-पेंटिंग में किया और पीएचडी भी की। इसके बाद देश के कई शहरों में एकल और समूह प्रदर्शनियां भी लगाईं। पिछले 25 वर्षों से ग्लास पेंटिंग कर रही चारु ने कोरोना काल के समय जब एग्जीबिशन लगना कम हो गया तब रेसिन आर्ट पर काम करना शुरू किया। पिछले तीन साल से वे रेसिन पर वर्क कर रही हैं।
चारु एनआइएफटी में इंडियन आर्ट हिस्ट्री गेस्ट फैकल्टी के तौर पर पढ़ाती भी हैं। घर पर ही उनका स्टूडियो है, जहां रेसिन, ग्लास आर्ट बनाती हैं। चूंकि उन्होंने टेक्सटाइल डिजाइनिंग में ग्रेजएशन किया है, तो उनकी पेंटिंग में उस विधा की झलक साफ़ दिखाई देती है। उनकी बनाई पेंटिंग्स की पेंटिंग्स की मांग देश भर में है। प्रदर्शनियों में भी अच्छा रिस्पांस मिलता है। चारु ग्लास पेंटिंग और रेसिन दोनों फॉर्म में काम कर रही हैं। वॉल आर्ट, राखी प्लेटर, मंत्र फ्रेम आदि रेसिन में बनाती हैं।
कभी देर नहीं होती
चारु कहती हैं “अगर आप कुछ करना चाहते हैं, तो कभी भी काम की शुरुआत कर सकते हैं। मैंने शादी के 10 साल बाद काम शुरू किया, अगर सोचती कि अब देर हो गई है, तो शायद यहां तक नहीं पहुंच पाती। मेरे बच्चे छोटे थे, स्कूल जाते थे, तो मैं उस वक्त काम करती थी, जब वह स्कूल में होते। कई बार रात को काम किया और अभी जब जिम्मेदारियां कम हैं, तो सुबह के वक्त ज्यादा आर्ट करती हूं। यानी आपको वक्त निकालना होगा, मेहनत करनी होगी, तभी आप सफल हो पाएंगे।”
संदर्भ स्रोत: पत्रिका
संपादन: सीमा चौबे



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