सुप्रीम कोर्ट : तलाक देने से पहले

blog-img

सुप्रीम कोर्ट : तलाक देने से पहले
वैवाहिक रिश्ता टूटने के देने होंगे सबूत

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने तलाक के मामलों में एक अहम दिशा-निर्देश जारी करते हुए कहा है कि कोई भी अदालत सिर्फ यह कहकर तलाक नहीं दे सकती कि वैवाहिक रिश्ता पूरी तरह टूट चुका है। इसके लिए ठोस सबूत होना जरूरी है कि एक पक्ष ने जानबूझकर दूसरे को छोड़ा हो या साथ रहने से स्पष्ट रूप से इनकार किया हो। अगर ऐसे सबूत नहीं हैं या अलगाव किसी मजबूरी या नियंत्रण से बाहर की परिस्थिति के कारण हुआ है, तो शादी को “अपूरणीय रूप से टूटा” हुआ नहीं माना जा सकता। 

जस्टिस सूर्यकांत (वर्तमान मुख्य न्यायाधीश) और जस्टिस जॉयमाला बागची की पीठ ने इस मामले में विस्तृत आदेश जारी किया। पीठ ने स्पष्ट किया कि तलाक देने से पहले अदालत की जिम्मेदारी है कि वह दोनों पक्षों के दावों, सामाजिक पृष्ठभूमि, आर्थिक स्थिति और खासकर बच्चों के हित को ध्यान में रखकर गहन जाँच करे। कोर्ट ने कहा कि बच्चों की मौजूदगी में यह सवाल और भी संवेदनशील हो जाता है, क्योंकि तलाक का सबसे ज्यादा असर उन पर ही पड़ता है।

यह फैसला उत्तराखंड के एक दंपती के मामले में आया है। पति-पत्नी की शादी 2010 से पहले हुई थी। 2010 में पति ने क्रूरता का हवाला देकर तलाक की पहली अर्जी दी थी, लेकिन बाद में उसे वापस ले लिया। 2013 में दूसरी याचिका दाखिल की गई, जिसमें दावा किया गया कि पत्नी ने घर छोड़ दिया है। ट्रायल कोर्ट ने 2018 में सबूत न मिलने के कारण याचिका खारिज कर दी। लेकिन 2019 में उत्तराखंड हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का फैसला पलटते हुए पति को तलाक दे दिया। महिला ने इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की।

शीर्ष अदालत ने हाईकोर्ट के फैसले पर कड़ी आपत्ति जताई। कोर्ट ने पाया कि हाईकोर्ट ने सिर्फ पति के मौखिक बयानों पर भरोसा किया, जबकि पत्नी का दावा था कि उसे ससुराल वालों ने जबरन घर से निकाल दिया था और उसके बाद उसने अकेले बच्चे की परवरिश की। सुप्रीम कोर्ट ने इसे गंभीर चूक माना और कहा कि हाईकोर्ट ने कई महत्वपूर्ण कानूनी सवालों को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया। 

अदालत ने हिंदू विवाह अधिनियम की व्याख्या करते हुए कहा कि महज अलग रहना ही परित्याग नहीं है। इसके लिए यह साबित करना जरूरी है कि अलगाव जानबूझकर और बिना उचित कारण के किया गया हो। कोर्ट ने यह भी कहा कि कई बार महिलाएँ घरेलू हिंसा, उत्पीड़न या मजबूरी में घर छोड़ती हैं—ऐसे में उन्हें ही दोषी ठहराना न्यायोचित नहीं है। 

अंत में सुप्रीम कोर्ट ने उत्तराखंड हाईकोर्ट का 2019 का फैसला रद्द कर दिया और मामले को नए सिरे से सुनवाई के लिए हाईकोर्ट को लौटा दिया। कोर्ट ने निर्देश दिया कि अब सभी तथ्यों, गवाहों और परिस्थितियों की फिर से जाँच की जाए। यह फैसला देश भर की निचली अदालतों और हाईकोर्ट के लिए एक नया मानदंड स्थापित करता है। अब तलाक के मामलों में जल्दबाजी या एकतरफा बयानों पर फैसला देना मुश्किल हो जाएगा। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे न केवल कई शादियाँ बच सकती हैं, बल्कि महिलाओं और बच्चों को अनावश्यक मानसिक-आर्थिक आघात से भी बचाया जा सकेगा।

Comments

Leave A reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *



कर्नाटक हाईकोर्ट : 498-A केवल गंभीर क्रूरता पर
अदालती फैसले

कर्नाटक हाईकोर्ट : 498-A केवल गंभीर क्रूरता पर , लागू, वैवाहिक असंगति या अपूर्ण विवाह पर नहीं

अदालत ने कहा— “छोटी-मोटी पारिवारिक नोक-झोंक को अपराध बनाकर धारा 498-A के तहत मामला दर्ज कर देना कानून का दुरुपयोग है।”

बिलासपुर हाईकोर्ट : सबूत के बिना जीवनसाथी
अदालती फैसले

बिलासपुर हाईकोर्ट : सबूत के बिना जीवनसाथी , पर अफेयर के आरोप लगाना मानसिक क्रूरता

पत्नी के आरोप बेबुनियाद, डॉक्टर पति को मिला तलाक, पत्नी को मिलेगा 25 लाख गुजारा भत्ता

दिल्ली हाई कोर्ट : बहू का रहने का अधिकार मालिकाना हक नहीं
अदालती फैसले

दिल्ली हाई कोर्ट : बहू का रहने का अधिकार मालिकाना हक नहीं

कोर्ट ने साफ कहा है कि यह अधिकार सुरक्षा से जुड़ा है, खासतौर पर तब, बुज़ुर्ग सास-ससुर को मानसिक और शारीरिक नुकसान हो रहा...

छग हाईकोर्ट : अवैध संबंध को आत्महत्या
अदालती फैसले

छग हाईकोर्ट : अवैध संबंध को आत्महत्या , के लिए उकसावा नहीं माना जा सकता

कोर्ट की टिप्पणी - नैतिक रूप से गलत, लेकिन कानूनी अपराध नहीं, कोर्ट ने पति और गर्लफ्रेंड के खिलाफ याचिका खारिज की

तेलंगाना हाई कोर्ट : 'नौकरीपेशा पत्नी का  खाना
अदालती फैसले

तेलंगाना हाई कोर्ट : 'नौकरीपेशा पत्नी का  खाना , न बनाना,  तलाक का आधार नहीं हो सकता'

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अलग घर की मांग करना क्रूरता के दायरे में आता है, लेकिन हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह हर मामल...

केरल हाईकोर्ट : तलाकशुदा मुस्लिम महिलाएं,
अदालती फैसले

केरल हाईकोर्ट : तलाकशुदा मुस्लिम महिलाएं, , कानून से परे भी भरण-पोषण की हकदार

 कुरान का हवाला देकर तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं के भरण-पोषण पर सुनाया ऐतिहासिक फैसला