विभा सिंह
किसी भी संदिग्ध मृत्यु के पीछे छिपे सत्य तक पहुँचना केवल पुलिस जाँच का विषय नहीं होता। कई बार अपराधी अपने हर निशान मिटा देता है, गवाह बदल जाते हैं, बयान बदल जाते हैं, लेकिन मृत शरीर झूठ नहीं बोलता। वह अपने भीतर ऐसे वैज्ञानिक प्रमाण संजोए रहता है, जिन्हें पढ़ने की कला केवल एक दक्ष फोरेंसिक विशेषज्ञ के पास होती है।
मध्य प्रदेश की वरिष्ठ फोरेंसिक विशेषज्ञ (मेडिकल) डॉ. गीता रानी गुप्ता ने अपने 34 वर्षों के सेवाकाल में यही कार्य किया—मौन शवों को वैज्ञानिक भाषा दी और उस भाषा को न्यायालय तक पहुँचाकर हजारों मामलों में न्याय की प्रक्रिया को मजबूत बनाया। लगभग 10,000 पोस्टमार्टम, हजारों मेडिको-लीगल परीक्षण, जटिल अपराधों की वैज्ञानिक विवेचना और अदालतों में विशेषज्ञ साक्ष्य-यही उनकी पेशेवर पहचान रही है।
एक शिक्षक की बेटी से प्रदेश की पहली महिला एम.डी. बनने तक
23 अक्टूबर, 1958 को मुरैना जिले के जौरा-अलापुर में जन्मी डॉ. गीता रानी गुप्ता का बचपन साधारण लेकिन अनुशासित वातावरण में बीता। उनके पिता स्वर्गीय पी.एम. गुप्ता गणित के शिक्षक थे और शिक्षा को जीवन का सबसे बड़ा मूल्य मानते थे। डॉ. गीता बताती हैं, “पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह इंजीनियरिंग की पढ़ाई के दौरान जब गर्मी की छुट्टियों में घर आते थे तो उनके पिता जी से ही गणित पढ़ते थे।” डॉ. गीता की माताजी राम किशोरी गुप्ता गृहिणी थीं। तीन भाई-बहनों में गीता सबसे बड़ी हैं। इनके छोटे भाई राकेश बिहारी गुप्ता और बहन सुनीता रानी गुप्ता हैं।
पिताजी के लगातार तबादलों के कारण डॉ. गीता की पढ़ाई मध्य प्रदेश के विभिन्न नगरों में हुई। इनका पहला स्कूल राघोगढ़ का गर्ल्स स्कूल था। तीसरी-चौथी कक्षा की पढ़ाई जिस ब्वॉयज स्कूल से की, आज यहां दूरदर्शन केंद्र का दफ्तर है। प्रारंभिक शिक्षा के दौरान ही विज्ञान विषयों में उनकी विशेष रुचि विकसित हुई। एमपी बोर्ड से उन्होंने 1974 में हाईस्कूल की परीक्षा उत्तीर्ण की। पारिवारिक परिस्थितियों के कारण नियमित विज्ञान शिक्षा संभव नहीं हो सकी। उन्होंने 1976 में पत्राचार से इंटरमीडिएट और 1979 में ग्वालियर के जीवाजी विश्वविद्यालय से बी.एससी. निजी अध्ययन से पूरी की, लेकिन कठिनाइयों को अपनी मंजिल नहीं बनने दिया।
1984 की भोपाल गैस त्रासदी के दौरान उन्होंने मेडिकल छात्रा के रूप में आपदा प्रबंधन और फोरेंसिक विज्ञान के महत्व को बहुत करीब से देखा। यही अनुभव आगे चलकर उनके पूरे पेशेवर जीवन की दिशा तय करने वाला साबित हुआ।
1985 में भोपाल के बरकतउल्ला विश्वविद्यालय से उन्होंने एमबीबीएस की परीक्षा उत्तीर्ण की। पढ़ाई के दौरान ही उन्होंने पहली बार 20 शव देखे। डॉ. गीता बताती हैं, “एमबीबीएस प्रथम वर्ष में जब पहली बार डिसेक्शन हॉल में एक साथ 20 शव देखे तो लगा कि शायद पूरी रात नींद नहीं आएगी। लेकिन हुआ बिल्कुल उल्टा। अगले दिन से वही शव अध्ययन का माध्यम बन गए और धीरे-धीरे मृत्यु को भय नहीं, बल्कि चिकित्सा विज्ञान की एक महत्वपूर्ण पाठशाला के रूप में देखना सीख लिया। इसके बाद, एक साल तक मैंने उन्हीं 20 बॉडी पर डिसेक्शन किया था।”
एक साल इंटर्नशिप करने के बाद डॉ. गीता ने 1986 में भोपाल के गांधी मेडिकल कॉलेज से फॉरेंसिक मेडिसिन में दो वर्षीय डिप्लोमा के लिए दाखिला लिया लेकिन शासकीय सेवा में नियुक्ति होने के कारण लगभग 14 माह तक ही अध्ययन किया। इसके बाद शासकीय सेवा में रहते हुए उन्होंने 1994 में बरकतुल्ला विश्वविद्यालय, भोपाल से फॉरेंसिक मेडिसिन में एम.डी. की। डॉ. गीता फॉरेंसिक मेडिसिन में एमडी करने वाली मध्यप्रदेश की इकलौती महिला भी हैं।
डॉ. गीता अध्यापक बनना चाहती थीं। वे कहती हैं, “पिताजी चाहते थे कि मैं मेडिकल टीचिंग फील्ड में जाऊं, इसलिए BSC, MBBS और MD (फॉरेंसिक मेडिसिन) किया। 1996 में जब फॉरेंसिक डिपार्टमेंट में लेक्चररशिप की वैकेंसी निकली, तब डिमांडिंग डेट पर मेरी उम्र दो महीने आठ दिन ज्यादा निकली। यह जीवन का सबसे बड़ा अधूरा सपना रहा। इसके बाद ‘Forensic Aspect of Anatomy: Human Sternum Bone’ विषय पर पीएचडी के लिए पंजीयन कराया लेकिन प्रशासनिक बाधाएं एवं SAT Bhopal एवं हाई कोर्ट जबलपुर से भी राहत नहीं मिलने के कारण शोध कार्य पूरा नहीं हो सका।”
शासकीय सेवा का सफर—अस्पताल से मेडिको-लीगल इंस्टीट्यूट तक
डॉ. गुप्ता की पहली नियुक्ति मंदसौर में हुई और वे 1987 से 1989 तक परिवार कल्याण एवं स्वास्थ्य विभाग में सहायक शल्य चिकित्सक के पद पर कार्यरत रहीं। इसी पद पर कार्य करते हुए उनका 1989 में मध्यप्रदेश लोक सेवा आयोग (MPPSC) के माध्यम से मेडिकल ऑफिसर के रूप में चयन हुआ। इसके बाद उन्होंने भोपाल के मेडिको लीगल इंस्टीट्यूट (MLI) में अपनी सेवाएं प्रारंभ कीं। यहीं से उनका वास्तविक फॉरेंसिक सफर शुरू हुआ। एमएलआई देश के महत्वपूर्ण फोरेंसिक संस्थानों में से एक है जहां अपराध जांच, पोस्टमार्टम, उम्र निर्धारण, सेक्स परीक्षण समेत अन्य मेडिको-लीगल परीक्षण किए जाते हैं।
10 हज़ार पोस्टमार्टम: हर शव, एक नई कहानी
फॉरेंसिक मेडिसिन का कार्य केवल शव परीक्षण तक सीमित नहीं होता। इसमें मृत्यु के कारण, समय, चोटों की प्रकृति, अपराध में प्रयुक्त हथियारों के संकेत, विषाक्त पदार्थों की उपस्थिति और अपराध की परिस्थितियों का वैज्ञानिक विश्लेषण शामिल होता है। डॉ. गीता ने अपने करियर में 10 हज़ार के करीब पोस्टमार्टम किए। ऐसा करने वाली वे मध्यप्रदेश की इकलौती महिला हैं।
उनकी जिम्मेदारी केवल मृत्यु का कारण बताना नहीं थी, बल्कि यह भी निर्धारित करना था कि मृत्यु प्राकृतिक, दुर्घटनावश, हत्या अथवा आत्महत्या का परिणाम थी। हजारों मेडिको-लीगल मामलों की जांच करने के साथ अनेक जटिल आपराधिक मामलों में विशेषज्ञ राय दी जिसमें अदालत में एक्सपर्ट विटनेस के तौर पर गवाहियां शामिल हैं। गोली लगने से मौत, जलाकर हत्या, संदिग्ध और दुर्घटनात्मक मृत्यु, महिलाओं और बच्चों के विरुद्ध अपराध समेत क्षत-विक्षत शवों की पहचान मामलों में उनकी विशेषज्ञता थी।
उनके करियर का सबसे चुनौतीपूर्ण मामला शाजापुर से आया। डॉ. गीता बताती हैं, “करीब 13 साल पहले शाजापुर से 60 टुकड़ों में एक शव पोस्टमार्टम के लिए आया था। उस मामले में हत्या कर लाश सूखे बोरवेल में डाल दी गई थी। पुलिस को उस लाश को बोरवेल से निकालने में तीन दिन लग गए थे, जबकि उसका परीक्षण करने में मुझे दो दिन लगे थे।”
वहीं एक दूसरे मामले में कंकाल के कुछ हिस्से मिले। जिसके बारे में वे बताती हैं, “एक बार तीन-चार टुकड़ों में खोपड़ी और कंकाल मिला, जिसका परीक्षण मुश्किल था, परिजन भी छुपा रहे थे। जब खोपड़ी को सुरक्षित साफ करके परीक्षण किया गया तो उसमें बंदूक की गोली फंसी मिली। बाद में कोर्ट में यही वैज्ञानिक साक्ष्य हत्यारों को सजा दिलाने का आधार बना। मामला सुलझा तो पता चला कि हत्या परिजनों ने ही की थी।”
शोध और वैज्ञानिक योगदान
डॉ. गीता ने फोरेंसिक मेडिसिन में कई महत्वपूर्ण शोध किए। उनके दो शोधपत्र Journal of Indian Academy of Forensic Medicine में प्रकाशित हुए—
- Handedness in Human Being: Lunule
- Human Nail Growth and Medicolegal Aspect
उन्होंने राष्ट्रीय सम्मेलनों में शोधपत्र प्रस्तुत किए तथा ‘Appreciation of Ligature Mark in Hanging’ विषय पर अतिथि वक्ता के रूप में व्याख्यान भी दिया।
फोटोग्राफी बनी दूसरा जुनून
संस्थान में सबूतों के संरक्षण हेतु फॉरेंसिक दस्तावेजीकरण एवं विस्तृत रिकॉर्ड रखा जाता था। वहीं मृतक के शवों के अतिरिक्त प्रकरण से सम्बंधित मेडिकोलीगल अभिमत बाबत फोटोग्राफ भी आते थे जिस पर राय देने हेतु उन्होंने फोटोग्राफी सीखना जरूरी समझा। इसके चलते डॉ. गुप्ता ने 2012-13 में फोटोग्राफी का औपचारिक परीक्षण लिया। भोपाल के जाने-माने फोटोग्राफर राकेश जैमिनी और प्रशांत सक्सेना ने उन्हें फोटोग्राफी सिखाई।
प्रोफेशनल काम में सटीकता लाने के लिए सीखी गई फोटोग्राफी सेवानिवृत्ति के बाद अब डॉ. गुप्ता की नई पहचान है। वे वन्यजीव फोटोग्राफी के क्षेत्र में सक्रिय हैं। रोज़ाना सुबह उनके तीन-चार घंटे भोपाल एवं आसपास गुजरते हैं जहां वे पशु-पक्षियों के व्यवहार को समझने का प्रयास करती हैं। अब तक वन्य जीवों के हज़ारों फोटो खींच चुकी हैं जिनमें से कुछ पुरस्कृत भी हैं। 2014 में वन विहार में आयोजित वन्य जीव फोटोग्राफी में प्रथम, 2016 और 2021 में द्वितीय पुरस्कार, 2022 में ‘लाइफ ऑफ स्पैरोज’ में सांत्वना पुरस्कार हासिल कर चुकी हैं। डॉ. गीता अविवाहित हैं। उनका शौक ही अब उनका हमसफर है।
31 अक्टूबर, 2023 को रिटायर होने के बाद भी डॉ. गीता कोर्ट में विशेषज्ञ गवाह के रूप में सेवाएं दे रही हैं। साथ ही वैज्ञानिक दृष्टिकोण से हस्तरेखा विज्ञान के अध्ययन में सक्रिय हैं।
संदर्भ स्रोत : गीता रानी से विभा सिंह की बातचीत पर आधारित
© मीडियाटिक



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