कर्नाटक हाईकोर्ट : 498-A केवल गंभीर क्रूरता पर

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कर्नाटक हाईकोर्ट : 498-A केवल गंभीर क्रूरता पर
लागू, वैवाहिक असंगति या अपूर्ण विवाह पर नहीं

कर्नाटक हाईकोर्ट ने पत्नी द्वारा पति और ससुराल वालों के खिलाफ दर्ज धारा 498-A आईपीसी का मामला रद्द करते हुए महत्वपूर्ण टिप्पणी की कि “कानून असंगति (incompatibility) या अपूर्ण विवाह को अपराध नहीं बनाता। धारा 498-A वैवाहिक समस्याओं का सार्वभौमिक इलाज नहीं है।” जस्टिस एम. नागप्रसन्ना ने कहा कि धारा 498-A एक विशिष्ट और सीमित प्रावधान है, जो केवल गंभीर और जानलेवा स्तर की क्रूरता या दहेज से जुड़ी प्रताड़ना को दंडित करने के लिए बनाया गया है।

यह है मामला

याचिकाकर्ता अबुज़र अहमद और उनकी पत्नी की शादी 25 अगस्त 2017 को हुई थी। इसके बाद दंपति अमेरिका चले गए, जहां पति कार्यरत था और करीब छह वर्षों तक साथ रहे, इस दौरान एक बच्चा भी हुआ। जनवरी 2023 में पत्नी भारत लौटी और पति के साथ-साथ ससुर, सास और देवर के खिलाफ धारा 498-A, 504 आईपीसी तथा दहेज निषेध अधिनियम की धाराओं 3 व 4 के तहत शिकायत दर्ज करा दी। पुलिस ने न केवल मामला दर्ज किया बल्कि पति के खिलाफ लुक-आउट सर्कुलर भी जारी कर दिया, जिससे वह देश से बाहर नहीं जा सका।

आरोप और अदालत की टिप्पणी

शिकायत में भोजन की आदतों, कपड़ों की पसंद, घरेलू कामकाज के बंटवारे और टीवी देखने जैसी बातों को लेकर विवाद का उल्लेख था। अदालत ने कहा कि ये बातें वैवाहिक असहमति और मनमुटाव तो दर्शाती हैं, लेकिन धारा 498-A के तहत अपेक्षित “कानूनी क्रूरता” के स्तर तक नहीं पहुँचतीं। अदालत ने कहा— “छोटी-मोटी पारिवारिक नोक-झोंक को अपराध बनाकर धारा 498-A के तहत मामला दर्ज कर देना कानून का दुरुपयोग है।”

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि ललिता कुमारी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य के फैसले के बावजूद बिना किसी प्रारंभिक जांच के एफआईआर दर्ज करना और उस पर लुक-आउट सर्कुलर जारी करना चौंकाने वाला है। अंतिम फैसला कोर्ट ने पाया कि न तो दहेज की कोई मांग थी और न ही ऐसा कोई आचरण जो धारा 498-A की कानूनी कसौटी पर खरा उतरता हो। इसलिए मामले की जांच जारी रखना केवल उत्पीड़न बढ़ाएगा। न्यायालय ने सीआरपीसी की धारा 482 के तहत अपने विशेष अधिकार का प्रयोग करते हुए पूरा आपराधिक मामला रद्द कर दिया और कहा कि कानून को उपचार के बजाय हथियार नहीं बनने दिया जा सकता।

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