कलकत्ता उच्च न्यायालय ने एक अहम टिप्पणी में कहा है कि भले ही देश की बेटियों ने क्रिकेट विश्व कप जैसे बड़े मंचों पर देश का नाम रोशन किया हो, लेकिन समाज में बालिकाओं और महिलाओं के लिए वास्तविक समानता अब भी दूर की मंजिल है। इसी टिप्पणी के साथ हाईकोर्ट ने दहेज हत्या के एक मामले में महिला और उसकी डेढ़ वर्षीय बेटी की मौत से जुड़े प्रकरण में महिला के ससुराल वालों को बरी किए जाने के ट्रायल कोर्ट के फैसले को रद्द कर दिया है।
न्यायमूर्ति अपूर्बा सिन्हा राय राज्य सरकार की उस याचिका पर सुनवाई कर रहे थे, जिसमें ट्रायल कोर्ट द्वारा ससुराल पक्ष को बरी किए जाने को चुनौती दी गई थी। राज्य का आरोप है कि पीड़िता को उसके ससुराल वालों द्वारा लगातार शारीरिक और मानसिक क्रूरता का सामना करना पड़ा, बच्ची के जन्म को लेकर उसका उपहास किया गया और उससे पांच लाख रुपये दहेज की मांग की गई।
न्यायालय ने अपने आदेश में कहा कि हमें गर्व है कि हमारी बेटियों ने हाल ही में क्रिकेट विश्व कप जीता है और वे विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल कर रही हैं, लेकिन डेढ़ वर्ष की आयु में एक बच्ची और उसकी मां की मृत्यु यह याद दिलाती है कि बालिकाओं के लिए पूर्ण समानता प्राप्त करने के लिए हमें अभी बहुत लंबा रास्ता तय करना है। अदालत ने इस संदर्भ में न्यायमूर्ति वी.आर. कृष्णा अय्यर के प्रसिद्ध कथन का भी उल्लेख किया कि 'कोई भी समाज तब तक स्वतंत्र नहीं हो सकता, जब तक संकट में फंसी आखिरी युवती भी मुक्त न हो जाए'।
ट्रायल कोर्ट पर हाई कोर्ट ने उठाये गंभीर सवाल
हाईकोर्ट ने पाया कि ट्रायल कोर्ट ने पीड़िता के परिजनों सहित महत्वपूर्ण गवाहों के बयानों पर समुचित विचार नहीं किया। गवाहों ने अदालत को बताया था कि जब पीड़िता पंजाब स्थित अपने मायके गई थी, तब उसने अपने ससुराल वालों द्वारा की गई यातनाओं का खुलासा किया था। बयानों से यह भी सामने आया कि शादी के तुरंत बाद पति और उसके परिवार ने यह शर्त रखी थी कि यदि लड़की का जन्म होता है तो पीड़िता के पिता से पांच लाख रुपये अतिरिक्त दहेज के रूप में मांगे जाएंगे।
लिंग के आधार पर उत्पीड़न का आरोप
अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड से यह भी संकेत मिलता है कि ससुराल पक्ष पीड़िता के गर्भ में पल रहे बच्चे के लिंग को लेकर चिंतित था। बच्ची के जन्म के बाद कथित रूप से क्रूरता की घटनाएं और अधिक गंभीर हो गईं। हाईकोर्ट ने कहा कि इस तरह की क्रूरता को संकीर्ण परिभाषाओं या चुनिंदा शब्दों में सीमित नहीं किया जा सकता।
आरोपियों को निचली अदालत में पेश होने का आदेश
हाईकोर्ट ने जिन आरोपियों को बरी किया गया था, उन्हें 4 हफ्ते के भीतर निचली अदालत के समक्ष आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया। साथ ही निचली अदालत को यह आदेश दिया गया कि आरोपियों को हिरासत में लेकर, उचित जमानत बांड प्रस्तुत करने पर उन्हें जमानत पर रिहा किया जाए। अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि कानून के अनुसार उचित धाराओं में आरोप तय करने के लिए आगे की कार्यवाही की जाए।
ससुराल पक्ष की दलीलें
ससुराल पक्ष की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता दीप चैम कबीर ने हाईकोर्ट में दलील दी कि प्रारंभिक एफआईआर एक पड़ोसी द्वारा दर्ज कराई गई थी और आरोपी घटना के समय घटनास्थल पर मौजूद नहीं थे। उन्होंने तर्क दिया कि पीड़िता की मौत उसके पति के साथ गंभीर विवाद के तुरंत बाद हुई और बच्ची की मौत भी उसी घटना से जुड़ी है, जो यह दर्शाता है कि एक मां कितनी क्रूर हो सकती है। कबीर ने यह भी कहा कि पीड़िता और उसके ससुराल वालों के बीच केवल सामान्य वैवाहिक तनाव था। उन्होंने दावा किया कि पीड़िता स्वभाव से शंकालु थी और अपने पति के किसी भी महिला से बात करने पर संदेह करती थी। इसके अलावा, उसने अपने पति और उसकी चाची के संबंधों पर भी शक जताया था। अधिवक्ता ने जोर देकर कहा कि अधिकांश आरोप पति के खिलाफ हैं, न कि ससुराल वालों के विरुद्ध और दहेज की कोई मांग नहीं की गई थी। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि पति ने अपनी पत्नी और बेटी के शवों को अंतिम संस्कार के लिए पंजाब ले जाने की व्यवस्था की थी, जिससे उसके इरादों पर सवाल नहीं उठाया जाना चाहिए।
राज्य की ओर से पेश अधिवक्ता सुमित कुमार कर्माकर ने इन दलीलों का विरोध करते हुए कहा कि गवाहों के बयानों से स्पष्ट होता है कि बरी किए गए सभी आरोपियों के खिलाफ पर्याप्त सबूत मौजूद हैं। उन्होंने कहा कि पीड़िता को शारीरिक और मानसिक दोनों प्रकार की क्रूरता झेलनी पड़ी, जिसके परिणामस्वरूप मां और बच्ची की दुखद मौत हुई। कर्माकर ने आरोप लगाया कि ट्रायल कोर्ट ने इन महत्वपूर्ण साक्ष्यों पर उचित ध्यान नहीं दिया और जल्दबाजी में ससुराल पक्ष को बरी कर दिया।
जानें क्या है पूरा मामला
रिकॉर्ड के अनुसार, पीड़िता की शादी 2018 में हुई थी और वह मई 2018 से अपने पति के साथ अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में एक किराए के मकान में रह रही थी। दंपति की डेढ़ साल की एक बेटी थी। वर्ष 2021 में पति के साथ विवाद के बाद पीड़िता और उसकी बेटी की मौत हो गई थी। इसके बाद पीड़िता के पिता ने दामाद और उसके परिवार के सदस्यों के खिलाफ दहेज और क्रूरता का आरोप लगाते हुए शिकायत दर्ज कराई थी। ट्रायल कोर्ट ने 2024 में यह कहते हुए ससुराल पक्ष को बरी कर दिया था कि उनके खिलाफ आरोप तय करने के लिए पर्याप्त सबूत नहीं हैं और केवल पति के खिलाफ ही मामला बनता है।



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