मंडला: आमतौर पर मोटर मैकेनिक, बाइक रिपेयरिंग और गाड़ी सुधारने जैसे कामों को पुरुषों से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन मध्य प्रदेश के मंडला जिले की 26 वर्षीय इंद्रावती वरकाडे ने इस सोच को बदल दिया है। एक छोटे से गांव की रहने वाली इंद्रावती आज प्रशिक्षित बाइक मैकेनिक हैं और अपनी मेहनत से समाज की रूढ़ियों को चुनौती दे रही हैं।
भाई से मिला मशीनों से प्यार
इंद्रावती का जन्म मध्य प्रदेश के मंडला जिले के एक छोटे गांव में हुआ। उनके माता-पिता मजदूरी करते हैं। बचपन से ही उनका अपने बड़े भाई के साथ गहरा लगाव था। भाई को बाइक, मशीनों और मोटर रिपेयरिंग का शौक था। भाई के साथ रहते-रहते इंद्रावती को भी मशीनों से लगाव हो गया।
वह धीरे-धीरे गाड़ियों के पार्ट्स, इंजन और मशीनों की कार्यप्रणाली समझने लगीं। हालांकि उस समय उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि एक दिन यही उनका करियर बनेगा।
सड़क हादसे में भाई की मौत के बाद बदली जिंदगी
इंद्रावती की जिंदगी में बड़ा मोड़ तब आया जब एक रोड एक्सीडेंट में उनके भाई की मौत हो गई। परिवार की आर्थिक जिम्मेदारी अचानक उनके कंधों पर आ गई। माता-पिता मजदूरी करते थे और घर की जिम्मेदारी संभालना जरूरी था।
इंद्रावती ने तय किया कि वह अपने भाई के अधूरे सपने को पूरा करेंगी और मोटर मैकेनिक बनेंगी। हालांकि इस सदमे से बाहर आने में उन्हें करीब तीन साल लगे।
साइंस ग्रेजुएट हैं इंद्रावती
• इंद्रावती पढ़ाई में भी अच्छी थीं। वह अपने गांव की अकेली लड़की हैं जिसने साइंस से ग्रेजुएशन किया। साल 2018 में उन्होंने भोपाल की भोज ओपन यूनिवर्सिटी से बीएससी की पढ़ाई पूरी की। उन्होंने केमिस्ट्री, जूलॉजी और बॉटनी विषयों के साथ स्नातक किया।
• NGO ने दिया सहारा, मिली मोटर मैकेनिक ट्रेनिंग
• इंद्रावती की जिंदगी में बड़ा बदलाव तब आया जब उनकी मुलाकात एक NGO प्रदान से हुई। यह संस्था ग्रामीण युवाओं को उनकी रुचि के अनुसार स्किल ट्रेनिंग देती है।
• इंद्रावती की मशीनों में रुचि देखकर संस्था ने उन्हें मोटर मैकेनिक ट्रेनिंग दिलवाई। छह महीने की ट्रेनिंग के दौरान उन्होंने बाइक रिपेयरिंग, इंजन खोलना, गाड़ी के पार्ट्स बदलना और तकनीकी काम सीखे।
• इंद्रावती कहती हैं कि उन्हें पहले से मशीनों की समझ थी, लेकिन प्रोफेशनल काम के लिए ट्रेनिंग जरूरी थी।
जबलपुर में मिली पहली नौकरी
• ट्रेनिंग पूरी होने के बाद इंद्रावती को जबलपुर के एक टू-व्हीलर शोरूम में नौकरी मिली। वहां उन्होंने बतौर बाइक मैकेनिक काम किया। उनकी पहली सैलरी 8 हजार रुपये थी।
• वर्कशॉप में वह तेजी से बाइक खोलतीं, खराब पार्ट्स ठीक करतीं और कुछ ही मिनटों में बंद पड़ी गाड़ी स्टार्ट कर देतीं। उनके काम से ग्राहक भी प्रभावित होते थे।
• हालांकि परिवार की जिम्मेदारियों के चलते उन्हें जबलपुर की नौकरी छोड़कर गांव लौटना पड़ा।
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लड़की होकर मोटर मैकेनिक बनने पर उठे सवाल
इंद्रावती बताती हैं कि एक लड़की के लिए मोटर मैकेनिक बनना आसान नहीं था। शुरुआत में परिवार और समाज दोनों ने सवाल उठाए। उनके पिता भी इस फैसले से सहमत नहीं थे।
लेकिन उनकी मां ने हर कदम पर उनका साथ दिया। इंद्रावती कहती हैं कि उनकी मां भले पढ़ी-लिखी नहीं हैं, लेकिन बेहद साहसी और आधुनिक सोच वाली हैं।
धीरे-धीरे गांव और समाज के लोगों की सोच भी बदली और आज लोग उनकी तारीफ करते हैं।
अब खुद की वर्कशॉप खोलना चाहती हैं इंद्रावती
• इंद्रावती का सपना है कि वह अपनी खुद की मोटर वर्कशॉप शुरू करें। इसके साथ ही वह गांव और आसपास की लड़कियों को मैकेनिक ट्रेनिंग देना चाहती हैं ताकि ज्यादा से ज्यादा लड़कियां आत्मनिर्भर बन सकें।
• वह मानती हैं कि अगर सही मार्गदर्शन मिले तो लड़कियां किसी भी क्षेत्र में सफलता हासिल कर सकती हैं।
सन्दर्भ स्रोत/छाया : युअर स्टोरी डॉट कॉम
सम्पादन : मीडियाटिक डेस्क



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