भोपाल: उच्च शिक्षा उत्कृष्टता संस्थान की प्रोफेसर डॉ. मेघना दुबे ने IoT आधारित सोलर पावर बायोगैस प्लांट का डिज़ाइन पेटेंट कराया है। यह अभिनव तकनीक घर के कचरे से गैस बनाने में मदद करेगी और एलपीजी पर निर्भरता घटाने की दिशा में एक बड़ा कदम साबित हो सकती है।
डॉ. दुबे बताती हैं यह सिस्टम इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT) तकनीक पर आधारित है, जिससे प्लांट स्वतः संचालित होगा और रियल टाइम मॉनिटरिंग संभव होगी। इसकी खास बात यह है कि यह कम मानवीय हस्तक्षेप में भी बेहतर तरीके से काम करता है। इस प्लांट की संरचना पारंपरिक बायोगैस यूनिट्स से अलग है, जिससे इसको कार्यक्षमता और उपयोगिता बढ़ जाती है। इसे घरेलू, कृषि और ग्रामीण क्षेत्रों के उपयोग को ध्यान में रखते हुए तैयार किया गया है, जिससे स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा मिलेगा। यह प्लांट घर के कचरे से गैस तैयार करेगा, जिससे भविष्य में एलपीजी पर निर्भरता कम हो सकेगी।
एनारोबिक बैक्टीरिया कचरे से बनाते हैं मीथेन गैस
इस बायोगैस प्लांट के काम करने की प्रक्रिया अलग है। यह सोलर पावर बायोगैस प्लांट अक्षय ऊर्जा और स्मार्ट स्वचालन (ऑटोमेशन) के तालमेल पर काम करता है। सबसे पहले, जैविक कचरे को डाइजेस्टर टैंक में डाला जाता है। यहां एनारोबिक बैक्टीरिया कचरे से मीथेन गैस बनाते हैं। प्लांट में लगी सौर फोटोवोल्टिक प्लेट से मिलने वाली बिजली से सभी संवेदी उपकरण और मोटर चलते हैं, जबकि सौर तापीय इकाई तापमान को 30–40 डिग्री सेल्सियस के बीच बनाए रखती है, ताकि गैस का उत्पादन सबसे अच्छा हो। इसमें लगे नोज़ल से घर में गैस का उपयोग किया जा सकेगा।
सेंसर लगातार करेंगे मॉनिटर
डॉ. दुबे ने बताया कि इस सिस्टम की सबसे बड़ी ताकत इसकी स्मार्ट निगरानी और सुरक्षा व्यवस्था है। इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT) सेंसर लगातार डेटा नियंत्रण इकाई को भेजते रहते हैं, जो तापमान, दबाव और गैस उत्पादन के अनुसार स्वतः हीटिंग, मिश्रण और सुरक्षा वाल्व को नियंत्रित करने में मदद करता है। इसके अलावा, मोबाइल एप्लिकेशन के जरिए उपयोगकर्ता वास्तविक समय का डेटा देख सकता है और अलर्ट प्राप्त कर सकता है। गैस शुद्धिकरण के बाद तैयार शुद्ध बायोगैस को भंडारण में रखा जाता है, जिसका उपयोग खाना बनाने, बिजली उत्पादन या अन्य कार्यों में किया जा सकता है।
डॉ. दुबे का कहना है कि यह तकनीक न केवल एलपीजी पर निर्भरता कम करेगी, बल्कि कार्बन उत्सर्जन घटाकर ग्रामीण क्षेत्रों में स्वच्छ और सस्ती ऊर्जा उपलब्ध कराने में भी अहम भूमिका निभाएगी।
-इसकी पूरी प्रक्रिया ऑटोमैटिक है
पर्यावरण संरक्षण और सस्टेनेबल लिविंग के प्रति सजग हैं, तो यह इनोवेटिव तकनीक एक साथ कई मोचों पर बड़े फायदे पहुंचाती है। यह आपके घर से निकलने वाले गीले कचरे, रसोई के अपशिष्ट और गोबर को सीधे उपयोगी स्वच्छ ऊर्जा में बदलकर जीरो वेस्ट लाइफस्टाइल को बढ़ावा देती है। इससे कचरा प्रबंधन की समस्या खत्म होती है। दूसरा, चूल्हा जलाने के लिए उपयोग होने वाली महंगी एलपीजी पर आपकी निर्भरता काफी कम हो जाती है, जिससे आपकी आर्थिक बचत होगी। गैस बनने के बाद जो स्लरी या घोल बाहर निकलता है, वह पोषक तत्वों से भरपूर होता है। यह आपके पौधों के लिए बेहतरीन मुफ्त जैविक खाद बनेगी।
सन्दर्भ स्रोत/छाया : दैनिक भास्कर



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