इरफ़ाना शरद

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इरफ़ाना शरद

चित्रांकन : ज़ेहरा कागज़ी

प्रतिभा- टेलीविजन, सिनेमा और रंगमंच

• स्मृति आलेख : नेहा शरद

आज आपके बहाने न जाने कितनी शामें, कितनी सुबहें, शहर,यात्राएं, अनुभव, हंसी -ख़ुशी, परेशानी और अनगिनत जाने -अनजाने चेहरे मेरे इर्द -गिर्द घूमने लग गए हैं।

ख़ासकर मेरी माँ, इरफ़ाना उज़्ज़मा सिद्दीकी मेरे हर रेशे में मौजूद हैं,आज भी। उनकी शख़्सियत बेमिसाल थी ! वो मेरी माँ थीं,सो इसीलिए मुहब्बत उमड़ती है यूँ नहीं है मैंने आज तक उनके जैसी कोई महिला देखी ही नहीं है।

सौम्य ,बहुत समझदार ,दिल में हरेक के लिए मुहब्बत !

ये सच है, बुलंद आवाज़, सही ढंग से अपनी बातें रखने वाली, हर काम में अव्वल। यूँ कमर तक लटकते बाल, लंबी -कद काठी, सुन्दर नाक -नक़्श, सलीके से पहने -ओढ़ने के तरीके उनको सबसे अलहदा बनाते थे !

लखनऊ के अख़्तर उस्मान सिद्दीकी और निसार फ़ातिमा सिद्दीकी के चार बेटों और चार बेटियों में तीसरे नम्बर की बेटी थीं इरफ़ाना। हिंदुस्तान का जब बँटवारा हुआ उन दिनों आप  काफी छोटी थीं। परिवार शाजापुर में था और आप अपने चाचा के यहाँ ! अफ़रा -तफ़री में चाचा और उनका परिवार ट्रेन से पाकिस्तान की तरफ रवाना हुआ, अपने भाई अख़्तर को उन्होंने तार कर दिया कि इरफ़ाना को स्टेशन से ले लें। लेकिन तार न पहुंचा, अकेली बच्ची को स्टेशन पर छोड़ नहीं सकते थे सो उन्हें भी अपने साथ पाकिस्तान ले गए |

कुछ सालों वहीं गुज़ारे, चाचा के यहाँ पढ़ाई जारी रही। उनके छोटे बेटे ज़ुबैर का ख़्याल रखने की ज़िम्मेदारी भी उनकी ही थी। उसके कई किस्से हमने माँ से सुने थे। फिर, जब वो एक्टर बन फिल्मों में आये तो उन्हें देख भी लिया। उनकी रूह ज़ुबैर से कुछ यूँ जुड़ी थी कि आख़िरी दिनों में, बिस्तर में दवाई लेकर सो रही थीं, किसी ने टीवी खोल दिया। ज़ुबैर की फिल्म आ रही थी और ये हड़बड़ाती हुई – बड़बड़ाती हुई उठीं -ज़ुबैर, ज़ुबैर आया है।

बहरहाल ,उनके वालिद ने इतने बच्चे होने के बावजूद, इरफ़ाना के लिए उम्मीद नहीं छोड़ी थी ! कुछ सालों में पता लगवा कर उन्हें पाकिस्तान से वापस बुलवा लिया गया।

अख़्तर उस्मान सिद्दीकी, सिंधिया एस्टेट के मुलाज़िम, बैंकर और बेहतरीन हक़ीम भी थे। रिटायरमेंट के बाद शाजापुर में हिक़मत करने लगे थे। अपनी बड़ी बहन रेहाना सिद्दीकी के ही स्कूल महारानी लक्ष्मी बाई उच्चतर माध्यमिक विद्यालय शाजापुर में माँ ने स्कूली पढ़ाई पूरी की। भाला फेंक, डिस्कस थ्रो जैसे कई खेलों में भी वो  हमेशा अव्वल रहीं।

चारों बहनें अपने समय से आगे, पढ़ी -लिखी और समझदार रहीं। सबसे बड़ी बहन रेहाना ने जहाँ एम.ए. समाज शास्त्र में किया था और अपने ही स्कूल में पढ़ाने लगी थीं।  उन्होंने प्रण लिया था कि शाजापुर की कोई लड़की अनपढ़ नहीं रहेगी। बाकी बहनें सुल्ताना और एहसान भी शिक्षा के क्षेत्र में जुड़ी रहीं और अपने क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण योगदान दिए।

पिता ने अपनी सभी लड़कियों को पढ़ा -लिखा कर अपने पैरों पर खड़ा करने और आगे बढ़ने का हौसला दिया। हम सुनते हैं की हमारी नानी भी अपने समय से काफी आगे बढ़ी हुई और पढ़ी -लिखी महिला थीं, जो घुड़सवारी से लेकर हुक्का पीने जैसे शौक भी रखती थीं। सभी बहनेंघर सजाने, सीने -पिरोने, कढ़ाई करने, खाना बनाने में भी लाजवाब रहीं।

इरफ़ाना जी ने रुख किया इंदौर का, कॉलेज की पढ़ाई, रेडियो स्टेशन जाना और हंस जैसी पत्रिकाओं में कहानियां लिखना जैसे काम शुरू हुए।  जल्द ही उर्दू की लेखिकाओं में उनका शुमार होने लगा। शरद जी से मुलाक़ात इंदौर रेडियो स्टेशन पर हुई। उन्हीं के शब्दों में कहूं तो – ‘ इतने लोग थे उस स्टूडियो में,पर एक चेहरा -एक नाम जाना -पहचाना, अपना सा लगा – शरद जोशी।

नाटक, लेखन एक से ही शौक दोनों को पास ले आए। इरफ़ाना जी कुछ दिनों, शरद जी के घर किराए से भी रहीं। वहां परिवार, रहन – सहन से परिचय हुआ। दोस्त बताते हैं कि जब पूछो कि शरद कहाँ है, तो पता लगता है कि वो ज़रूर इरफ़ाना के तांगे के पीछे सायकिल चला रहा होगा। शरद जी होल्कर कॉलेज के दिनों से ही नई दुनिया में अपने छपनेवाले वाले स्तंभ ‘परिक्रमा’ की वजह से स्थापित लेखक हो गए थे।

बाक़ायदा ,किसी उपन्यास के कथानक की तरह दोनों की शादी हुई।  शरद जी के मित्र शाजापुर कार लेकर गए, इरफ़ाना जी तैयार थीं। उनको गाड़ी में बैठने से पहले शरद जी की किताब ‘परिक्रमा’ दिखाई गई ताकि तस्दीक हो जाए। नईदुनिया के संपादक राजेन्द्र माथुर जी ने कन्या -दान किया !

दोनों ही परिवार के लिए यह अविश्वसनीय घटना थी और सबने अपनी समझ के हिसाब से समय लिया। दोनों ने अपना धर्म तज दिया,या यूँ कहें कि दोनों ही इन बंधनों से मुक्त इंसान थे। शरद जी ने कहीं लिखा था, आज़ादी के बाद हमें लगा था, ये हिन्दू -मुस्लिम के बहस – मसले ख़त्म हो जाएंगे।  हम बुद्धि के इस दिवालियापन से भी आज़ाद हो जाएंगे, पर अफ़सोस ये न हुआ।

दोनों ने इंदौर में एक घर भी ख़रीद लिया था पर ज़िन्दगी उन्हें भोपाल ले आयी। हमारी ज़िन्दगी पर इसका कोई असर नहीं हुआ क्योंकि हमने दो मुहब्बत करने वाले, ख़ूबसूरत लोगों के छाँव तले अपनी ज़िन्दगी बिताई।

शादी के बाद, विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन से एम.ए., रेडियो की ए ग्रेड कलाकार, भोपाल रंगमंच से अबू हसन, त्रिया चरित्र (बी एम शाह के निर्देशन में), रानी नागफनी की कहानी, लंगड़ी टांग (भाऊ खिरवड़कर के निर्देशन में), ख़ामोश अदालत जारी है, पंछी ऐसे आते हैं, एक और द्रोणाचार्य (बी वी कारंथ के निर्देशन में)  ने इरफ़ाना जी का प्रदेश में अपना मुक़ाम बना दिया था। आशा मिश्रा और पापिया दास गुप्ता तथा अन्य कई बेहतरीन कलाकार भी उस समय भोपाल के कला क्षेत्र से जुड़ी हुई थीं। इरफ़ाना जी के रेडियो से कई मशहूर कार्यक्रम प्रसारित हुए। तिलस्म -ए -होशरुबा नामक लम्बे रेडियो धारावाहिक में उन्होंने तक़रीबन दो दर्जन भूमिकाएं अदा कीं, जिसने उस समय उनको शोहरत की बुलंदियों पर पहुँचा दिया। ज्ञानोदय, हंस, धर्मयुग, सारिका जैसी हिन्दी की नामचीन पत्रिकाओं में आपकी कहानियां प्रकाशित हुई हैं और उर्दू की पत्रिकाओं में भी। सही बोलने, समझने, पढ़ने और बेहतरी को समझने की कला आपने हमें दी है, हम ता उम्र शुक्रगुज़ार रहेंगे।

1970 के दशक में शरद जी ने रुख किया मुम्बई की ओर। तब इरफ़ाना जी ने अकेले बख़ूबी हम तीनों बहनों को भी सम्भाला ! बड़ी बहन बानी उस समय नाटकों में मुख्य भूमिकाएं करने लगी थीं और 1983 में एनएसडी में उनका चयन हो गया। 1984 में हम लोग भी मुम्बई चले गए। वैज्ञानिक जयन्त नार्लीकर के जीवन पर बनी फिल्म में इरफ़ाना जी ने उनकी पत्नी और बानी ने उनकी बहू की भूमिका निभाई। मुम्बई दूरदर्शन के नाटकों में भी उन्होंने काम किया।

डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया में इरफ़ाना जी ने गोलकुंडा की महारानी का रोल किया। हुआ यूँ कि वह एपिसोड ओम पुरी साहब के साथ था। उनके सहायक ने इरफ़ाना जी को उनसे मिसेज़ शरद जोशी के रूप में मिलवाया | जब रिहर्सल शुरू हुई और इरफ़ाना जी ने अपनी साफ़, बुलंद आवाज़ में पढ़ना शुरू किया तो ओम जी बोले, अरे ! ये लोग मुझे श्रीमती शरद जोशी कह कर इनसे मिलवा रहे हैं, किसी ने कहा क्यूँ नहीं कि ये इतनी अच्छी एक्टर हैं। मुझे कुछ समय चाहिए, मैं स्क्रिप्ट दोबारा पढ़ूंगा।

शरद जी और इरफ़ाना जी एक दूसरे के लिए ही बने थे। 5 सितम्बर 91 को शरद जी के जाने के छठवें दिन उन्हें स्ट्रोक आया और फिर वो कई बार ठीक हुई और कई बार अस्पताल पहुंची। 6 जुलाई 99 को वो – आख़िर हमारे साथ रहें या शरद के पास चले जाएँ, की जद्दोजहद से आज़ाद हो गईं।
मैं बचपन से रंगमंच से जुड़ी हूँ, इतने नाटक देखे पर ढूंढती हुई आँखें फिर उन जैसी अभिनेत्री को नहीं देख पाईं। तीन बेटियों और पति लेखक वो भी शरद जोशी जैसा, ज़िन्दगी आसान नहीं थी पर वो आप ही थीं जिनके प्रेम से ज़िन्दगी भरपूर जी ली, समझ ली।


लेखिका इरफान शरद की सुपुत्री हैं एवं स्वयं भी ख्यात अभिनेत्री हैं ।

© मीडियाटिक

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