शर्मीली बच्ची से सशक्त अभिनेत्री तक

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शर्मीली बच्ची से सशक्त अभिनेत्री तक
का सफ़र तय करने वाली समता सागर 

छाया: लेटेस्ट ली डॉट कॉम 

प्रतिभा - टेलीविजन, सिनेमा और रंगमंच

• सारिका ठाकुर

छोटे पर्दे पर हास्य और सहायक चरित्रों में जान फूंक देने वाली वरिष्ठ अभिनेत्री समता सागर विभिन्न भूमिकाओं में जितनी सहज दिखती हैं, वास्तविक जीवन में भी उतनी ही सहज और सरल हैं। एक लंबा अरसा मायानगरी मुंबई में गुजारने के बावजूद भोपाल की भोली-भाली ‘समता’ आज भी उनके भीतर न केवल जिन्दा है बल्कि जिन्दादिली से अपने आस-पास के लोगों के बीच हंसी और मुस्कराहट बाँट रही है। उनकी यही खासियत उन्हें मुकम्मल तौर पर ‘समता सागर’ बनाती है।समता जी का जन्म 27 अक्टूबर को गाज़ियाबाद में हुआ। उनके पिता श्री नवीन सागर पत्रकार थे और उस समय अधिकतर स्वतंत्र पत्रकारिता कर रहे थे।उस समय उनका कोई स्थायी ठिकाना नहीं था। इसलिए पहली कक्षा में समता का नामांकन उत्तर प्रदेश के चिरगाँव में हुआ। तकरीबन साल भर बाद नवीन सागर जी कि नियुक्ति हिंदी ग्रन्थ अकादमी, भोपाल में संपादक के तौर पर हुई और वे सपरिवार भोपाल आ गए और हमेशा के लिए भोपाल के ही होकर रह गए। भोपाल के  प्रोफ़ेसर कॉलोनी में उनका आवास था।

गाज़ियाबाद से भोपाल आने के बाद समता जी का दाखिला प्रोफ़ेसर कॉलोनी में ही घर के पास स्थित विद्या विहार स्कूल में करवा दिया गया जहां उन्होंने 8वीं तक पढ़ाई की, उसके बाद कमला नेहरु हायर सेकेंडरी स्कूल से उन्होंने 12वीं कक्षा तक की पढ़ाई की। समता जी की माँ श्रीमती छाया सागर लम्बे अरसे तक समाज सेवा से जुड़ी रही हैं। उन्होंने कई सालों तक ‘ सेल्फ एम्प्लॉयड वीमेन्स एसोसिएशन’ (सेवा) में काम किया, उसके बाद वे समाजसेवी सविता वाजपेयी के साथ काम करने लगी थीं। मप्र शासन की पूर्व मंत्री सविता वाजपेयी मानवाधिकारों, महिलाओं और बच्चों से जुड़े मुद्दों पर काम करती रही हैं।

उम्र का वह हिस्सा जिसे हम ‘बचपन’ कहते हैं उसे लेकर समता आज भी अफ़सोस जाहिर करते हुए कहती हैं, “जिन्दगी का सबसे खूबसूरत वक्त इतना छोटा क्यों होता है और इतनी जल्दी क्यों गुजर जाता है। जब तक उसके कीमती होने का एहसास हो तब तक वह गुज़र चुका होता है।” बचपन के बारे में बताते हुए वे जैसे कहीं खो सी जाती हैं। वे कहती हैं - “हमारा मध्यमवर्गीय परिवार था। मम्मी पापा और हम तीन भाई बहन। सभी का एक दूसरे के साथ गहरा जुड़ाव था। घर में सामान्य ज़रूरत की सभी चीज़ें थीं लेकिन ऐशो-आराम जैसी बात नहीं थी और न उसकी कोई दरकार थी। लेकिन हमारा घर किताबों से भरा हुआ था। घर के पास ही छोटा तालाब था, तब उसके आसपास इतने मकान नहीं बने हुए थे। तालाब किनारे हम घंटों बैठा करते थे। मछलियाँ देखते या किताबें पढ़ते। तब वहां का नज़ारा देखने लायक हुआ करता था।

समता बताती हैं,  “बचपन में वे बहुत ही शर्मीली सी बच्ची थीं, लोगों से ज्यादा घुलना मिलना पसंद नहीं था, यहाँ तक कि गिर जाने के डर से खेलने भी नहीं जाती थीं। घर में आने वाले मेहमान और उनके तरह-तरह के लाड़ भरे सवालों से बचने के लिए पलंग के नीचे छिप जाती थीं  और उनके जाने के बाद ही निकलतीं चाहे कितनी भी देर हो जाए।"  उन्हें सबसे ज्यादा पसंद था - किताबें पढ़ना, घर में जिसकी कमी नहीं थी। शुरूआत में उनके पिताजी ने बच्चों की किताब लेकर दी जो कुछ ख़ास पसंद नहीं आई और वे बड़ों की किताबें पढ़ने लगीं। छोटी उम्र में ही चेखव की कहानियाँ और गोर्की के उपन्यास जैसा साहित्य पढ़ गईं। खेलने के समय मैदान में सभी खेलते जबकि समता सबकी नज़र बचाकर किसी किताब में डूबी रहतीं।

खुद को ‘भोंदू बच्ची’ कहने वाली समता का अभिनय से सबसे पहला साबका पड़ा 1982 में। उस समय उनकी उम्र 8-9 साल की थी। दरअसल सुप्रसिद्ध निर्देशक बंसी कौल का घर में आना -जाना था। वे उनके पिता के घनिष्ठ मित्रों में से एक थे। उनकी नाट्य संस्था थी ‘रंग विदूषक’। बंसी कौल जी ने एक नाटक ‘रंग बिरंगे जूते’ में समता को भी शामिल कर लिया। उस नाटक में (रमेशचंद शाह की पुत्री -राजुला शाह, अशोक वाजपेयी की पुत्री दूबी साथी कलाकार थे। समता बताती हैं, प्रभात गांगुली उस नाटक को कोरियोग्राफ़ कर रहे थे और सबसे भद्दा डांस मेरा ही था। सभी बच्चों में सबसे लम्बी थी इसलिए सबसे पीछे खड़ी रहती थी।”  

अभिनय से समता का दूसरा वास्ता 90 के दशक में तब पड़ा जब हायर सेकेंडरी करने के बाद उनका दाखिला महारानी लक्ष्मीबाई महाविद्यालय में हो चुका था। वह वय: संधि का समय था जब भावनात्मक आवेग अपने उफान पर हुआ करता है। दूसरों से घुलने -मिलने से परहेज करने वाली संकोची बच्ची समता के लिए वह समय भारी गुजर रहा था। अमूमन वह ज़िन्दगी के मायने तलाशने का दौर भी होता है जबकि वे दुनिया से दूर भाग रही थीं और अवसाद में डूबी हुई थीं। यहाँ तक कि कॉलेज भी जाने से वे कतराने लगी थीं। उसी समय पारिवारिक मित्र बंशी कौल जी ने फिर थिएटर से जुड़ने का न्योता दिया। समता को खुद भी लगा शायद माहौल बदलने से अच्छा महसूस हो। वे ‘रंग विदूषक’ से जुड़ गयीं। सबसे पहला नाटक था तुक्के पर तुक्का।  रिहर्सल में खूब अभ्यास के बाद जब मंच पर संवाद बोलने की बारी आई तो मुंह में जैसे दही जम गया। कुछ बोल नहीं पाईं और हाथ पैर कांपने लगे। उस समय अपने त्वरित बुद्धि का परिचय देते हुए उन्होंने बेहोश होने का नाटक किया। वे कहती हैं, “मुझे पूरा यकीन हो गया था कि ये एक्टिंग-वेक्टिंग मेरे बस की बात नहीं, लेकिन दादा (बंसी कौल) हार मानने वालों में से नहीं थे।”

उस समय उनके ग्रुप में पुष्पनीर, श्रद्धा तिवारी, नीति श्रीवास्तव जैसी अभिनेत्रियाँ थीं। हालाँकि वे काम के समय ही आती थीं और कई अन्य संस्थाओं से भी जुड़ीं हुई थीं जबकि समता, संस्था के दफ्तर में हर दिन सुबह से शाम तक मौजूद रहतीं। यही वजह है कि धीरे-धीरे झिझक भी टूटती चली गयी और कई मशहूर नाटकों में काम करने का अवसर भी उन्हें मिला, जिनमें आफंती के किस्से, गधों का मेला, नैन नचैया, नीति मानतीकरण की, वो जो अक्सर झापड़ खाता है - को वे यादगार मानती हैं। उस दौरान उन्होंने अभिनय के साथ कई कार्यशालाओं में हिस्सा लिया, कुछ नाटक खुद भी तैयार किये, रंगमंच की कई बड़ी हस्तियों के साथ काम करने का मौक़ा मिला। समता ख़ास तौर पर बंसी दा के अलावा प्रभात गांगुली और अंजना पुरी को याद करती हैं। अंजना पुरी, ‘नैन नचैया’ के संगीत कम्पोजर के तौर पर सबसे पहले रंग विदूषक से जुडी थीं। वह नाटकों के संगीत पर कई नए-नए प्रयोग करती थीं। उसी दौरान समता जी की मुलाकात मंजे हुए अभिनेता श्री वीरेंद्र सक्सेना से हुई, दोनों के उम्र में 16 सालों का फासला था लेकिन वे अच्छे दोस्त बन चुके थे।

समता जी की जान - पहचान वाले भोपाल के कई लोग उस समय मुंबई में काम कर रहे थे और अक्सर समता जी से कहते कि वहां बहुत काम है, तुम्हें आना चाहिए। समता जी की एक रिश्तेदार ‘विमला दीदी’ मुंबई में ही रहती थीं जिनसे मिलने के लिए संयोगवश एक बार वे मुंबई गईं तो लगे हाथों वहां रहने वाले दोस्तों से मिलने का भी मौका मिल गया। एक दिन वे अपने दोस्त जयंत देशमुख - जो जाने माने पेंटर थे और आगे चलकर सिने जगत में कला निर्देशक के तौर पर मशहूर हुए, से मिलने पहुँच गईं। वहां उनकी मुलाक़ात नामचीन निर्माता-निर्देशक सतीश कौशिक से हुई। सामान्य परिचय के बाद ही श्री कौशिक ने उन्हें अपने आने वाले धारावाहिक ‘कामिनी’ के लिए प्रस्ताव दे दिया। हालांकि वह धारावाहिक पूरा न हो सका, लेकिन उसने समता जी को मुंबई में रुकने की वजह दे दी। धीरे-धीरे उन्हें टीवी धारावाहिकों में छोटी-छोटी भूमिकाएं मिलना शुरू हो गईं। शुरुआत में वे कुछ समय विमला दीदी के घर में ही रहते हुए काम करती रहीं फिर बाद में अलग से घर लेकर रहने लगीं।

कुछ समय बाद उन्हें सुभाष घई की फ़िल्म ‘परदेस’ मिल गई, जो बॉक्स ऑफ़िस पर सुपर हिट साबित हुई। हालांकि इससे पहले 1993 में जब उनकी उम्र 17-18 साल थी, तब भोपाल में मुहाफ़िज़ (इन कस्टडी) की शूटिंग चल रही थी। इस्माइल मर्चेंट उस फिल्म के निर्देशक थे और शशि कपूर, सुषमा सेठ और शबाना आजमी जैसे कलाकार उस में काम कर रहे थे। इस फिल्म में स्थानीय कलाकारों को भी मौक़ा दिया गया था जिसमें समता भी थीं। उसमें उनकी कोई ख़ास भूमिका नहीं थी, लेकिन फ़िल्म निर्माण प्रक्रिया को उन्होंने तभी देखा था। 'परदेस' में समता को महिमा चौधरी (कुसुम) की छोटी बहन सोनाली की मजबूत भूमिका मिली थी। समता का पहला शॉट ही शाहरुख खान के साथ शूट किया गया जिसका ज़िक्र करते हुए वे आज भी रोमांच से भर उठती हैं। तब तक शाहरुख खान स्टार बन चुके थे। समता जी की ज़िन्दगी का वह कभी नहीं भूलने वाला पल था जब शाहरुख खान ने उनका हाथ पकड़कर कहा था, “आप थिएटर आर्टिस्ट हैं ना? ऐसा स्वाभाविक सीन थिएटर वाले ही दे सकते हैं।”

वे कहती हैं’ “एक ऐसी लड़की जो बचपन में मेहमानों के सामने जाने से भी डरती थी, उसका इतने बड़े प्लेटफॉर्म पर सफलता हासिल करना बहुत मायने रखता है। ” लेकिन जीवन सरल रेखा जैसी नहीं होती। समता के यादों की संदुकची में ‘परदेस’ से जुड़ी कई अच्छी यादों के साथ कुछ कड़वे लम्हे भी बंद हैं जिन्हें वह कभी उलट पलट कर भी नहीं देखतीं। उन कड़वे अनुभवों ने उनके करियर को दोराहे पर लाकर खड़ा कर दिया, जिसमें पहला विकल्प यह था कि वे अपने शर्तों पर आगे बढ़ती रहें और दूसरा विकल्प था समझौतों का जिसके लिए उस दौर का हिंदी सिनेमा कई बार कटघरे में आ चुका है। समता कहती हैं, “मैं उन परिस्थितियों को संभालना भी नहीं जानती थीं क्योंकि न तो वैसी परवरिश थी न अनुभव। उम्र भी कुछ ख़ास नहीं थी।” पड़ताल की दृष्टि से भी यह एक सच्चाई है। मुंबई आने से पहले  उनकी जिन्दगी घर और थिएटर तक सिमटी हुई थी, जहाँ का माहौल बिलकुल घर जैसा ही था। कॉलेज में एडमिशन लेने के बावजूद कॉलेज जाना छोड़ दिया था और प्राइवेट से इम्तहान देकर ग्रेजुएशन किया। इसलिए कॉलेज कभी गयी नहीं। एक घरेलू किस्म की लड़की के लिए मुंबई का तेज तर्रार माहौल यकीनन डरावना रहा होगा। उनके स्वभाव का भोलापन मुंबई जैसे शहर के लिए नहीं था। इसलिए शानदार फिल्म से डेब्यू करने के बाद भी उन्होंने फिल्मों में काम करने इरादा छोड़ दिया। इक्का दुक्का धारावाहिक भी वही चुनती जहां वे सहज रूप से काम कर पाती थीं।

वह 10 -12 वर्षों का शून्य काल था जिसमें उन्होने न के बराबर काम किया। यही वह वक्त था भरोसेमंद मित्र अभिनेता वीरेंद्र सक्सेना से उनकी नजदीकियां बढ़ीं। वीरेंद्र जी ने समता के लिए रेल का ओपन टिकट करवा रखा था ताकि किसी समय उनकी भोपाल लौटने की इच्छा हो तो वो कभी भी लौट सकें। वर्ष 2000 में समता और वीरेंदर जी ने शादी कर ली और उसी साल उनके पिता चल बसे। इस हादसे ने समता को तोड़कर रख दिया। एक तरह से उन्होंने खुद को पूरी दुनिया से ही अलग थलग कर लिया। वे आज भी अपने पिता की मौत को स्वीकार नहीं कर पायी हैं। गृहस्थी की शुरुआत भी किसी धूमधड़ाके से नहीं हुई। जिस वक्त दोनों की शादी हुई थी, वीरेंदर जी के घर पर एक पूर्ण कालिक सहायक घर के काम-काज देखता था जिसके साथ ताल-मेल बिठाना समता के लिए मुश्किल था। उन्होंने जल्दी ही उससे छुटकारा पा लिया और खुद सारे काम करने लगीं। चाहे वह घर की साफ़ सफाई हो, वीरेंद्र जी के कपड़ों की देखभाल हो या खाना पकाना हो। अगर उन्हें खुद शूट पर जाना हो तब भी वे आम गृहणी की तरह सुबह-सुबह उठकर सारे काम निपटाकर शूट पर पहुँचती। लम्बे समय तक यह सिलसिला चलता रहा।

वर्ष 2008 में उन्होंने वापसी की और एक के बाद एक कई लोकप्रिय धारावाहिकों में अपने अभिनय का छाप छोड़ती वे नज़र आने लगीं। इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। कई धारावाहिक उन्होंने खुद लिखा और उसमें अभिनय भी किया। जिन्दगी व्यस्त हो चली। धारावाहिक ‘छोटी बहू’ का जिक्र करते हुए वे कहती हैं, यह धारावाहिक पौने दो साल चली और उस दौरान मुझे किसी भी दिन दो ढाई घंटे से अधिक की नींद नहीं मिली। उस धारावाहिक को वे लिख भी रही थीं। इस दिनचर्या की वजह से अब उन्होंने धारावाहिकों से दूरी बनाने का मन बना लिया है। समता स्वीकार करती हैं कि टेलीविजन धारावाहिकों से उन्हें बहुत कुछ मिला लेकिन अब वे धारावाहिक छोड़कर फिर से फिल्मों में खुद को आजमा रही हैं। वर्ष 2017 में उन्होंने एक थिएटर ग्रुप बनाया ‘किस्सागो मुंबई’ नाम से। इसके पीछे कारण यह था कि समता और वीरेंद्र जी दोनों ने अपने करियर की शुरुआत थिएटर से ही की थी। इस थिएटर ग्रुप के अंतर्गत ‘जाना है रोशनपुरा’ नाटक का मंचन कई शहरों में हुआ जिसमें वीरेंद्र जी और समता दोनों के अभिनय प्रतिभा का जौहर दर्शकों को देखने के लिए मिला। इस नाटक के लेखन के लिए समता को वर्ष 2015 में ‘मोहन राकेश स्मृति सम्मान’ से सम्मानित किया गया। बाद में इसी कहानी पर टेलीफिल्म भी बनी।

इस तरह समता का अभिनय करियर सृष्टि चक्र की तरह थिएटर से शुरू होकर फिल्म और धारावाहिकों के गलियारों से गुजरता हुआ फिर थिएटर से आकर जुड़ गया। वर्तमान में समता मुंबई के वर्सोवा में रह रही हैं, कुछ फिल्म परियोजनाएं लिखने और अभिनय के लिए उनके पास है, इसके अलावा थिएटर तो है ही। आपसी सहमति से समता और वीरेंद्र जी ने संतान न पैदा करने का फैसला किया था। समता कहती हैं जब हमने यह फैसला किया उस वक्त लोग बहुत डराते थे लेकिन हमें अपने फैसले पर अफ़सोस नहीं है। आसपास के कई बच्चे हैं जो मुझे अपने बच्चों की तरह ही प्यारे हैं। समता जी के दो बड़े भाई है। सबसे बड़े अनिरुद्ध सागर सिरेमिक आर्टिस्ट हैं और उनसे छोटे आदित्य सागर कैमरा मैन हैं। समता जी के रंगमंच के साथियों में पुष्पनीर का असमय देहांत हो गया, श्रद्धा तिवारी ने रंगमंच छोड़ दिया जबकि नीति श्रीवास्तव आज भी थिएटर से जुड़ी हुई हैं।

 उपलब्धियां

• परदेस -1997

• जी टीवी पर प्रसारित धारावाहिक बनूँ मैं तेरी दुल्हन -2007

• ये मेरा इंडिया (फीचर फिल्म) -2008

• जी टीवी पर प्रसारित छोटी बहू (2008-10)

• जी टीवी पर प्रसारित धारावाहिक संजोग से बनी संगिनी (2010-11)

• कलर्स पर प्रसारित धारावाहिक हवन -2011-12  

• सब टीवी पर प्रसारित धारावाहिक तोता वेड्स मैना -2013

• जीटीवी पर प्रसारित सतरंगी ससुराल -2014

• लाइफ ओके पर प्रसारित धारावाहिक गुलाम (2017 )  

• स्टार प्लस पर प्रसारित धारावाहिक हर शाख पे उल्लू बैठा है -2018  

• एंड टीवी पर प्रसारित गुड़िया हमारी सभी पे भारी -2019  अभिनय के साथ ही 335 कड़ियों का लेखन

• गुड़िया की शादी (टीवी मूवी -लेखन और निर्देशन) -2019

• टीटू अम्बानी (फीचर फिल्म) -2022

• सास बहू और रीना रानी (पॉडकास्ट सीरीज)

• फाइनल सोल्यूशन (टेलीफिल्म) -2019

संदर्भ स्रोत - समता सागर से सारिका ठाकुर की बातचीत पर आधारित

© मीडियाटिक

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