पटना उच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट किया है कि यदि पत्नी आपसी सहमति से तलाक की कार्यवाही में दी गई अपनी सहमति वापस ले लेती है, तो वह दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के तहत भरण–पोषण का दावा करने से वंचित नहीं होती। अदालत ने पत्नी को दिए गए ₹3,500 प्रतिमाह भरण–पोषण आदेश को बरकरार रखते हुए पति की आपराधिक पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी।
न्यायमूर्ति संदीप कुमार ने कहा कि हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13B के तहत तलाक की डिक्री पारित होने से पहले किसी भी चरण पर कोई भी पक्ष अपनी सहमति वापस ले सकता है। ऐसी स्थिति में आपसी सहमति से तलाक की कार्यवाही विफल मानी जाएगी और उस पर आधारित समझौता पक्षकारों को बाध्य नहीं करता।
मामले के अनुसार, पति और पत्नी ने वर्ष 2017 में आपसी सहमति से तलाक के लिए संयुक्त याचिका दायर की थी, जिसमें एकमुश्त स्थायी भरण–पोषण तय किया गया था। पहली मोशन के दौरान पत्नी को ₹65,500 की राशि दी गई थी, लेकिन बाद में पत्नी ने दूसरी मोशन से पहले अपनी सहमति वापस ले ली और पति के साथ रहने की इच्छा जताई।
पत्नी ने आरोप लगाया कि दूसरी मोशन के लिए उस पर दबाव डाला जा रहा था। इसके बाद परिवार न्यायालय ने पत्नी की भरण–पोषण याचिका स्वीकार करते हुए ₹3,500 प्रतिमाह भरण–पोषण का आदेश दिया।
पति ने हाईकोर्ट में तर्क दिया कि पत्नी पहले ही एकमुश्त राशि प्राप्त कर चुकी है, इसलिए वह भरण–पोषण की हकदार नहीं है। अदालत ने इस दलील को अस्वीकार करते हुए कहा कि सहमति वापसी के बाद आपसी तलाक की डिक्री संभव ही नहीं थी, इसलिए पत्नी भरण–पोषण मांगने के लिए स्वतंत्र है।
अदालत ने यह भी माना कि पत्नी बेरोज़गार है और परिवार न्यायालय द्वारा निर्धारित भरण–पोषण राशि अत्यंत न्यूनतम है। इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने भरण–पोषण आदेश में कोई हस्तक्षेप करने से इंकार कर दिया।



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