बॉम्बे हाईकोर्ट : पति की मौत के बाद भी

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 बॉम्बे हाईकोर्ट : पति की मौत के बाद भी
तलाकशुदा पत्नी को मिलेगा भरण-पोषण

बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया कि तलाकशुदा पत्नी अपने पूर्व पति की मृत्यु के बाद भी उसकी संपत्ति, उत्तराधिकारियों या संपत्ति से भरण-पोषण प्राप्त करने की हकदार रह सकती है, यदि उसके पक्ष में पहले से भरण-पोषण का वैध आदेश या डिक्री मौजूद हो। हालांकि, पति की मृत्यु के बाद वह उस भरण-पोषण राशि में बढ़ोतरी की मांग नहीं कर सकती। 

जस्टिस भारती डांगरे और जस्टिस मंजुषा देशपांडे की खंडपीठ ने यह फैसला एक महिला की याचिका पर सुनाते हुए दिया। महिला ने अपने पूर्व पति की मृत्यु के बाद उसकी संपत्ति से भरण-पोषण जारी रखने और वर्ष 1999 में पारिवारिक अदालत द्वारा निर्धारित 6,000 रुपये मासिक भरण-पोषण राशि में बढ़ोतरी की मांग की थी।

मामले में पति का वर्ष 2012 में निधन हो गया था। दंपति की कोई संतान नहीं थी, इसलिए उसकी संपत्ति उसके भाई-बहनों को मिली। उन्होंने महिला की मांग का विरोध किया।

हाईकोर्ट ने कहा कि भरण-पोषण की डिक्री पति की मृत्यु के साथ समाप्त नहीं होती। यदि किसी महिला के पक्ष में पहले से भरण-पोषण का अंतिम आदेश पारित हो चुका है, तो उसकी वसूली मृतक पति की संपत्ति से की जा सकती है।

अदालत ने कहा, भरण-पोषण की डिक्री पति की मृत्यु से समाप्त नहीं होती। उत्तराधिकारी और संपत्ति, डिक्री की शर्तों के अनुसार बकाया तथा देय राशि के लिए उत्तरदायी रहते हैं। पति की मृत्यु भरण-पोषण संबंधी डिक्री के क्रियान्वयन में बाधा नहीं बन सकती।”

खंडपीठ ने कहा कि विधायिका का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि पत्नी को जीवनभर आर्थिक संरक्षण और सहायता मिलती रहे। यदि पति अपने पीछे संपत्ति छोड़कर गया है तो उसके उत्तराधिकारी केवल संपत्ति के लाभ नहीं ले सकते, बल्कि उससे जुड़ी देनदारियों का भी वहन करना होगा।

हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि भरण-पोषण पाने का अधिकार पत्नी का व्यक्तिगत अधिकार है, जो केवल उसके जीवनकाल तक सीमित रहता है। यह अधिकार किसी अन्य को हस्तांतरित नहीं किया जा सकता और पत्नी की मृत्यु के साथ समाप्त हो जाता है।

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फैसले में कहा गया कि पति के जीवित रहते हुए पत्नी के भरण-पोषण की व्यक्तिगत जिम्मेदारी उसी की होती है। उसकी मृत्यु के बाद यह दायित्व उसकी संपत्ति पर स्थानांतरित हो जाता है, लेकिन उत्तराधिकारियों पर व्यक्तिगत रूप से पत्नी का भरण-पोषण करने की कोई कानूनी जिम्मेदारी नहीं होती।

भरण-पोषण राशि बढ़ाने की मांग पर हाईकोर्ट ने कहा कि विशेष विवाह अधिनियम (Special Marriage Act) की धारा 37 के तहत बढ़ोतरी का प्रश्न पति-पत्नी की परिस्थितियों में हुए बदलाव के आधार पर तय किया जाता है। इसके लिए दोनों पक्षों की वर्तमान आर्थिक स्थिति और परिस्थितियों का न्यायिक मूल्यांकन आवश्यक होता है।

अदालत ने कहा कि जब पति की मृत्यु हो चुकी हो, तब उसकी आय, आर्थिक क्षमता और परिस्थितियों का आकलन संभव नहीं रहता। ऐसे में भरण-पोषण बढ़ाने का दावा कानूनी रूप से स्वीकार नहीं किया जा सकता।

खंडपीठ ने कहा, भरण-पोषण में बढ़ोतरी का अधिकार पति और पत्नी की जीवित परिस्थितियों पर आधारित व्यक्तिगत अधिकार है। पति की मृत्यु के साथ यह व्यक्तिगत दायित्व समाप्त हो जाता है और इसे उत्तराधिकारियों के विरुद्ध लागू नहीं किया जा सकता।”

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि यदि मृतक पति की संपत्ति में बाद में उत्तराधिकारियों के प्रयासों से वृद्धि हुई हो तो उस बढ़ी हुई संपत्ति में तलाकशुदा पत्नी का हिस्सा मानना अनुचित होगा। ऐसा करने से उत्तराधिकारियों के अधिकार प्रभावित होंगे और भविष्य में अनिश्चितता तथा मुकदमों की बाढ़ आ सकती है।

इन टिप्पणियों के साथ बॉम्बे हाईकोर्ट ने याचिका का निपटारा करते हुए स्पष्ट किया कि तलाकशुदा पत्नी को पूर्व पति की संपत्ति से पूर्व निर्धारित भरण-पोषण मिलता रह सकता है, लेकिन उसकी राशि बढ़ाने की मांग पति की मृत्यु के बाद स्वीकार नहीं की जा सकती।

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