सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि विवाहित बेटियों को अनुकंपा नियुक्ति से वंचित नहीं किया जा सकता। न्यायालय ने कहा कि परिवार की परिभाषा से विवाहित बेटियों को बाहर रखना स्पष्ट रूप से मनमाना, अनुचित और संवैधानिक रूप से गलत है।
न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक आराधे की पीठ ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के एक आदेश को रद्द करते हुए यह टिप्पणी की। उच्च न्यायालय ने कहा था कि अनुकंपा नियुक्ति के उद्देश्य से परिवार की परिभाषा में विवाहित बेटी को शामिल नहीं किया जाता है।
अनुकंपा नियुक्ति के तहत यदि किसी कर्मचारी की सेवा के दौरान मृत्यु हो जाती है या वह चिकित्सा कारणों से समय से पहले सेवानिवृत्त हो जाता है, तो सरकार परिवार के किसी सदस्य को नौकरी प्रदान करती है।
सर्वोच्च न्यायालय एक महिला द्वारा दायर अपील पर सुनवाई कर रहा था, जो एक मृतक व्यापारी की विवाहित बेटी है। महिला ने उच्च न्यायालय के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें अनुकंपा के आधार पर उचित मूल्य की दुकान के डीलर के रूप में उसकी नियुक्ति के दावे को खारिज कर दिया गया था।
महिला ने वर्ष 2019 के सरकारी आदेश को भी चुनौती दी थी, जिसमें विवाहित बेटियों को परिवार की परिभाषा से बाहर रखा गया था।
सर्वोच्च न्यायालय की प्रमुख टिप्पणियां
- विवाहित बेटियों को अनुकंपा नियुक्ति से बाहर रखना भेदभावपूर्ण है।
- परिवार की परिभाषा में केवल वैवाहिक स्थिति के आधार पर बेटियों को बाहर नहीं किया जा सकता।
- ऐसा प्रावधान संविधान के समानता के सिद्धांत के विपरीत है।
- विवाहित बेटी भी परिवार का हिस्सा होती है और उसे समान अधिकार प्राप्त हैं।
- अनुकंपा नियुक्ति के मामलों में लैंगिक समानता और संवैधानिक मूल्यों का पालन किया जाना चाहिए।



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