दीपिका नागर और त्विषा शर्मा की कथित हत्या या आत्महत्या, दहेज के लिए उत्पीड़न और ससुराल पक्ष के अत्याचार की दो खबरें इस समय काफी सुर्खियों में हैं। यह हमारे देश और समाज की कड़वी सच्चाई है कि महिला सशक्तीकरण के लिए बने सारे नियम-कानून महिला उत्पीड़न के बढ़ते आंकड़ों के सामने प्रभावहीन नजर आते हैं। दहेज की कुप्रथा को रोकने के लिए 1 जुलाई 1961 से ही दहेज निषेध अधिनियम लागू है। जिसके तहत दहेज लेना और देना दंडनीय अपराध है। दहेज प्रथा को बढ़ावा देना भी गैरकानूनी है और मौखिक या लिखित किसी भी तरह से दहेज के लेन-देन से संबंधित कोई भी समझौता करना भी कानूनन अमान्य है। इस कानून के उल्लंघन पर बाकायदा जुर्माना और जेल दोनों का प्रावधान है। सभ्य समाज चाहे तो इस कानून का पालन कर लड़कियों के लिए एक सुरक्षित माहौल और भविष्य बना ले। लेकिन जिस समाज में लड़की होना ही अघोषित तौर पर अपराध बना हुआ है, वहां ऐसी कोई भी उम्मीद बेकार ही है।
2026 में आकर भी हमें संदिग्ध हालात में ससुराल में नवविवाहिताओं की मौत पर चर्चा करनी पड़ रही है। यही हाल पिछली सदी का भी था, तब एक गंभीर बात मज़ाक़ की तरह कही जाने लगी कि सारे स्टोव दुल्हनों के सामने ही क्यों फटते हैं। उस समय कई स्टोव चूल्हे फटने के कारण जलकर मर जाती थीं। उनके ससुराल वाले मायके में खबर करते थे कि आपकी बेटी जल गई। अब स्टोव नहीं है, तो मानसिक तौर पर बीमार होने के कारण सामने आने लगे हैं।
भोपाल में त्विषा शर्मा की कथित आत्महत्या के पीछे भी उनकी सास रिटायर्ड जज गिरिबाला सिंह ने यही बताया है कि त्विषा मानसिक रोगी थी। गौरतलब है कि नोएडा की रहने वाली त्विषा की शादी भोपाल में समर्थ सिंह से हुई थी। बीती 12 मई को रात को अचानक त्विषा की मौत की ख़बर उसके परिजनों को दी गई। ससुराल पक्ष ने बताया कि त्विषा ने फांसी लगा ली, वहीं पुलिस ने भी शुरुआती जांच में इसे आत्महत्या माना है, लेकिन मृतका के परिवार ने इसे सोची-समझी साजिश करार दिया है। परिवार का आरोप है कि शादी के बाद से ही त्विषा पर नौकरी छोड़ने और गर्भधारण करने को लेकर लगातार मानसिक और शारीरिक दबाव बनाया जा रहा था।
बताया जा रहा है कि मौत से ठीक पहले त्विषा ने अपनी एक सहेली को फोन पर कई संदेश भेजे थे, जिसमें अपने उत्पीड़न की बात उन्होंने कही थी। एम्स भोपाल में मौत के बाद पोस्टमार्टम हुआ, जिसकी रिपोर्ट में पुष्टि हुई है कि त्विषा की मौत फांसी लगाने से हुई थी। उनके शरीर पर कोई बड़ी चोट के निशान तो नहीं हैं, लेकिन उनके हाथ समेत शरीर के कुछ हिस्सों पर चोट के निशान भी पाए गए हैं। रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि मौत से करीब एक हफ़्ते पहले त्विषा का गर्भपात हुआ था। पुलिस अब यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि ये चोटें कैसे आईं।
12 मई को जब त्विषा शर्मा कथित रूप से घर की छत पर जिमनास्टिक रिंग की रस्सी के सहारे लटकी हुई मिली तो ससुराल वाले उन्हें तुरंत अस्पताल लेकर पहुंचे, लेकिन डॉक्टर ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। घटना के बाद त्विषा के मायके वालों की शिकायत पर पुलिस ने पति समर्थ सिंह और सास गिरिबाला सिंह के ख़िलाफ़ दहेज हत्या और प्रताड़ना का मामला दर्ज किया था। गिरिबाला सिंह को अग्रिम जमानत मिल चुकी है, लेकिन समर्थ सिंह इन पंक्तियों के लिखे जाने तक फरार ही है। गिरिबाला सिंह ने इस बीच मीडिया में कुछ इंटरव्यू भी दिए हैं, जिसमें उन्होंने त्विषा की मानसिक स्थिति ठीक न होने की बात कही। गिरिबाला सिंह के मुताबिक त्विषा ने कहा कि उसे पौधे पसंद हैं, लेकिन वह उनमें पानी नहीं देती थी, बच्चे पसंद होने की बात कही, लेकिन पालना नहीं चाहती थी। खाना बनाना पसंद होने की बात कही, लेकिन अपनी देखरेख में न खाना बनवाना चाहती थी, न सब के साथ बैठकर भोजन खाती थी।
यह बात समझ से परे है कि जो व्यक्ति अपना पक्ष रखने के लिए इस दुनिया में नहीं है, उसकी मौत के चंद दिन बाद ही इस तरह शिकायती लहजे में बातें करना किस लिहाज से सही है। यह मामला फ़िलहाल कानूनी दायरे में है, तो ऐसे में गिरिबाला सिंह का सार्वजनिक बयान करना भी क्या सही है! बता दें कि त्विषा के पिता नवनिधि शर्मा ने गिरिबाला सिंह पर गंभीर आरोप लगाए हैं कि वे मीडिया के सामने उनकी मृत बेटी के चरित्र पर लांछन लगा रहीं हैं। उन्होंने यह भी कहा कि शादी के बाद से त्विषा को प्रताड़ित किया जाता था, लेकिन त्विषा की खुशी की खातिर हम समर्थ सिंह की तमाम हरकतों को नज़रअंदाज़ करते रहे, उसके जुल्म सहते रहे।
सवाल यही है कि त्विषा पर कथित उत्पीड़न की बात जब पहले से उनके परिजनों को पता थी, तो वे किस बात का इंतजार कर रहे थे, क्यों उन्होंने अपनी बेटी को पहले ही अपने पास नहीं बुला लिया। ग्रेटर नोएडा की दीपिका नागर भी इसी तरह मौत का शिकार हुई हैं। ससुराल वालों के मुताबिक दीपिका ने छत से कूद कर आत्महत्या कर ली, लेकिन उनके परिजनों का कहना है कि दीपिका को दहेज के लिए उत्पीड़न किया जाता था। महज 14 महीने पहले काफी धूमधाम से दीपिका की शादी की गई, और उन्हें भारी भरकम दहेज के अलावा स्कार्पियो वाहन दिया गया, लेकिन ससुराल वाले फॉर्च्यूनर गाड़ी की मांग कर रहे थे और इसके लिए उन्होंने दीपिका को काफी तंग किया।
इन दोनों मामलों में कई समानताएं हैं। दोनों लड़कियां उच्च शिक्षित थीं, मां-बाप का साया उन पर था, अन्य रिश्तेदार, परिजन भी साथ थे, फिर भी शादी के चंद महीनों में ससुराल में दोनों अकाल मौत का शिकार हुईं। अब परिजन दहेज और अन्य उत्पीड़न का आरोप लगा रहे हैं, वहीं ससुराल वाले इसे आत्महत्या बता रहे हैं। इन मौतों का सच तो शायद जांच के बाद सामने आए, लेकिन इन अकाल मौतों को टाला जा सकता था, अगर इन दोनों के परिवार वाले समाज से पहले अपनी बेटियों को रखते।
जिस आंगन में डोली उतरे, वहीं से अर्थी उठनी चाहिए जैसी दकियानूसी सोच को समाज में जड़ से उखाड़ने की और तलाक के प्रावधान को बिना किसी अपराधबोध के स्वीकार करने की जरूरत है। विवाह संस्था सामाजिक व्यवस्था, नैतिकता, परंपराओं के पालन आदि-आदि के लिए ज़रूरी है, लेकिन वही अंतिम सत्य और अंतिम पड़ाव नहीं है, जिसके लिए बार-बार बेटियों को कुर्बान किया जाए।
सन्दर्भ स्रोत : देशबन्धु में दिनांक 21 मई 2026 को प्रकाशित सम्पादकीय



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