कलापिनी कोमकली जो बचपन में संगीत को अपना दुश्मन समझती थीं

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कलापिनी कोमकली जो बचपन में संगीत को अपना दुश्मन समझती थीं

चित्रांकन : ज़ेहरा कागज़ी

विशिष्ट महिला 

• माता वसुंधरा कोमकली एवं पिता कुमार गन्धर्व की संभाल रही हैं विरासत

• नई प्रतिभाओं को उनकी वजह से मिल रहा है मंच

• उनकी गायकी में देखी जा सकती है ग्वालियर घराने की छाप

पूर्णत. मौलिक-मधुर और दमदार आवाज की धनी कलापिनी का जन्म 12 मार्च को  देवास में हुआ। कुछ बिरले सौभाग्यशाली लोगों में से एक कलापिनी को पंडित कुमार गंधर्व एवं विदुषी वसुन्धरा कोमकली जैसे  माता-पिता गुरु के रूप में मिले, जिनसे उन्होंने संगीत का ज्ञान, तकनीक और व्याकरण विरासत में पाया। विशेष बात यह है, कि अपने गुरु के सान्निध्य में संगीत पाठ के दौरान उन्होंने मनन और सृजन का माद्दा भी हासिल किया। स्वरों की विस्तृत परिधि भावों को दर्शाने में पूर्ण सक्षम कलापिनी के गायन में ग्वालियर घराने की व्यक्तिगत छाप झलकती है। कलापिनी के रागों और बंदिशों का संग्रह मालवा अंचल की लोक धुनों और विभिन्न संतों के सगुण-निर्गुण भजनों से और भी अधिक समृद्ध हुआ है। पिछले एक दशक में वे एक प्रखर और संवेदनशील गायिका के रूप में उभरी हैं। उनकी प्रस्तुतियों में आत्मविश्वास, परिपक्वता है और एक सधी हुई कलाकार का सोच भी है।

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कला के उत्थान के प्रति समर्पित कलापिनी देवास में संगीत उत्सवों का आयोजन करती हैं, ताकि गायक, युवा कलाकार और विद्वतजनों का समागम संभव हो। अपनी सांगीतिक समझ और अध्येता भाव के कारण कलापिनी जैसी परिपक्व आवाज की धनी गायिका युवा पीढ़ी में भारतीय शास्त्रीय संगीत पर अपने  व्याख्यान प्रदर्शनों (लेक्चर डेमोन्स्ट्रेशन्स) के लिये काफी लोकप्रिय हैं। कुमार गंधर्व संगीत अकादमी की वे सक्रिय न्यासी हैं। उन्होंने अपने पिता पर लिखी गई एक किताब का संपादन भी किया है जिसका नाम है ‘कालजयी कुमार गंधर्व’. यह पुस्तक दो भागों में बंटी है पहले भाग में मराठी भाषा में कुमार गंधर्व के सांगीतिक योगदान के बारे में लिखे गए आलेखों का संग्रह है दूसरे भाग में अंग्रेजी और हिंदी में कुमार गंधर्व पर लिखे गए आलेखों का संग्रह है।

कलापिनी के बारे में एक रोचक बात यह है कि बचपन में उन्हें संगीत अपना दुश्‍मन लगता था। उनका मानना था कि संगीत ने मां-बाबा को उनसे दूर कर रखा था। वे चाहती थी कि बाबा न गाएं और मां तो बिलकुल ही न गाएं। एक बार देर रात अचानक उनकी आंख खुली तो बाबा के कमरे से मां के गाने की आवाज सुनाई दी। वे दौड़कर उनके कमरे में गई और मां से लिपटकर रोने लगीं , “तुम मत गाओ.” वे गाते-गाते रुक गईं। संगीत कलापिनी को इतना  नापसंद था कि वे लंबे समय तक उससे दूर ही रहीं। कुमार साहब ने भी उन पर कभी संगीत सीखने पर बहुत ज़ोर नहीं डाला। कलापिनी के अनुसार वे अपनी कोई बात कभी किसी पर थोपते नहीं थे.

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भारत सरकार के संस्कृति विभाग की छात्रवृत्ति उन्हें प्राप्त है। संगीत के प्रति उनकी तमाम कोशिशों को देखते हुए पुणे स्थित श्रीराम पुजारी प्रतिष्ठान ने उन्हें कुमार गंधर्व पुरस्कार से सम्मानित किया है। आरंभ और इनहेरिटेंट शीर्षक से एच.एम.वी. द्वारा व्यावसायिक तौर पर जारी उनकी दो स्टूडियो रेकॉर्डिंग हैं।  इसी तरह हाल ही में धरोहर  शीर्षक से टाइम्स म्यूजिक ने रेकार्ड जारी किया है। स्वर मंजरी में उनकी एक पूरी संगीत सभा है, जो वर्जिन रेकॉर्डस् की ताज़ातरीन प्रस्तुति है। कलापिनी ने पहेली और देवी अहिल्याबाई फिल्मों के साउण्डट्रेक में भी अपनी आवाज दर्ज कराई है। कलापिनी सिडनी और मेलबोर्न में स्प्रीट ऑफ इण्डिया, क्वीन्सलैण्ड ऑफ म्यूजिक फ़ेस्टिवल, बिस्बन (ऑस्ट्रेलिया), सवाई गंधर्व फ़ेस्टिवल, पुणे, देज़ ऑफ दिल्ली मास्को (रूस),अली अकबर खान म्यूजिक अकादमी बसेल (स्विट्ज़रलैंड),सुर संगम दुबई के साथ ही देश के सभी प्रमुख प्रतिष्ठित संगीत समारोह में अपनी उपस्थिति दर्ज करवा चुकी हैं। उनके विषयगत संगीत में गीत वर्षा, आई बदरिया, गीत वसंत, आयो बसंत, सगुण-निर्गुण भजन, निर्गुण गान, मालवा की लोकधुन और गंधर्व सुर प्रमुख हैं। आकाशवाणी महानिदेशालय, नई दिल्ली द्वारा कलापिनी कोमकली को शास्त्रीय गायन में टॉप ग्रेड से नवाज़ा गया है। 

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उपलब्धियां

1. श्रीराम पुजारी प्रतिष्ठान, पुणे द्वारा कुमार गंधर्व पुरस्कार
2. एचएमवी द्वारा आरंभ और इनहेरिटेंट रेकार्ड, टाइम्स म्यूजिक द्वारा धरोहर और वर्जिन रिकाड्र्स द्वारा स्वर मंजरी रेकार्ड जारी
3. फिल्म पहेली और देवी अहिल्या के लिए साउंड ट्रैक

संदर्भ स्रोत – मध्यप्रदेश महिला संदर्भ

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