• सारिका ठाकुर
हर माता-पिता अपने बच्चों को ऊँचे से ऊँचे मुकाम पर देखना चाहते हैं। कभी-कभी उनके सपनों के तले बच्चे दब जाते हैं। क्या हो अगर माता-पिता सिर्फ उनके हिस्से का प्यार दुलार बच्चों को देते हुए बच्चों के मन में यह विश्वास भर दें कि हर परिस्थति में हम तुम्हारे साथ हैं। कुछ इसी तरह की परवरिश पाकर बड़ी हुई पत्रकार और कहानीकार आकांक्षा पारे काशिव (Akanksha Pare Kashiv)। अपनी शादी तक सांवले रंग और दुबलेपन को लेकर कई लोगों ने कई तरह के ताने दिए। पर परिवार ने हमेशा उनका हौसला बनाये रखा। यही वजह है कि आकांक्षा अपने जीवन में वह कर पाईं जो करना चाहती थीं। ऐसी इंसान बन सकीं जैसी वे बनना चाहती थीं- शांत, सृजनशील और मजबूत।
आकांक्षा का जन्म उनके ननिहाल जबलपुर में 18 दिसम्बर, 1976 को हुआ। उनकी माँ श्रीमती मनोरमा पारे गृहणी हैं और पिता श्री दामोदर पारे इन्दौर के शासकीय अष्टांग आयुर्वेद कॉलेज (ashtang ayurved college) में व्याख्याता थे। वे पाँच भाई बहन थीं, दुर्भाग्यवश उनके एक भाई का देहांत एक ट्रेन दुर्घटना में मात्र 20 वर्ष की आयु में हो गया। इकलौती लड़की होने के कारण माता-पिता के साथ ही भाइयों का भी उन्हें खूब स्नेह मिला। आकांक्षा याद करती हैं, उनके बड़े भाई सुशील को यदि पता चल जाता कि आकांक्षा को अमुक वस्तु पसन्द है, तो किसी भी सूरत में वे लेकर हाज़िर हो जाते। उनका परिवार अलग है - इस बात का अहसास उन्हें होश संभालने के बाद अपनी सहेलियों से मिलने पर हुआ, जो बतातीं कि पहनने-ओढ़ने, कहीं आने-जाने पर उनके घर में कितनी पाबंदियां हैं, बहन को नियंत्रण में रखने के लिए भाई कितना धौंस जमाते हैं।
आकांक्षा की प्राथमिक शिक्षा लोकमान्य नगर, इंदौर के ज्ञानदीप नर्सरी स्कूल से हुई क्योंकि उस समय उनका परिवार वहीं रहता था, फिर 8वीं तक की शिक्षा इंदौर के ही बैंक कॉलोनी स्थित स्टार हायर सेकेंडरी स्कूल में हुई। बाद में वे 9वीं से शासकीय मालव कन्या उच्चतर विद्यालय में चली गईं, जहां से उन्होंने 12वीं पास की।
आकांक्षा का बचपन खुशहाल था और कई मायनों में दूसरों से अलग भी। इस अर्थ में कि चार भाई के बीच उनका पालन पोषण भी भाइयों की तरह ही हुआ। कहीं कोई भेदभाव नहीं। उनके पिताजी का उसूल था हर काम सभी को आना चाहिए। यानी झाड़ू ही लगानी है, तो अलग-अलग दिनों में सभी की बारी आएगी। बिजली का बिल या टेलीफोन बिल जमा करने का काम भी हर महीने बारी-बारी से सभी भाई-बहनों के जिम्मे आता था। आकांक्षा कहती हैं, “मैं साधारण चेहरे-मोहरे वाली लड़की थी और पढ़ाई में भी कोई खास नहीं थी। परीक्षा के बाद जब बच्चों के परिणाम आते, तो माँ मनाती थीं कि बस आकांक्षा पास हो जाए।”
हालाँकि, उनके माता-पिता को उनके कम अंक लाने से कोई बड़ी शिकायत नहीं थी, क्योंकि स्कूल की अन्य गतिविधियों में वे बढ़-चढ़कर हिस्सा लेती थीं और कई पुरस्कार भी जीतकर लाती थीं। उस समय रस्सीकूद में उनका कोई सानी नहीं था। भाषण और निबंध प्रतियोगिताओं में भी वे हमेशा सबसे आगे रहती थीं।
मगर समाज के बाकी लोगों की सोच उनके माता-पिता जैसी नहीं थी। आकांक्षा कहती हैं, “बहुत ही छोटी उम्र में मुझे अहसास दिलाया जाता था कि मैं सुंदर नहीं हूँ और शादी होना कठिन है। हालाँकि इस बात को लेकर मुझे कभी कोई परेशानी नहीं हुई, क्योंकि परिवार इस बात की परवाह नहीं करता था।” वह एक किस्सा याद करते हुए कहती हैं, “मैं बहुत छोटी थी, जब जबलपुर (ननिहाल) में किसी ने कह दिया, ‘अरे! इसका रंग कितना सांवला है, कौन इससे शादी करेगा।’ उस समय मुझे रोना आ गया। मजे की बात है, तब तक मैं शादी का मतलब भी नहीं समझती थी। तब मौसी बहुत हँसीं और उन्होंने कहा, ‘चिंता मत करो, मैं तुम्हारी शादी करा दूंगी।’”
वर्ष 1993 में बारहवीं करने के बाद विज्ञान विषय लेकर स्नातक करने के लिए आकांक्षा का दाखिला पारीख मणिलाल बलदेवदास गुजराती महाविद्यालय (PMB College) में हुआ। आकांक्षा की माँ भी विज्ञान विषय लेकर स्नातक कर रही थीं, लेकिन प्रथम वर्ष के बाद आगे की पढ़ाई नहीं कर पाईं थीं, इसलिए उनकी इच्छा थी कि आकांक्षा भी विज्ञान विषय लेकर ही पढ़े। मगर विज्ञान में रुचि न होने के कारण आकांक्षा पहले वर्ष में असफल रहीं। हालांकि माँ की इच्छा के चलते उन्होंने बीएससी जारी रखा, लेकिन बाद में उन्होंने इस्लामिया करीमिया महाविद्यालय में प्रवेश ले लिया था।
आगे की पढ़ाई को लेकर असमंजस की स्थिति थी, मगर बड़े भाई साहब ने सुझाव दिया कि चूंकि उन्हें लिखने का शौक है, इसलिए देवी अहिल्या विश्वविद्यालय में - जहां पत्रकारिता की पढ़ाई होती है, वहीं से आगे की पढ़ाई करनी चाहिए। तब तक आकांक्षा को पत्रकारिता या उसकी पढ़ाई के बारे में कुछ नहीं पता था। आकांक्षा ने 1999 में पत्रकारिता विभाग में प्रवेश लिया।
देवी अहिल्या विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग से आकांक्षा ने डिप्लोमा किया। यहां प्रवेश लेने के बाद जैसे उनके जीवन में सब कुछ बदल गया। कक्षा में उनकी गिनती पढ़ाई करने वाली छात्रा के रूप में होने लगी। प्राध्यापक कक्षा में कुछ पूछने के बाद अक्सर कहते, “आकांक्षा के अलावा किसी को इस प्रश्न का उत्तर पता हो तो हाथ उठाए।”
आकांक्षा कहती हैं, “यह मेरे लिए अलग ही अनुभव था। मैं पढ़ाई में हमेशा औसत ही रही, लेकिन पत्रकारिता की कक्षाओं में ऐसा लगता जैसे मैं यही पढ़ने के लिए बनी हूँ।”
ऐसा होना भी स्वाभाविक ही था, क्योंकि आकांक्षा के पिता आयुर्वेद कॉलेज में पढ़ाने से पहले ‘नई दुनिया’ में काम करते थे। उन्हें अखबारों के पृष्ठ, स्तंभ आदि का पूरा ज्ञान था, जो बातचीत के माध्यम से बच्चों तक भी पहुंचता था। उनके बड़े भाई विज्ञापन एजेंसी में काम करते थे और आकांक्षा अक्सर डिज़ाइन पर अपने सुझाव देती थीं। घर में सभी पढ़ने का शौक रखते थे और सभी की रुचि के हिसाब से पत्र-पत्रिकाएँ या किताबें आती थीं। इस पृष्ठभूमि ने पत्रकारिता को समझने में उनकी मदद की और आगे चलकर लेखन में भी मजबूत आधार बना।
एक साल के डिप्लोमा के बाद इंटर्नशिप के लिए दैनिक भास्कर में पांच छात्रों का चयन हुआ, जिनमें से एक आकांक्षा भी थीं। आकांक्षा कहती हैं, “वहाँ हमसे हर तरह का काम करवाया गया। काम सीखने की प्रवृत्ति देखते हुए प्रमाणपत्र देते समय दो हजार वेतन पर नौकरी का प्रस्ताव रखा गया, जिसे मैंने झट से स्वीकार कर लिया।”
वर्ष 2000 में डिप्लोमा की उपाधि लेने के बाद आकांक्षा दैनिक भास्कर, इंदौर में काम करने लगीं, जहाँ मार्गदर्शक के रूप में इशिता मिश्र मिलीं। वे किसी से ज्यादा घुलती-मिलती नहीं थीं। उनके बारे में अन्य सहकर्मियों की राय थी कि वे बेहद सख्त हैं और गलती करने पर बहुत डांटती हैं, मगर आकांक्षा कहती हैं, “मैंने जो भी सीखा, उन्हीं से सीखा। गलती करने पर बेशक डांट पड़ती थी, लेकिन नए-नए काम देकर वे न केवल सिखाती थीं, बल्कि नाम के साथ प्रकाशित भी करती थीं, जो बड़ी बात है।”
उसी समय रूस के राष्ट्रपति पुतिन भारत आए थे, जिन पर एक आलेख लिखने के लिए इशिता जी ने कहा। आकांक्षा कहती हैं, “मेरे लिए यह बड़ी बात थी, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय संबंधों को समझना और लिखना उन्होंने ही सिखाया।” हालाँकि, दैनिक भास्कर, इंदौर में उन्होंने महज आठ-नौ महीने ही काम किया क्योंकि उन्हें वेब दुनिया में बेहतर वेतन पर काम करने का अवसर मिल रहा था। वेब दुनिया में काम करने का अनुभव बहुत ही अच्छा रहा, जहाँ उन्होंने दो साल काम किया। यहाँ आकांक्षा तीन अलग-अलग चैनल - बच्चों की दुनिया, वामा और व्यंजन संभालती थीं। इशिता मिश्र से सीखे हुए सारे गुर यहाँ काम आए।
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लगभग दो साल काम करने के बाद पता चला कि भोपाल का एक बड़ा दैनिक महिलाओं के लिये प्रकाशित होने वाले अपने परिशिष्ट में कुछ नए पन्ने जोड़ने की योजना बना रहा है और उसके लिए योग्य उम्मीदवार चाहिए। वर्ष 2003 में आकांक्षा ने साक्षात्कार दिया और चुन ली गईं। हालाँकि घर में माँ नाराज हो गईं क्योंकि अब तक वे इंदौर में ही काम कर रही थीं और किसी दूसरे शहर में लड़की को भेजना उन्हें ठीक नहीं लग रहा था। लेकिन ऐसे समय में पिता और बड़े भाई ने साथ दिया और भोपाल आने की मंजूरी मिल गई।
लगभग छह महीने भोपाल में अच्छी तरह गुजरे, फिर उन्हें दूसरे विभाग में भेज दिया गया, जहाँ के अनुभव बहुत अच्छे नहीं रहे। उस विभाग की तत्कालीन प्रभारी का व्यवहार अत्यंत कटु था। बमुश्किल ही कोई लेख आकांक्षा के नाम से प्रकाशित हो पाता। इसी दौरान एक और घटना हुई। वह दैनिक अखबार अपने यहाँ कार्यरत प्रतिभाओं को प्रोत्साहित करने के लिए कुछ पुरस्कार देता था। आकांक्षा उसके लिये आवेदन कर पातीं, उसके पहले उनके कागज़ ही गायब कर दिया गया, हालाँकि बाद में संपादक के हस्तक्षेप से फिर आवेदन करवाया गया और वे पुरस्कृत भी हुईं। मगर उनका मन उचट गया और वे वहाँ से बाहर निकलने का मौका तलाशने लगीं। उन्होंने दिल्ली से प्रकाशित महिला पत्रिका वनिता में आवेदन कर दिया।
लिखित परीक्षा और साक्षात्कार में सफल रहने के बाद वर्ष 2005 में आकांक्षा दिल्ली आ गईं। वनिता के कार्यालय में उन्हें दोस्ताना माहौल मिला, इसलिए कड़वी यादों को जेहन से झटककर वे आगे बढ़ गईं। यहाँ की संपादक रश्मि काव थीं, जिन्होंने अलग-अलग तरह के चुनौतीपूर्ण काम करवाए। रश्मि काव ने उन्हें व्यंग्य लिखने के लिए प्रेरित किया। तभी उन्हें पता चला कि वे व्यंग्य भी लिख सकती हैं।
वर्ष 2008 में आकांक्षा आउटलुक पत्रिका में आ गईं। आकांक्षा कहती हैं, “यहाँ आलोक मेहता के रूप में मुझे जिद्दी संपादक मिले, वे हर सहकर्मी के भीतर चुनौती स्वीकार करने का जज़्बा भर देते थे। उनके सामने कोई हार नहीं मान सकता था। उनकी वजह से मेरे भीतर चुनौती को स्वीकार करने और उसे पूरा करने की हिम्मत मिली। बाद में आलोक मेहता के जाने के बाद नीलाभ मिश्र संपादक हो गए, जो संपादक कम और अपने दोस्ताना व्यवहार के लिए ज्यादा जाने जाते थे।”
वर्ष 2010 में आकांक्षा ने अपनी पहली कहानी ‘तीन सहेलियाँ, तीन प्रेमी’ लिखी, जो नया ज्ञानोदय पत्रिका में प्रकाशित हुई और प्रशंसित भी हुई। इस कहानी पर उन्हें रमाकांत स्मृति पुरस्कार मिला। अगली कहानी ‘शिफ्ट डिलीट’ हंस में छपी। इस कहानी को भी राजेन्द्र यादव हंस कथा सम्मान मिला। प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में जगह मिलने के परिणामस्वरूप उनका कहानी लेखन का सिलसिला आगे बढ़ता गया।
वर्ष 2011 में आकांक्षा का विवाह श्री आनंद स्वरूप से हुआ। यह विवाह माता-पिता द्वारा तय किया गया था, लेकिन विवाह से पहले आनंद जी उनसे मिलने दिल्ली आए थे। थोड़ी देर की बातचीत के बाद ही आकांक्षा को लगा कि इनके साथ जीवन बिताया जा सकता है। फोन पर उन्होंने अपने घरवालों से कहा, “अगर आनंद जी को कोई दिक्कत नहीं है, तो आप सभी को दामाद मुबारक!”
विवाह के बाद इसी वर्ष आकांक्षा ने उत्तराखंड संस्कृत विश्वविद्यालय से पत्रकारिता विषय में स्नातकोत्तर की उपाधि हासिल की।
वास्तव में आनंद जी आकांक्षा की आकांक्षाओं के अनुरूप ही निकले। वर्ष 2018 में उन्होंने बेटे को जन्म दिया। वर्ष 2025 में उन्होंने रेनेसां विश्वविद्यालय से पीएचडी पूरी की। वर्तमान में आकांक्षा आउटलुक में वरिष्ठ सहायक संपादक के पद पर कार्यरत हैं और परिवार के साथ दिल्ली में रहती हैं।
साहित्यिक उपलब्धियां
पत्रकारिता बेशक आकांक्षा के जीवन का अभिन्न हिस्सा है, मगर साहित्य ने उनकी अनुभूतियों को नया आकाश दिया। कथा जगत में प्रवेश करते ही उन्हें पाठकों का ध्यान मिलने लगा। उनकी कई कहानियों को हाथों-हाथ लिया गया, जैसे आकांक्षा की कहानी ‘तीन सहेलियाँ, तीन प्रेमी’ का कन्नड़ और उर्दू में अनुवाद किया गया। इसी तरह उनकी कहानी ‘शिफ्ट डिलीट’ भी काफी चर्चित रही, जिसका तेलुगु और मलयालम में अनुवाद हुआ। इसके अलावा इस कहानी को तेलंगाना विश्वविद्यालय, गुरु गोविंद सिंह विश्वविद्यालय के पत्रकारिता पाठ्यक्रम में और कालीकट विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम में शामिल किया गया है।
राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के प्रतिष्ठित कार्यक्रम ‘श्रुति’ में उन्हें एकल कहानी पाठ का अवसर मिला। सन्डे इंडियन के साहित्यिक अंक के चयनित एक सौ ग्यारह लेखकों में भी उन्हें स्थान प्राप्त हुआ। जर्मनी के ट्यूबिंगन विश्वविद्यालय के कर्मेंदु शिशिर शोधागार द्वारा निर्मित साहित्यिक वीडियो पत्रिका ‘साझा’ में उनकी कविताएँ भी शामिल हैं।'
प्रकाशित कृतियाँ
• एक टुकड़ा आसमान (कविता संग्रह, संवेद प्रकाशन)
• पांच कहानी संग्रह
• तीन सहेलियां तीन प्रेमी (कहानी संग्रह, राजकमल प्रकाशन)
• बहत्तर धड़कनें तिहत्तर अरमान (कहानी संग्रह, सामयिक प्रकाशन)
• मैं और मेरी कहानियां (कहानी संग्रह, कौटिल्य प्रकाशन)
• पिघली हुई लड़की (कहानी संग्रह, राजपाल एंड संस)
• कथा सप्तक (शिवना प्रकाशन)
पुरस्कार / सम्मान
• 2011 इंदौर, मध्यप्रदेश में इंदौर प्रेस क्लब एवं प्रभाष जोशी न्यास द्वारा पत्रकारिता सम्मान
• 2011 कहानी के लिए प्रतिष्ठित 14 वां रमाकांत कथा स्मृति पुरस्कार
• 2012 इला-त्रिवेणी सम्मान
• 2013 अचलेश्वर मंदिर फाउंडेशन, डाला का युवा सम्मान
• 2014 राजेन्द्र यादव हंस कथा सम्मान
• 2015 श्याम धर पत्रकारिता सम्मान
• 2017 प्रतिलिपि कथा सम्मान (डियर पापा कहानी के लिए)
• 2019 कृष्ण प्रताप कथा सम्मान समिति का कृष्ण प्रताप कथा सम्मान
• 2021 मारवाह स्टूडियो का सूरजप्रकाश मारवाह साहित्य रत्न सम्मान
• 2022 पहल-सविता दानी कहानी सम्मान
• 2024 बीपीए फाउंडेशन एवं इंडिया नेटबुक्स कालीचरण मिश्रा साहित्य भूषण सम्मान
• 2024 विष्णु प्रभाकर प्रतिष्ठान और गांधी हिंदुस्तानी साहित्य सभा का सन्निधि विष्णु प्रभाकर राष्ट्रीय सम्मान
• 2025 संपादन निकट विशेषांक
सन्दर्भ स्रोत : आकांक्षा पारे काशिव से सारिका ठाकुर की बातचीत पर आधारित
© मीडियाटिक



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