सरोगेसी को लेकर एक अहम और दूरगामी असर वाला फैसला देते हुए मद्रास हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि 50 वर्ष की उम्र पार कर चुकी महिला भी, जब तक वह 51 वर्ष की नहीं हो जाती, सरोगेसी का विकल्प चुनने के लिए अयोग्य नहीं मानी जाएगी।
साथ ही कोर्ट ने सरोगेसी के जरिये जन्म लेने वाले बच्चों की अभिरक्षा व जन्म प्रमाणपत्र के आवेदन के निपटारे के संबंध में मजिस्ट्रेट के लिए भी दिशा-निर्देश जारी करते हुए चेतावनी दी है कि ऐसे मामलों में अत्यधिक तकनीकी दृष्टिकोण नहीं अपनाया जा सकता।
हाई कोर्ट ने इस मामले में निचली अदालत के उस आदेश को गलत ठहराते हुए रद्द कर दिया, जिसमें सरोगेसी का विकल्प अपनाने वाली महिला की आयु 50 वर्ष 9 माह होने के आधार पर उसे अपात्र ठहरा दिया गया था, जबकि सक्षम प्राधिकरण पहले ही उसकी पात्रता का प्रमाणपत्र जारी कर चुका था।
हाई कोर्ट का यह फैसला उन दंपतियों के लिए राहत लेकर आया है जो उम्र सीमा को लेकर असमंजस में रहते हैं। अब यह स्पष्ट हो गया है कि कानून की व्याख्या कठोर तकनीकी आधार पर नहीं, बल्कि उसके उद्देश्य के अनुरूप की जानी चाहिए। यह फैसला न सिर्फ एक दंपती के लिए राहत है, बल्कि पूरे देश में सरोगेसी कानून की व्याख्या के लिए महत्वपूर्ण मिसाल बन सकता है।
यह महत्वपूर्ण फैसला मद्रास हाई कोर्ट के न्यायाधीश शमीम अहमद ने 25 जून को नंदिनी देवी की याचिका पर दिया। मामला तमिलनाडु के नमक्कल जिले के एक दंपती से जुड़ा है, जो सरोगेसी के जरिये संतान प्राप्त करना चाहते थे। दंपती की शादी 2005 में हुई और 2008 में उन्हें पुत्र हुआ, जिसकी नवंबर 2024 में दिल का दौरा पड़ने से मृत्यु हो गई।
चूंकि चिकित्सीय कारणों से महिला का गर्भाशय निकाला जा चुका था, इसलिए वह प्राकृतिक रूप से गर्भधारण करने में सक्षम नहीं थी। ऐसे में दंपती ने कानून के तहत सरोगेसी का रास्ता चुना। उन्हें संबंधित प्राधिकरण से पात्रता प्रमाणपत्र भी मिल चुका था और एक रिश्तेदार महिला ने सरोगेट मां बनने की सहमति दे दी थी।
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लेकिन निचली अदालत ने दो मुख्य आधारों पर याचिका खारिज कर दी। पहला, सरोगेसी का विकल्प चुनने वाली महिला की उम्र 50 वर्ष 9 माह से अधिक थी, जिसे अदालत ने निर्धारित सीमा से बाहर माना। दूसरा, सरोगेट मां के पति की गवाही नहीं ली गई थी।
मद्रास हाई कोर्ट ने दोनों आधार खारिज करते हुए सरोगेसी का विकल्प चुनने वाली महिला के लिए कानून में निर्धारित आयु सीमा की व्याख्या की। हाई कोर्ट ने कहा कि कानून में तय आयु 23 से 50 वर्ष है। इसका अर्थ यह नहीं है कि 50 वर्ष पूरे होते ही महिला अयोग्य हो जाती है। जब तक महिला 51 वर्ष की नहीं होती, तब तक वह 50 वर्ष की श्रेणी में ही मानी जाएगी।
इसके अलावा हाई कोर्ट ने इस मुद्दे पर विचार करने की मजिस्ट्रेट की सीमा भी स्पष्ट की। कोर्ट ने कहा कि जब संबंधित प्राधिकरण पहले ही पात्रता प्रमाणपत्र जारी कर चुका है, तो मजिस्ट्रेट को उसकी वैधता पर सवाल उठाने का अधिकार नहीं है। साथ ही, सरोगेट मां के पति की गवाही लेना कानूनन आवश्यक नहीं है, क्योंकि उसकी सहमति पहले ही दस्तावेजों में दर्ज होती है।
हाई कोर्ट ने फैसले में सरोगेसी (रेगुलेशन) एक्ट, 2021 के उद्देश्यों पर जोर देते हुए और विभिन्न पूर्व फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि यह एक लाभकारी कानून है। इसे भारत में सरोगेसी को विनियमित करने और बढ़ती बांझपन की समस्या से जूझ रहे दंपतियों को राहत देने के उद्देश्य से बनाया गया है।
इस अधिनियम का उद्देश्य संतान से वंचित दंपतियों के लिए माता-पिता बनने का कानूनी, नैतिक और चिकित्सकीय रूप से सुरक्षित मार्ग उपलब्ध कराना है, जिसमें न्यायपालिका की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। केवल तकनीकी कमियों के आधार पर किसी दंपती के माता-पिता बनने के अधिकार में बाधा नहीं डाली जानी चाहिए।



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