बॉम्बे हाईकोर्ट : माता-पिता की देखभाल

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बॉम्बे हाईकोर्ट : माता-पिता की देखभाल
करना बच्चों की क़ानूनी ज़िम्मेदारी

बॉम्बे हाईकोर्ट ने माना कि माता-पिता की देखभाल और भरण-पोषण करने की बच्चों की ज़िम्मेदारी, मेंटेनेंस एंड वेलफेयर ऑफ़ पेरेंट्स एंड सीनियर सिटिज़न्स एक्ट, 2007 के तहत बिना शर्त कानूनी ज़िम्मेदारी है। यह इस बात पर निर्भर नहीं करता कि बच्चे के पास माता-पिता की प्रॉपर्टी है या नहीं, या वह उसे विरासत में मिलेगी या नहीं। कोर्ट ने कहा कि बुजुर्ग और मेडिकली कमज़ोर माता-पिता को छोड़ना या उनकी अनदेखी करना, सीनियर सिटिज़न्स के लिए सम्मान, सेहत और एक अच्छी ज़िंदगी पक्की करने वाली संवैधानिक और कानूनी गारंटी के दिल पर चोट करता है। 

जस्टिस ए.एस. गडकरी और जस्टिस रंजीतसिंह राजा भोंसले की खंडपीठ बांद्रा होली फैमिली हॉस्पिटल सोसाइटी और उसके हॉस्पिटल की तरफ़ से दायर याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जो 76 साल की महिला मोहिनी पुरी के बेटे (रिस्पॉन्डेंट नंबर 3) के बकाया मेडिकल बिल भरने और इलाज के बाद उन्हें घर ले जाने से मना करने बाद से उनकी देखभाल कर रहा है। कोर्ट ने कहा कि मिसेज पुरी को 24 अगस्त 2025 को एक्यूट स्ट्रोक की वजह से बहुत ज़्यादा कुपोषित और अस्थिर हालत में भर्ती कराया गया। हॉस्पिटल ने लगभग ₹16,00,000 का बकाया होने के बावजूद उनका इलाज जारी रखा। बेटे ने मेडिकल लापरवाही के आरोप लगाए और अपनी माँ की देखभाल की ज़िम्मेदारी लेने से बचता रहा। यहां तक कि कोर्ट के कहने पर भी उसने उनकी देखभाल का अंडरटेकिंग देने से मना कर दिया। 

कोर्ट ने शामिल पुलिस ऑफिसर और सीनियर सिटीज़न ट्रिब्यूनल के काम में कोई कार्रवाई न करने पर दुख जताया। कोर्ट ने कहा कि मरीज़ को छोड़े जाने के बारे में पता चलने पर रेस्पोंडेंट नंबर 2 की यह कानूनी ड्यूटी थी कि वह एक्ट के तहत कदम उठाए। उसकी तरफ से कोई कार्रवाई न करना मेंटेनेंस एंड वेलफेयर ऑफ़ पेरेंट्स एंड सीनियर सिटीज़न्स एक्ट, 2007 के मकसद और लक्ष्य को ही खत्म कर देता है। 

कोर्ट ने कहा कि बेटे के काम से पहली नज़र में पूरी तरह से लापरवाही और छोड़े जाने का मामला दिखता है। सीनियर सिटिज़न्स एक्ट के सेक्शन 4 और 23 का ज़िक्र करते हुए बेंच ने कहा कि माता-पिता का भरण-पोषण और देखभाल करने की बच्चे की ज़िम्मेदारी "बिना शर्त के होती है और जन्म से ही पैदा होती है," जबकि किसी रिश्तेदार की ज़िम्मेदारी संपत्ति पर कब्ज़ा या विरासत से जुड़ी होती है। 

कोर्ट ने कहा- "माता-पिता या सीनियर सिटिज़न की देखभाल करने की बच्चे/बच्चों की ज़िम्मेदारी और कर्तव्य, माता-पिता या सीनियर की संपत्ति पर कब्ज़ा होने की शर्त पर नहीं है। यह ज़िम्मेदारी बच्चे पर जन्म से ही होती है और बिना शर्त होती है। नैतिक और पवित्र कर्तव्य होने के अलावा, यह कानून द्वारा लगाया गया एक कानूनी कर्तव्य भी है।" कोर्ट ने आगे कहा कि मेंटेनेंस ट्रिब्यूनल को राज्य की देखभाल के दौरान माँ की चल और अचल संपत्तियों की सुरक्षा के लिए सुरक्षा आदेशों पर भी विचार करने की ज़रूरत हो सकती है। 

हाईकोर्ट ने तुरंत मेडिकल देखभाल के लिए डिटेल्ड निर्देश जारी किए, जिसमें उन्हें मेडिकल देखरेख में भाभा हॉस्पिटल में शिफ्ट करना, अगर बेटा ऐसा नहीं करता है तो इलाज का खर्च राज्य को उठाने का निर्देश देना, मेंटेनेंस ट्रिब्यूनल को सीनियर सिटिज़न्स एक्ट के तहत ज़रूरी कदम उठाने के लिए कहना, बेटे को कोर्ट की इजाज़त के बिना उनकी प्रॉपर्टी से डील करने से रोकना और उन्हें उनकी सभी चल और अचल संपत्ति बताने का निर्देश देना शामिल था। इन शर्तों पर याचिका मंजूर कर ली गई।

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