मुकदमे के बजाय समझौते के लिए प्रोत्साहित करती थीं शिप्रा शर्मा

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मुकदमे के बजाय समझौते के लिए प्रोत्साहित करती थीं शिप्रा शर्मा

छाया :सौम्या शर्मा

विधि-विशेषज्ञ 

• सारिका ठाकुर

आज लगभग हर क्षेत्र में महिलाएं अपनी उपस्थिति दर्ज करवा रही हैं, फिर भी कुछ क्षेत्र ऐसे हैं जिनमें लैंगिक अनुपात असंतुलित है। न्यायपालिका भी ऐसा ही क्षेत्र है। हालांकि अब तो अनगिनत महिलाएं इस क्षेत्र को अपने करियर विकल्प के तौर पर देख रही हैं, इसलिए आने वाले समय में इस अनुपात के सुधरने की उम्मीद भी की जा सकती है। लेकिन जिस दौर में शिप्रा शर्मा न्यायिक सेवा में पहुंची उस समय इक्का दुक्का महिलाएं ही इस क्षेत्र में सक्रिय थीं।

शिप्रा जी बिहार के मैथिल ब्राह्मण समुदाय से सम्बंधित हैं। उनके पूर्वज कोई 7-8 सौ साल पहले छत्तीसगढ़ में आकर बस गए थे। ये परिवार बिहार की अपनी बिरादरी के बनिस्बत ज़्यादा व्यवहारिक और प्रगतिशील साबित हुए। उन्होंने बेटे-बेटी में कोई भेद न करते हुए दोनों को समान रूप से आगे बढ़ने का अवसर दिया। शिप्रा जी और उनके सभी भाई-बहनों के सफल करियर के पीछे इस सांस्कृतिक बदलाव की भी भूमिका रही।

30 नवंबर 1958 को जगदलपुर में जन्मी क्षिप्रा जी के पिता श्री सुरेश दत्त झा हाईकोर्ट जज थे और मप्र के लोकायुक्त के रूप में पदस्थ हुए थे, जबकि माँ श्रीमती नीना झा एक सामाजिक कार्यकर्ता थीं। जगदलुर में रहते हुए उन्होंने महिलाओं की शिक्षा और स्वास्थ्य पर उल्लेखनीय काम किये। आगे चलकर वे बाल न्यायालय की मानद न्यायाधीश के रूप में भी कार्यरत रही थीं। शिप्रा जी की 10वीं तक की शिक्षा जगदलपुर में ही हुई। पिताजी के तबादले के कारण 11वीं की पढ़ाई जेआर दानी स्कूल, रायपुर से हुई।

शिप्रा जी बचपन से ही कम बोलने वाली, पढ़ाई में गुम रहने वाली, समझदार सी बच्ची थीं, जो क्लास में हमेशा अव्वल आती थी। उनकी कभी किसी से लड़ाई नहीं होती थी। उनकी बहन इरा लिखती हैं – “वे ऑलराउंडर थी। मेरे प्रोफेशन में भी उनका गहरा दखल था। वे हिन्दी और अंग्रेज़ी की उम्दा लेखक थीं, और नाटककार भी। आप जब कहें वे धार-धार रोकर दिखा सकती थीं और जब कहें ठठाकर हंस सकती थी। किसी ने बताया कि वे न्यायिक सेवा में भी नाटक के लिए इनाम पा चुकी थीं। मुझसे एकदम उलट थीं वे। मैं बेहद नटखट तो वो अनुशासित रानी बिटिया। मैं महा नास्तिक तो वे बेहद आध्यात्मिक। मैं फैशन की महा शौकीन तो वे एक उम्र के बाद साड़ी में सीमित रहने वाली अफ़सर। मेरी छुट्टियों के मायने थे देश-विदेश और शॉपिंग वगैरह तो उनकी छुट्टियां सांवरिया जी, सिद्धि विनायक, महाकाल में कटतीं।”

ग्रेजुएशन के समय वे भोपाल आ गई थीं। उनका दाखिला नूतन कॉलेज में हुआ था और अंतिम वर्ष में वे मिस भोपाल चुनी गई थीं। इरा जी लिखती हैं – “मैं तो जल मरी थी। भला ये मुझसे अच्छी कैसे?  उसकी लंबाई मुझसे कम थी और मैंने अपनी मां को उस दिन यह पूछ-पूछ कर हलकान कर डाला था कि ठिगनी लड़की कैसे भोपाल सुंदरी बन सकती है। हालांकि उस प्रतियोगिता से मेरा कुछ लेना-देना नहीं था, लेकिन हम बहनों में गजब की स्पर्धा थी और प्रेम भी। ”

1978 में स्नातक की उपाधि प्राप्त करने के बाद उन्होंने इरा जी के साथ ही लॉ कॉलेज में एडमिशन लिया और एक साथ ही दोनों बहनों ने अपने करियर की शुरुआत की। 10 मार्च 1983 से  शिप्राजी न्यायिक सेवा में आ गईं जबकि इरा जी दिल्ली प्रेस से जुड़ गईं। इसके बाद अलग अलग जिला एवं सत्र न्यायालयों में उनकी पोस्टिंग होती रही। शिप्रा जी उसूलों की पक्की और निर्भीक न्यायाधीश सिद्ध हुईं।

वर्ष 1983 से वर्ष 1988 तक भोपाल फिर 1989 से 93 तक इंदौर में बतौर सिविल जज पदस्थ रहीं। 1993 से 1997 तक धार में वे चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट और उसके बाद अतिरिक्त जिला न्यायाधीश के रूप में पदस्थ हुईं। फिर उनका तबादला रतलाम हुआ जहां वे 1997 से 2001 तक अतिरिक्त जिला न्यायाधीश के पद पर कार्यरत रहीं। 2001 से लेकर 2005 तक की अवधि चुनौतीपूर्ण थी क्योंकि इस दौरान वे इंदौर में एक बार फिर पदस्थ हुई और अतिरिक्त जिला न्यायाधीश के अलावा सी.बी.आई. की स्पेशल जज भी रहीं। 2005-2006 में जबलपुर में बतौर स्पेशल जज (अजा/जजा) जिम्मेदारी संभालने के बाद 2006-2009 में वे खंडवा आ गईं और डिस्ट्रिक्ट जज के रूप में, उपभोक्ता फोरम की कमान संभाली। इसके बाद वे नरसिंहपुर (2009-2011), धार(2011-2014) और नीमच (2014) में जिला एवं सत्र न्यायाधीश के रूप में कार्यरत रहीं।

18 अक्टूबर 2014 को नीमच में ही उनका देहांत हो गया, उस समय उनकी पदोन्नति हाईकोर्ट जज के रूप में होने वाली थी। 31 साल और 8 महीने के सेवाकाल में उन्होंने अपनी अमिट छाप छोड़ी। शिप्रा जी की दंत चिकित्सक बेटी सौम्या शर्मा अपने ब्लॉग में लिखती हैं कि उस दिन रात के बारह बजे तक मैं उनसे अपनी स्वर्गीय नानी के बारे में बातें कर रही थीं। मैं उनसे पूछ रही थी कि, आपको उनकी याद नहीं आती? मैं तो आपके बिना अपनी जिन्दगी के बारे में सोच भी नहीं सकती। इस सवाल के जवाब में उन्होंने कहा था, “इन हादसों के बाद भी आप आगे बढ़ जाते हैं, पता नहीं चलता वक्त कैसे आगे बढ़ जाता है लेकिन जब पीछे मुड़कर देखो तो सब कुछ वैसा ही ठहरा हुआ सा लगता है।” जिस रात माँ-बेटी के बीच यह संवाद चल रहा था, उस रात की सुबह शिप्राजी के लिए नहीं हुई। सौम्या कहती हैं, “वह बहुत बड़े ओहदे पर काम करती थीं, बहुत व्यस्त थीं लेकिन हमें कभी महसूस नहीं होने दिया कि उनके पास वक्त नहीं है। वह हमेशा हमारे करीब रहीं।”

उनका स्वभाव सौम्य और मृदु था। लेकिन यह उनकी कमज़ोरी नहीं थी। अक्सर पारिवारिक मुद्दों पर वह असीम संवेदना का परिचय देती थीं। एक बार धार में नेशनल अदालत में एक विवाद को निपटाते हुए उन्होंने कहा था, “दो भाइयों में यदि विवाद हो गया और एक भाई को सजा हो जाती है दोनों के परिवारों के बीच पीढ़ी दर पीढ़ी की दुश्मनी हो जाती है। इसके बजाय अगर उनमें राजीनामा हो जाता है दोनों के बीच कटुता ख़त्म हो जाती है और दोनों ही पक्ष जीत महसूस करते हैं” (सन्दर्भ: दैनिक भास्कर)। अपने अधीनस्थों को वह अक्सर राजीनामे के लिए प्रोत्साहित करती थीं। साथ ही साल दर साल से लंबित पड़े मामलों को जल्द से जल्द निपटाते हुए ताजा मामलों को फ़ौरन निपटाने पर जोर देती थीं। 

चार भाई बहनों में शिप्रा जी दूसरे स्थान पर थीं। सबसे बड़ी बहन इरा झा पत्रकार हैं एवं वर्तमान में दिल्ली में निवास कर रही हैं। शिप्रा जी के बाद उनके छोटे भाई विक्रमादित्य झा हैं, जो जगदलपुर में वकालत कर रहे हैं। उनसे छोटी बहन स्मिता झा राष्ट्रीय महिला आयोग में समन्वयक के पद पर कार्यरत हैं। सबसे छोटी बहन शेफाली झा सागर में रहती हैं और गृहिणी हैं।  

शिप्रा जी लम्बे समय तक विवाह के प्रति उदासीन रहीं। कई रिश्तों को ठुकराने के बाद वर्ष 1991 में इंदौर के डॉ. आशुतोष शर्मा को उन्होंने अपना जीवनसाथी चुना। उस समय वे इंदौर में मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी के पद पर कार्यरत थीं। शादी के बाद उन्हें एक सहयोगी परिवार मिला जिसकी वजह से गृहस्थी और काम दोनों में संतुलन बना रहा। शिप्रा जी और आशुतोष जी की सौम्या के अलावा एक पुत्री देविना शर्मा भी हैं, जो अहमदाबाद में लॉ ऑफिसर हैं।  

सन्दर्भ स्रोत - शिप्रा झा की बहन वरिष्ठ पत्रकार इरा झा और उनकी पुत्री सौम्या शर्मा से सारिका ठाकुर की बातचीत पर आधारित

 

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