बरेली फैमिली कोर्ट : मायके में रहना है तो शादी क्यों की

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बरेली फैमिली कोर्ट : मायके में रहना है तो शादी क्यों की

महिला के पिता का कहना है कि अगर घर बसाना है तो दामाद को बेटी के साथ मायके में रहना होगा ये गलत सोच और खराब संस्कार की निशानी है। इसका वैवाहिक परंपराओं से कोई संबंध नहीं है। विवाह एक जिम्मेदारी है, समझौता नहीं' यह कहना है बरेली के फैमिली कोर्ट के जज ज्ञानेंद्र त्रिपाठी का। जस्टिस ज्ञानेंद्र त्रिपाठी, एक महिला के गुजारा भत्ता के केस की सुनवाई कर रहे थे। उन्होंने याचिकाकर्ता के आरोपों को खारिज करते हुए महिला पर दस हजार रुपए का जुर्माना भी लगाया। 

शादी के 7 साल बाद बिगड़े रिश्ते 

बरेली की नई बस्ती माधोबाड़ी की रहने वाली एक महिला की शादी, साल 2018 में मुरादाबाद के कटघर इलाके के रहने वाले ब्रजेश नामक युवक से हुई थी। ब्रजेश प्राइवेट स्कूल में टीचर हैं। शादी के 1 साल के अंदर ही दोनों के बीच लड़ाई शुरू हो गई। महिला ने बताया कि आए दिन होने वाली लड़ाई से तंग आकर वह अपनी मायके चली आई। ससुराली उसका दहेज के लिए उत्पीड़न करते थे, 15 लाख रुपए दहेज मांग रहे थे। 09 जून 2020 को पीड़िता ने ससुरालियों पर केस दर्ज कराया। महिला ने फैमिली कोर्ट में करीब चार साल पहले गुजारा भत्ता के लिए गुहार लगाई।​​​​​ 5 साल तक सुनवाई के बाद 17 अक्टूबर को कोर्ट ने फैसला सुनाया।​​ 

पति घर बेचकर ससुराल में आकर रहे 

सुनवाई के दौरान महिला ने कोर्ट से कहा-उसे कोई काम नहीं आता, इसलिए उसे हर महीने 30 हजार रुपए गुजारा भत्ता दिलवाया जाए या उसका पति अपने माता-पिता का घर बेचकर हिस्सा ले ले और उसके साथ मायके में आकर रहे। जबकि पति ब्रजेश ने ऐसा करने से इनकार करते हुए कहा कि महिला की आय भले ही सीमित है लेकिन वह एम.ए. और B.Ed डिप्लोमा धारक है। ऐसे में वह 25 हजार रुपए तक महीना में काम करके कमा सकती है। 

ऐसे संस्कार समाज को कमजोर करते हैं 

फैमिली कोर्ट के जज ज्ञानेंद्र त्रिपाठी ने फैसला सुनाते हुए कहा- महिला की यह सोच समाज के लिए नुकसानदायक है। महिला खुद 3 भाइयों की बहन है, अगर वह अपने पति से यह कहती है कि वह माता-पिता को छोड़ दे, तो भविष्य में उसकी भाभियां भी ऐसा ही कहेंगी। ऐसी सोच परिवार और समाज दोनों को कमजोर करती है।  कोर्ट ने कहा कि महिला खुद अपने बयान में मान चुकी है कि वह मायके में रहना चाहती है और ससुराल वापस नहीं जाएगी। उसने यह भी कहा कि उसे घरेलू कामकाज नहीं आता। अदालत ने बताया कि महिला के पिता मजदूरी करते हैं और उनके पास साइकिल तक नहीं है। वहीं, दूसरी ओर यह दावा किया गया कि बेटी की शादी में 11 लाख रुपए खर्च हुए और ससुराल वालों ने 15 लाख रुपए दहेज में मांगे। कोर्ट ने इन दावों को अविश्वसनीय और झूठा बताया। 

कोर्ट ने महिला पर लगाया 10 हजार का जुर्माना 

जज ज्ञानेंद्र त्रिपाठी ने अपने फैसले में लिखा- महिला बिना किसी उचित कारण के मायके में रह रही है। यह मुकदमा उसकी व्यक्तिगत जिद और मायके वालों की सलाह से दायर किया गया लगता है। इसलिए अदालत महिला की अर्जी खारिज करता है। साथ महिला पर 10 हजार रुपए का जुर्माना भी लगाया जाता है। कोर्ट ने कहा कि शादी कोई समझौता नहीं बल्कि जिम्मेदारी है। पति-पत्नी दोनों को इसे समान रूप से निभाना चाहिए। अदालत ने यह भी कहा कि मायके या ससुराल पक्ष के दबाव में लिए गए फैसले रिश्तों को कमजोर करते हैं। जज ने कहा कि महिला को खर्च चाहिए लेकिन पति के साथ नहीं रहना है। ये साबित होता है कि वह बिना उचित कारण पति से अलग रह रही है। ऐसे में वह भरण-पोषण की पात्र नहीं है।

सन्दर्भ स्रोत : दैनिक भास्कर 

 

 

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