छाया : शुचि मुले के फेसबुक अकाउंट से
भोपाल की 34 वर्षीय सॉफ्टवेयर इंजीनियर से आर्टिस्ट बनीं शुचि मुले ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शहर का नाम रोशन किया है। शुचि उन 107 कलाकारों में शामिल रहीं, जिन्होंने डच मूल के प्रसिद्ध फ्रांसीसी कलाकार विन्सेंट वैन गॉग पर आधारित फिल्म ‘लविंग विंसेंट’ के लिए 1,000 से अधिक कैनवस पर करीब 62,000 पेंटेड फ्रेम तैयार किए।
‘लविंग विंसेंट’ दुनिया की पहली ऐसी फीचर फिल्म है, जो पूरी तरह पेंटिंग्स से बनाई गई है। इस फिल्म को ऑस्कर विजेता ब्रिटिश प्रोड्यूसर ह्यू वेल्चमैन ने प्रोड्यूस किया है। फिल्म में वैन गॉग के जीवन और उनकी रहस्यमयी मृत्यु की कहानी को कला के माध्यम से जीवंत किया गया है।
वैन गॉग पोस्ट-इंप्रेशनिस्ट मूवमेंट के सबसे चर्चित कलाकारों में से एक थे, जिसकी जड़ें 1886 के दशक में फ्रांस में जमी थीं। उनकी कला और जीवन की त्रासदी को इस फीचर-लेंथ पेंटेड एनिमेशन फिल्म में अमर कर दिया गया है। इस प्रोजेक्ट के लिए दुनिया भर से आए एक हजार से अधिक आवेदन में से भोपाल की शुचि मुले का चयन किया गया था। अपने सफर के बारे में शुचि बताती हैं कि उन्होंने बचपन से ही पेंटिंग शुरू कर दी थी, लेकिन वर्ष 2012 में वे प्रोफेशनल आर्टिस्ट बनीं।
शुचि ने बताया कि वे अमेरिका के सैन फ्रांसिस्को में सॉफ्टवेयर इंजीनियर के तौर पर काम कर रही थीं। वीकेंड पर आर्ट क्लास जॉइन करना उनके लिए एक शौक था, जो धीरे-धीरे पैशन बन गया। वर्ष 2014 में उन्होंने अपनी नौकरी छोड़कर फुल-टाइम पेंटिंग सीखने का फैसला किया। फिल्म निर्माण की प्रक्रिया को लेकर शुचि ने बताया कि हर फ्रेम को कैनवस पर पूरी पेंटिंग की तरह बनाया गया। एक ही शॉट के लिए कलाकारों को बार-बार उसी पेंटिंग पर काम करना पड़ता था। एनिमेटर्स ने लाइव-एक्शन इमेज की मदद से फिल्म को स्मूथ और फ्लूइड बनाया।
फिल्म में कुल 853 शॉट्स हैं और टीम ने 853 पेंटिंग्स तैयार कीं, जिनमें से 42 पेंटिंग्स पहले ही फिल्म की आधिकारिक वेबसाइट पर बिक्री के लिए उपलब्ध कराई गई थीं। जब शुचि से पूछा गया कि क्या वे खुद को पोस्ट-इंप्रेशनिस्ट आर्टिस्ट मानती हैं, तो उन्होंने कहा कि वे एक रिप्रेजेंटेशनल आर्टिस्ट हैं। एम्स्टर्डम में वैन गॉग म्यूजियम जाने से पहले उन्हें इंप्रेशनिज्म के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं थी, लेकिन वहीं से उन्हें वैन गॉग की शैली में गहरी रुचि हुई। वे आज भी अपनी पेंटिंग स्टाइल को लगातार निखार रही हैं।
इतिहास में दर्ज हुआ नाम
इतनी बड़ी उपलब्धि हासिल करने के सवाल पर शुचि बताती हैं कि जब उन्होंने ‘लविंग विंसेंट’ का ट्रेलर देखा, तो उसका कॉन्सेप्ट उन्हें बेहद पसंद आया। इसके बाद उन्होंने फिल्म से जुड़े हर व्यक्ति से संपर्क किया और लगातार एक महीने तक अपना पोर्टफोलियो भेजती रहीं। लगातार फॉलो-अप के बाद उन्हें पोलैंड में तीन दिन के टेस्ट के लिए बुलाया गया। इस दौरान न केवल वैन गॉग की ब्रश-स्ट्रोक तकनीक सीखनी पड़ी, बल्कि फिल्म में इस्तेमाल होने वाले एनिमेशन सॉफ्टवेयर की भी ट्रेनिंग दी गई। तीन दिन की कड़ी परीक्षा के बाद वे सफल रहीं, जिसके बाद 16 दिन की और भी कठिन ट्रेनिंग हुई।
शुचि बताती हैं कि फिल्म के एक सेकंड में 12 पेंटिंग्स का इस्तेमाल होता है। उनकी पसंदीदा वैन गॉग पेंटिंग ‘व्हीटफील्ड्स विद क्रोज़’ है। एक सीन को पेंट करने में कभी एक हफ्ता तो कभी तीन महीने या उससे भी ज्यादा समय लग जाता था। पोलैंड में काम पूरा करने के बाद शुचि भारत लौट आईं। फिलहाल वे पेंटिंग से जुड़ी वर्कशॉप और डेमो आयोजित कर कला के प्रति लोगों को प्रेरित कर रही हैं।
सन्दर्भ स्रोत : दैनिक जागरण
संपादन : मीडियाटिक डेस्क



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