अमूमन यह माना जाता है कि मुस्लिम पुरुष को अधिकतम चार शादियों की कानूनी अनुमति है, लेकिन अगर कोई मुस्लिम विशेष विवाह अधिनियम, 1954 (Special Marriage Act, 1954) के तहत विवाह कर लेता है, तो उसके निजी धार्मिक अधिकार इस मामले में निष्प्रभावी हो जाते हैं।
Special Marriage Act 1954: हिंदू और मुस्लिम दोनों पर समान नियम
भारत में हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के तहत एक पत्नी के जीवित रहते अथवा पहली पत्नी को तलाक दिए बिना दूसरी शादी अवैध है और उसे शून्य (Void) करार दिया जाता है। वहीं, सामान्य परिस्थितियों में मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरिया) के तहत मुस्लिम पुरुष को अधिकतम चार शादियां करने की अनुमति है।
हालांकि, विशेष विवाह अधिनियम, 1954 के तहत संपन्न हुई शादी के मामलों में हिंदू और मुस्लिम दोनों के लिए समान प्रावधान लागू होते हैं। इस कानून के तहत विवाह करने के बाद मुस्लिम व्यक्ति के निजी धार्मिक अधिकार इस विषय में प्रभावी नहीं रहते और वह पहली पत्नी को कानूनी तलाक दिए बिना दूसरी शादी नहीं कर सकता।
पहली पत्नी को तलाक दिए बिना दूसरी शादी नहीं
विशेष विवाह अधिनियम, 1954 में हिंदू और मुस्लिम दोनों के लिए समान कानूनी व्यवस्था है। सामान्यतः मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरिया) एक मुस्लिम पुरुष को चार शादियां करने की अनुमति देता है, लेकिन विशेष विवाह अधिनियम के तहत विवाह करने वाला मुस्लिम व्यक्ति भी पहली पत्नी को कानूनी तलाक दिए बिना दूसरी शादी नहीं कर सकता।
मुस्लिम पर्सनल लॉ और विशेष विवाह अधिनियम में अंतर
मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरिया) के मुताबिक एक मुस्लिम पुरुष को अधिकतम चार शादियों की अनुमति है, लेकिन विशेष विवाह अधिनियम, 1954 के तहत संपन्न या पंजीकृत हुई शादी के मामले में मुस्लिम और हिंदू दोनों के लिए समान प्रावधान लागू होते हैं। ऐसे मामलों में दोनों पहली पत्नी को तलाक दिए बिना दूसरी शादी नहीं कर सकते।
शरिया के तहत चार शादी की अनुमति
गौरतलब है कि हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के तहत हिंदू व्यक्ति कानूनी रूप से केवल एक ही शादी कर सकता है। यदि वह दूसरी शादी करता है तो दूसरी शादी अवैध मानी जाती है।
इसी प्रकार मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरिया) के तहत मुस्लिम पुरुष को अधिकतम चार शादियां करने की कानूनी अनुमति है। हालांकि यह नियम केवल मुस्लिम पुरुषों पर लागू होता है।
यदि किसी व्यक्ति की पहली शादी विशेष विवाह अधिनियम के तहत हुई है और वह दूसरी शादी करता है, तो दूसरी शादी शून्य (Void) मानी जाएगी। भारतीय कानून के तहत यह एक दंडनीय अपराध है। इस अधिनियम के तहत दूसरी शादी करने से पहले पहली शादी का कानूनी रूप से समाप्त होना अनिवार्य है, चाहे व्यक्ति का धर्म कुछ भी हो।
विशेष विवाह अधिनियम, 1954 एक धर्मनिरपेक्ष कानून
दरअसल, विशेष विवाह अधिनियम, 1954 एक धर्मनिरपेक्ष (Secular) कानून है। यदि कोई मुस्लिम इस कानून के तहत विवाह पंजीकृत करवाता है, तो इस मामले में उसके व्यक्तिगत धार्मिक कानून (मुस्लिम पर्सनल लॉ) प्रभावी नहीं रहते।
इस अधिनियम की धारा 4(a) में स्पष्ट प्रावधान है कि विवाह के समय दोनों पक्षों (वर और वधू) में से किसी का भी कोई जीवित जीवनसाथी (पति या पत्नी) नहीं होना चाहिए।
शादी के बाद निष्प्रभावी हो जाते हैं निजी धार्मिक अधिकार
उल्लेखनीय है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरिया) के तहत एक मुस्लिम पुरुष को चार शादियां करने की अनुमति है, लेकिन यदि मुस्लिम पुरुष ने अपनी पहली शादी विशेष विवाह अधिनियम, 1954 के तहत की है, तो वह पहली पत्नी को कानूनी तलाक दिए बिना दूसरी शादी नहीं कर सकता।
यदि वह दूसरी शादी करता है, तो अधिनियम की धारा 24 के तहत दूसरी शादी कानूनी रूप से अमान्य (Void) मानी जाएगी।
निष्कर्ष
विशेष विवाह अधिनियम, 1954 के तहत विवाह करने वाले हिंदू और मुस्लिम दोनों के लिए एकपत्नी विवाह (Monogamy) अनिवार्य है। ऐसे में पहली पत्नी या पति के रहते अथवा कानूनी तलाक लिए बिना दूसरी शादी करना कानूनन मान्य नहीं है और ऐसी शादी शून्य मानी जाएगी।



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