मप्र हाईकोर्ट : तलाक मामले में पत्नी की बेवफाई की तस्वीर काफी

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मप्र हाईकोर्ट : तलाक मामले में पत्नी की बेवफाई की तस्वीर काफी

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने तलाक के एक मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा कि पारिवारिक विवादों में बेवफाई (Adultery) साबित करने के लिए फोटो को बिना डिजिटल सर्टिफिकेट के भी सबूत माना जा सकता है। 

कोर्ट में सच्चाई जानने के लिए सबूतों के तकनीकी नियमों में थोड़ी ढील दी जा सकती है। अब पत्नी की बेवफाई साबित करने के लिए पति को मोबाइल से ली गई तस्वीरों के लिए विशेष डिजिटल सर्टिफिकेट की जरूरत नहीं होगी। आइए जानते हैं कि आखिर क्यों कोर्ट ने इस मामले में पति के पक्ष में फैसला सुनाया।

फोटो के आधार पर मिली तलाक की मंजूरी 

11 नवंबर, 2025 को मध्य प्रदेश हाई =कोर्ट ने मि. दुबे के हक में फैसला सुनाया। कोर्ट ने उनकी पत्नी की बेवफाई की तस्वीरों को सबूत के तौर पर स्वीकार करते हुए तलाक की डिक्री को बरकरार रखा। इस मामले में सिर्फ तस्वीरें ही नहीं, बल्कि उन तस्वीरों को डेवलप करने वाले फोटोग्राफर की गवाही भी बहुत काम आई। कोर्ट ने माना कि ऐसे वैवाहिक मामलों में एविडेंस एक्ट की धारा 65B के तहत सर्टिफिकेट देना अनिवार्य नहीं है।

19 साल पुराने रिश्ते का ऐसे हुआ अंत

इस मामले की शुरुआत काफी समय पहले हुई थी। कपल की शादी 13 फरवरी, 2006 को हुई थी। लंबे समय तक साथ रहने के बाद पति ने 17 नवंबर, 2021 को फैमिली कोर्ट में तलाक की अर्जी दी थी। पति ने अपनी पत्नी पर बेवफाई का आरोप लगाया और सबूत के तौर पर कुछ तस्वीरें पेश कीं। फैमिली कोर्ट ने इन सबूतों के आधार पर पति को तलाक दे दिया था, जिसे बाद में पत्नी ने हाईकोर्ट में चुनौती दी। 

पत्नी की दलील को कोर्ट ने किया खारिज

पत्नी के वकील ने हाईकोर्ट में तर्क दिया कि बिना 65B सर्टिफिकेट के इन तस्वीरों को सबूत नहीं माना जाना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि ये तस्वीरें पत्नी के मोबाइल में थीं, जिन्हें पति ने अपने फोन में ट्रांसफर कर लिया और बाद में पत्नी का मोबाइल तोड़ दिया। हालांकि, कोर्ट ने इस दलील को नहीं माना। कोर्ट का कहना था कि अपनी पत्नी को किसी और के साथ देखकर गुस्से में मोबाइल तोड़ना एक स्वाभाविक मानवीय प्रतिक्रिया है।

फैमिली कोर्ट एक्ट में सबूतों के आसान नियम

दिल्ली हाईकोर्ट के वकील शिवम कुणाल के अनुसार, पति की जीत की मुख्य वजह फैमिली कोर्ट एक्ट, 1984 की धारा 14 है। यह कानून फैमिली कोर्ट को अधिकार देता है कि वह विवाद सुलझाने के लिए किसी भी रिपोर्ट या दस्तावेज को सबूत के तौर पर ले सकता है। भले ही वह साक्ष्य अधिनियम के सख्त नियमों पर खरा न उतरता हो। कोर्ट का मकसद तकनीक में उलझने के बजाय सच तक पहुंचना होता है। 

सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसले पर स्पष्टीकरण 

पत्नी के वकील ने अर्जुन पंडितराव केस में सुप्रीम कोर्ट के एक पुराने फैसले का हवाला दिया था, जिसमें डिजिटल सबूत के लिए सर्टिफिकेट को जरूरी बताया गया था। लेकिन हाईकोर्ट ने कहा कि वह फैसला वैवाहिक विवादों से जुड़ा नहीं था। फैमिली कोर्ट में नियम थोड़े अलग और सरल होते हैं। कोर्ट ने यह भी नोट किया कि पत्नी ने तस्वीरों में अपनी मौजूदगी से इनकार नहीं किया था, बल्कि सिर्फ यह कहा था कि इन्हें छल से बनाया गया है, जो कि कोर्ट को भरोसेमंद नहीं लगा।

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