राजस्थान हाईकोर्ट : पेंशन पर दो पत्नियों का

blog-img

राजस्थान हाईकोर्ट : पेंशन पर दो पत्नियों का
दावा, नॉमिनी होने से कोई वारिस नहीं बनता

राजस्थान हाईकोर्ट ने पारिवारिक पेंशन को लेकर दो महिलाओं के बीच चल रहे विवाद में कहा कि केवल नॉमिनेशन (नामांकन) में नाम होने से किसी को संपत्ति या पेंशन का मालिकाना हक नहीं मिल जाता। जस्टिस फरजंद अली की कोर्ट ने कहा- "नॉमिनी केवल एक ट्रस्टी की तरह होता है। असली हकदार वही होगा, जो कानूनन उत्तराधिकारी है।"

कोर्ट ने माना कि विवाह की वैधता और 'असली पत्नी' कौन है। यह तय करना हाईकोर्ट के अधिकार क्षेत्र में नहीं है। इसके लिए गवाहों और सबूतों की पूरी जांच जरूरी है। कोर्ट ने वर्ष 2016 से लंबित याचिका को खारिज करते हुए दोनों पक्षों को सिविल कोर्ट में मुकदमा दायर करने की छूट दी है। 

जानें... आखिर क्या है विवाद?

मामला राजस्थान राज्य पथ परिवहन निगम (RSRTC) के रिटायर्ड असिस्टेंट जोनल मैनेजर मूलसिंह देवल की पेंशन से जुड़ा है। वर्ष 2000 में रिटायरमेंट के बाद 2013 में उनका निधन हो गया था। उदयपुर निवासी आनंद कंवर (याचिकाकर्ता) ने दावा किया कि पीपीओ (पेंशन पेमेंट ऑर्डर) में पत्नी के रूप में उनका नाम दर्ज है, इसलिए पेंशन उन्हें मिलनी चाहिए। वहीं जयपुर निवासी सायर कंवर (प्रतिवादी) ने आपत्ति जताई कि वर्ष 1972 के सीपीएफ (सेंट्रल प्रोविडेंट फंड) फॉर्म और राशन कार्ड में पत्नी के रूप में उनका नाम है और उनकी शादी वर्ष 1962 में हुई थी। 

याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि पीपीओ जारी होने के बाद विभाग को पेंशन रोकनी नहीं चाहिए थी। उन्होंने कहा- सायर कंवर की ओर से उत्तराधिकार प्रमाण पत्र के लिए लगाई गई अर्जी पहले ही खारिज हो चुकी है। दूसरी तरफ सायर कंवर के वकील ने तर्क दिया कि पहली शादी के रहते हुए दूसरी शादी (यदि हुई हो) कानूनन मान्य नहीं है। 

नॉमिनी संपत्ति का मालिक नहीं होता

कोर्ट ने अपने फैसले में लिखा- "कानून में ऐसा कहीं नहीं है कि नॉमिनी प्राकृतिक वारिसों को बेदखल कर पूर्ण स्वामी बन जाए। नॉमिनेशन केवल राशि प्राप्त करने के लिए होता है, लेकिन संपत्ति का लाभ उत्तराधिकार के नियमों से ही मिलेगा।"

एक साथ दो पत्नियां संभव नहीं कोर्ट ने हिंदू मैरिज एक्ट की धारा 5 का हवाला देते हुए कहा- “एक जीवित पत्नी के रहते हुए दूसरी शादी नहीं की जा सकती। चाहे मिताक्षरा स्कूल हो या दायभाग, कानून एक ही समय में दो पत्नियों को मान्यता नहीं देता।“  कोर्ट ने कहा- यह विवाद का विषय है कि मृतक की कानूनी रूप से ब्याही पत्नी कौन है? क्या पहली शादी तलाक के जरिए खत्म हुई थी या नहीं? ये सब जांच का विषय है। 

कोर्ट ने टिप्पणी की कि पक्षकार बुजुर्ग हो चुके हैं, इसलिए उन्हें लंबी कानूनी लड़ाई में नहीं उलझाया जाना चाहिए। कोर्ट ने निर्देश दिया कि अगर सिविल सूट दायर किया जाता है तो ट्रायल कोर्ट पक्षकारों की उम्र को देखते हुए प्राथमिकता से सुनवाई करे और एक साल में फैसला सुनाए।

Comments

Leave A reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *



हिप्र मंडी कोर्ट : दूसरी पत्नी को भी मिलेगा पहली जैसा अधिकार
अदालती फैसले

हिप्र मंडी कोर्ट : दूसरी पत्नी को भी मिलेगा पहली जैसा अधिकार

कोर्ट का बड़ा फैसला; पति के लापता होने पर किया था दूसरा विवाह गुजारा भत्ता देना ही होगा

महिला की गरिमा और आश्रय अधिकार पर मद्रास हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी
अदालती फैसले

महिला की गरिमा और आश्रय अधिकार पर मद्रास हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी

अदालत ने आदेश दिया कि दोषियों को पीड़ित महिला को उचित मुआवजा देना होगा और उसके घर का तत्काल पुनर्निर्माण भी करना होगा।

सुप्रीम कोर्ट : जैसे ही तलाक की कार्यवाही
अदालती फैसले

सुप्रीम कोर्ट : जैसे ही तलाक की कार्यवाही , शुरू होती है, हर कोई बेरोजगार बन जाता है

इस मामले में पत्नी ने तलाक के लिए अर्जी दाखिल की थी। हालांकि, सुनवाई के दौरान पति ने कहा कि उसे तलाक नहीं चाहिए।

पटना हाई कोर्ट : आपसी सहमति से
अदालती फैसले

पटना हाई कोर्ट : आपसी सहमति से , तलाक के लिए 1 वर्ष अलग रहना जरूरी

खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि 'अलग रहना' का अर्थ केवल भौतिक दूरी नहीं, बल्कि वैवाहिक संबंधों का पूर्णतः समाप्त होना है। 

इलाहाबाद हाई कोर्ट : पति के खिलाफ केस दर्ज  कराना
अदालती फैसले

इलाहाबाद हाई कोर्ट : पति के खिलाफ केस दर्ज कराना , आत्महत्या के लिए उकसाने का कारण नहीं

कोर्ट ने पत्नी और परिवार के खिलाफ कार्यवाही रद की, ‘दुराशय’ का कोई प्रमाण नहीं