शांता भूरिया :  पिटोल  से पेरिस तक का

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शांता भूरिया :  पिटोल  से पेरिस तक का
सफर तय करने वाली पिथौरा चित्रकार

छाया : स्व संप्रेषित 

• सीमा चौबे 

भील समुदाय की जानी-मानी चित्रकार शांता भूरिया का जन्म मध्यप्रदेश के झाबुआ जिले के पिटोल गांव में 27 मई 1983 को हुआ। पद्मश्री से सम्मानित भील चित्रकार भूरी बाई और जौहर सिंह की पुत्री शांता को भले ही कला विरासत में अवश्य मिली, पर उसे संभालना, संघर्षों के बीच बचाए रखना और अपनी अलग पहचान बनाना, उनके लिए बेहद मुश्किल रहा। उन्होंने आर्थिक अभावों और झंझावातों से जूझते हुए माँ से मिली विरासत को न सिर्फ जिम्मेदारी की तरह संभाला, बल्कि गाँव से लेकर अंतरराष्ट्रीय मंच तक भील पिथौरा कला को पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका भी निभाई है।

बचपन : रंग थे, पर संसाधन नहीं

शांता जब महज छह महीने की थीं, तब उनका परिवार मज़दूरी की तलाश में भोपाल आ गया। उस समय परिवार की आर्थिक स्थिति बेहद साधारण थी। माता-पिता दिहाड़ी मजदूर थे। भारत भवन में मजदूरी के दौरान उनकी माँ की मुलाकात प्रसिद्ध चित्रकार जगदीश स्वामीनाथन से हुई, जिसने भूरी बाई के जीवन की दिशा बदल दी। 

घर में कला का वातावरण था, लेकिन साधन सीमित थे। छह भाई-बहनों में सबसे बड़ी शांता अपनी माँ को दीवारों पर चित्र बनाते चुपचाप देखती रहतीं। 12-13 वर्ष की आयु में उन्होंने पहली पेंटिंग बनाई, पर उस समय यह शौक से अधिक ज़िम्मेदारी जैसा था - माँ की मदद करना। शांता घर में उपलब्ध चीजों गेरू, खड़िया और हल्दी से अलग-अलग रंग बनाती। काले रंग के लिए तवे को खुरच लेती और हरा रंग पत्तों से निकालती थी। इन्हीं प्राकृतिक रंगों से वे तरह-तरह की आकृतियां उकेरतीं। कभी मोर, कभी हाथी, कभी चिड़िया, तो कभी अपनी कल्पना के नए रूप। यही छोटे-छोटे प्रयास आगे चलकर उनकी कला-यात्रा की मजबूत नींव बन गए। वे कहती हैं “मेरे बचपन में चित्रकला की नींव मेरी माँ ने रखी। वे स्वयं सुंदर चित्र बनाती थीं और बड़े स्नेह से मुझे भी सिखाती थीं। वे अक्सर कहा करती थीं - ‘कल हम रहें या न रहें, लेकिन हमारी विरासत सहेजी जानी चाहिए।’

विवाह के बाद का संघर्ष

आठवीं कक्षा तक पढ़ाई करने के बाद 31 मार्च 2000 में झाबुआ के समीप स्थित रानापुर निवासी विजय भूरिया - जो उस समय एलएलबी की पढ़ाई कर रहे थे, से उनका विवाह हो गया। विवाह के बाद वे ससुराल चली गईं। वहाँ न भील चित्रकला की समझ थी, न कला के लिए प्रोत्साहन। धीरे-धीरे रंग और कागज़ उनसे दूर होते गए। ससुराल में घरेलू जिम्मेदारियां बढ़ती गईं। इस बीच पहली संतान के रूप में बेटी का जन्म हुआ। उसकी परवरिश, सीमित आय और भविष्य की चिंता उन्हें वापिस भोपाल खींच लाई। लेकिन यहाँ आने के बाद भी गरीबी ने उनका पीछा नहीं छोड़ा. पति विजय को स्थायी नौकरी नहीं मिली जिससे उन्होंने छोटे-मोटे काम कर घर चलाया। आर्थिक संकट इतना गहरा था कि कई बार किराया देने तक के पैसे नहीं होते थे। जीवन की बुनियादी जरूरतें पूरी करना भी कठिन था।

ऐसे समय में उनकी माँ भूरी बाई ने उनकी मदद की और अपने घर का एक कमरा उन्हें रहने के लिए दिया। यह दौर उनके जीवन का सबसे संघर्षपूर्ण दौर था। जब परिस्थितियाँ असहनीय होने लगीं, तब शांता ने दोबारा पेंटिंग शुरू करने का निश्चय किया। वे माँ के साथ चित्र बनाने लगीं. शुरुआत आय बढ़ाने की मजबूरी से हुई, पर धीरे-धीरे यही उनका आत्मविश्वास बन गया। फिर स्वतंत्र रूप से भी काम करने लगीं। हालांकि लंबे अंतराल के बाद ब्रश उठाना आसान नहीं था। रंगों की जानकारी सीमित थी। बाज़ार की समझ नहीं थी, पर भीतर छिपी कला ने उन्हें फिर रास्ता दिखाया।

साल 2005 से उन्होंने देश के विभिन्न शहरों मुंबई, नई दिल्ली, चंडीगढ़, बेंगलुरु, भोपाल और इंदौर में प्रदर्शनियों और कार्यशालाओं में भाग लेना शुरू किया।

पहला बड़ा पड़ाव : एकल प्रदर्शनी

वर्ष 2022 में भोपाल स्थित मध्यप्रदेश राज्य जनजातीय संग्रहालय की लिखंदरा गैलरी में ‘शलाका’ श्रृंखला के अंतर्गत उनकी पहली एकल प्रदर्शनी आयोजित हुई जिसमें उनके बनाए 26 चित्र प्रदर्शित हुए। यह उनके लिए केवल प्रदर्शनी नहीं, बल्कि वर्षों के संघर्ष की स्वीकृति थी। यह उनके उनकी कला जीवन का महत्वपूर्ण पड़ाव था।

अंतरराष्ट्रीय अनुभव

वर्ष 2023 में, उन्हें फ़्रांस में आयोजित एक प्रतिष्ठित प्रदर्शनी में भाग लेने का सुनहरा अवसर प्राप्त हुआ। यह अनुभव न केवल असाधारण था, बल्कि उनके लिए जीवन भर याद रहने वाला एक अविस्मरणीय क्षण भी था। प्रदर्शनी के दौरान, करीब ढाई लाख रुपये के चित्रों की बिक्री हुई। यह अनुभव उनके लिए आत्मविश्वास और वैश्विक पहचान का प्रतीक बना।

कला और विषय-वस्तु

उनके चित्रों में पिथौरा देव, भगोरिया मेला, महुआ बीनती महिलाएँ, पशु-पक्षी, प्रकृति और पर्यावरण जैसे विषय प्रमुखता से दिखाई देते हैं। भील चित्रकला की पारंपरिक बिंदु शैली उनके कार्यों की पहचान है। कोरोना काल की पीड़ा को भी उन्होंने अपने कैनवास पर उतार क्योंकि उस समय आर्थिक और मानसिक संघर्ष उन्होंने स्वयं झेला था।

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सम्मान से बढ़कर संतोष 

शांता को अभी तक कोई बड़ा राष्ट्रीय सरकारी पुरस्कार प्राप्त नहीं हुआ है, लेकिन इससे निराश हुए बिना वे निरंतर अपनी परंपरा को आगे बढ़ा रही हैं। चार बच्चों की परवरिश, आर्थिक संघर्ष और सामाजिक चुनौतियों के बीच शांता ने अपनी कला को जीवित रखा। वे कहती हैं “सच्चा सम्मान तब मिलता है जब लोग आपकी कला को अपनाते हैं। पुरस्कार से बड़ा सुख अपनी परंपरा को जीवित देखना है।” उनके लिए दर्शकों का प्रेम और युवाओं का सीखने का उत्साह ही सबसे बड़ा सम्मान है।

पिछले कई वर्षों से वे कार्यशालाओं के माध्यम से युवाओं को भील पेंटिंग सिखा रही हैं और भील पिथौरा कला को राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिला रही हैं। उनका मानना है “भीली चित्रकला केवल रंगों और आकृतियों का मिश्रण नहीं है, यह हमारी परंपराओं और कहानियों का दस्तावेज है। अगर अगली पीढ़ी इसे नहीं सीखेगी, तो यह कला खत्म हो जाएगी इसलिए जनजातीय कला को संरक्षित करने के लिए युवा पीढ़ी का इसे अपनाना और आगे बढ़ाना बेहद ज़रूरी है।” 

इस समय वे दिल्ली से मिले एक बड़े ऑर्डर पर कार्य कर रही हैं। आज उनका स्वयं का घर बन रहा है, जो उनके उनके जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है। उनकी चार संतानों में रीता, रेणुका और रेखा (तीन बेटियाँ) तथा रोहित (पुत्र) हैं। इनमें से रीता और रेणुका चित्रकला में रुचि ले रही हैं। बड़ी बेटी रीता उच्च शिक्षा प्राप्त कर रही हैं और उनके बनाए चित्रों की भी प्रदर्शनियां लगती हैं। शांता बताती हैं उनकी दोनों बेटियां नवाचार करते हुए चित्र बनाती हैं। उनके पति विजय स्टेशनरी कार्य से जुड़े हैं और शांता के कार्य में उनका सहयोग भी करते हैं।

 

प्रदर्शनियां

• हरियाणा 2008

• नई दिल्ली 2010

• उज्जैन  2011

• इंदिरा गांधी राष्ट्रीय संग्रहालय 2011

• सूरजकुंड मेला हरियाणा 2010

• चंडीगढ़  2012

• जनजातीय संग्रहालय-भोपाल 2013

• भारत भवन- 2014

• रविन्द्र भवन (लोकरंग) 2014

• जम्मू कश्मीर 2015

• केरलम् 2016

• खजुराहो 2017

• विधानसभा/ राजभवन, भोपाल  2017

• बैंगलौर 2018

• कान्हा नेशनल पार्क (मंडला) 2018

• उत्तराखंड 2019

• पेरिस (फ्रांस) 2023

• इंदौर, अमरकंटक, बांधवगढ़ आदि

सन्दर्भ स्रोत : शांता भूरिया से सीमा चौबे की बातचीत पर आधारित 

© मीडियाटिक

 

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