कुसुम कुमारी जैन

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कुसुम कुमारी जैन

चित्रांकन : ज़ेहरा कागज़ी

सामाजिक कार्यकर्ता 

समाजसेवी कुसुम जैन का जन्म 1929 में दिल्ली के प्रतिष्ठित जौहरी कपूरचंद सुजन्ती के यहां हुआ। उनकी माँ का नाम नीलम था। कुछ समय पश्चात व्यवसाय के उद्देश्य से यह परिवार बर्मा के मोगोक शहर चला गया। करीब 10 साल वहां रहने के बाद दूसरे विश्व युद्ध में जापानी हमले के कारण उन्हें स्वदेश लौटना पड़ा। हिमाचल प्रदेश के सोलन को उन्होंने अपना ठिकाना बनाया। कुसुम जी की प्रारंभिक शिक्षा बर्मा एवं सोलन में हुई।

वर्ष 1948 में कुसुम जी का विवाह म.प्र. के झाबुआ रियासत के तत्कालीन खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति मंत्री हजारीलाल जैन के साथ हुआ। विवाहोपरांत वे आगे की पढ़ाई के लिए शांति निकेतन चली गईं। आगरा विश्वविद्यालय से बी.ए. करने के बाद वे पति के साथ ग्वालियर में बस गईं। मध्यभारत के तत्कालीन मुख्यमंत्री तखतमल जी की प्रेरणा से सन् 1955 में कुसुम जी ने राजनीति में प्रवेश किया और दो साल बाद 1957 में ग्वालियर नगर निगम की पार्षद बनीं तथा वर्ष 1959 में उप महापौर का पद ग्रहण किया। जनसंघ के नारायण कृष्ण शेजवलकर तब महापौर थे। उनके लम्बे लंदन प्रवास ने कुसुम जी को महापौर के पद पर स्थापित किया।

‘अम्मा'  के नाम से लोकप्रिय कुसुम जी सादा जीवन- उच्च विचार की जीती-जागती तस्वीर थीं। उनका जीवन गांधी जी के सिद्धांतों एवं विचारों के अनुरूप रहा। उन्हें कई बार तरह-तरह के प्रलोभन दिए गये, जिन्हें उन्होंने ठुकरा दिया। वे जब तक जीवित रहीं, खादी और सूती वस्त्रों का ही उपयोग करती रहीं। नारी शिक्षा और उनका आर्थिक-सामाजिक उत्थान उनके प्रिय कार्य क्षेत्र थे। साहित्य अध्ययन तथा विशेष रूप से हिन्दी भाषा के विकास और संरक्षण के साथ भारतीय संस्कृति की रक्षा हेतु वह हमेशा प्रयत्नशील रहीं। जैन शास्त्रों के अध्ययन के साथ-साथ रामायण एवं गीता उनके प्रिय तथा मार्गदर्शी ग्रंथ रहे है। कुसुम जी के जीवन का एक प्रेरक प्रसंग यह है कि उनके माली की पुत्री मुमताज कम उम्र में ही विधवा हो गई और उसने यह कहते हुए कि वह दूसरे पुरूष को अपना शरीर नहीं छूने देगी, दूसरी शादी करने से इनकार कर दिया। उसकी इस दृढ़ता से कुसुम जी बहुत प्रभावित हुईं और उन्होंने मुमताज को अपनी बेटी मान लिया। अपने अंतिम समय तक वे उसका भरण-पोषण करती रहीं।

उनका सरल, सहज, मिलनसार, एवं प्रेममयी व्यक्तित्व प्रत्येक को उनकी तरफ खींच लेता था। सभी को अपने हाथ से भोजन बना कर खिलाना उनका शौक था। महापौर रहते हुए भी वे भोजन स्वयं ही बनाया करती थीं। सन् 1960-61 में वे पति के साथ भोपाल आ गईं, क्योंकि उनके लिए परिवार राजनीति से ज़्यादा ज़रूरी था। लेकिन यहाँ भी उनके नेतृत्व में महिलाओं के सशक्तिकरण का काम शुरू हो गया और इस तरह वह पुन: भोपाल की राजनीति में सक्रिय हो गईं। महिलाओं और बच्चों के विकास के लिए उन्होंने समाज सेवा केन्द्र नामक संस्था की स्थापना भी की। दिन प्रतिदिन प्रदूषित होती राजनीति के कारण उन्होंने खुद को सामाजिक कार्यों तक ही सीमित कर लिया। 14 फरवरी 2008 को उनका निधन हो गया। उनके पुत्र विपिन कुमार जैन मप्र लघु उद्योग महासंघ के स्थायी महासचिव हैं और पुत्री गरिमा टोरंटो में निवासरत है।

सन्दर्भ स्रोत : विपिन कुमार जैन

© मीडियाटिक

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