दिल्ली हाईकोर्ट ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि मां होने के कारण किसी महिला की पढ़ाई या व्यक्तिगत विकास पर रोक नहीं लगाई जा सकती। यह टिप्पणी अदालत ने उस मामले में की, जिसमें एक महिला ने अपने बच्चे के साथ अमेरिका जाकर स्नातकोत्तर (पोस्ट ग्रेजुएट) पढ़ाई करने की अनुमति मांगी थी। अदालत ने महिला को यह अनुमति दे दी।
जस्टिस सौरभ बनर्जी ने कहा कि यदि किसी महिला को केवल इसलिए उच्च शिक्षा से रोका जाए क्योंकि वह मां है, तो यह संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिले उसके जीवन, स्वतंत्रता और विकास के अधिकार का उल्लंघन होगा।
अदालत ने स्पष्ट किया कि मां होने से किसी व्यक्ति के मौलिक अधिकार कम नहीं हो जाते। समाज की पारंपरिक सोच या रूढ़िवादी भूमिकाओं के आधार पर किसी महिला को सीमित नहीं किया जा सकता। यह तर्क कि मां बच्चे की मुख्य देखभालकर्ता होती है, उसकी शिक्षा, आत्म-विकास या आगे बढ़ने के अधिकार को छोड़ने का आधार नहीं बन सकता।
कोर्ट ने कहा कि मां होना किसी महिला की तरक्की में बाधा नहीं बन सकता। उसे भी पढ़ने, आगे बढ़ने और अपने सपने पूरे करने का पूरा अधिकार है। अदालत ने यह भी कहा कि किसी मां को अपने बच्चे और अपने करियर के बीच चुनाव करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। बच्चे की हिरासत से जुड़े मामलों में इस तथ्य का विशेष ध्यान रखा जाना चाहिए।
न्यायालय ने कहा कि हर व्यक्ति को अपनी पूरी क्षमता तक पहुंचने का अधिकार है और मां होने के कारण किसी महिला से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वह अपने सपनों या करियर को त्याग दे।
अदालत के अनुसार, मां और करियर के बीच संतुलन बनाना न केवल मां के लिए, बल्कि बच्चे के लिए भी लाभदायक होता है। न्यायालय ने कहा कि जब किसी मां को उच्च शिक्षा प्राप्त करने का अवसर मिलता है, तो इससे उसकी गरिमा बढ़ती है, आर्थिक आत्मनिर्भरता मजबूत होती है और उसका मानसिक व सामाजिक कल्याण बेहतर होता है। ये सभी पहलू संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। इसका सीधा लाभ बच्चे को भी मिलता है, क्योंकि ऐसी मां अपने बच्चे को अधिक सुरक्षित, स्थिर और बेहतर वातावरण दे सकती है।
न्यायालय ने ये टिप्पणियां उस आवेदन पर सुनवाई के दौरान कीं, जिसमें एक नाबालिग बच्चे की मां ने अपने बच्चे के साथ अमेरिका जाकर स्नातकोत्तर डिग्री करने की अनुमति मांगी थी। मां और पिता के बीच लंबे समय से वैवाहिक विवाद चल रहा था। पारिवारिक अदालत ने पिता को हर महीने तीन रविवार और बच्चे के जन्मदिन पर उससे मिलने की अनुमति दी थी, और इन मुलाकातों पर कोई निगरानी नहीं रखी गई थी।
मां बच्चे को लेकर अमेरिका चली गई थी, जिसके कारण यह मामला पारिवारिक अदालत, दिल्ली उच्च न्यायालय और यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट तक भी पहुंचा। अंततः मां ने औपचारिक रूप से अपने बच्चे के साथ अमेरिका जाने की अनुमति के लिए दिल्ली उच्च न्यायालय में आवेदन किया।
मां ने अदालत को बताया कि वह एक सेमेस्टर की पढ़ाई पूरी कर चुकी हैं और बच्चे का अमेरिका के एक स्कूल में दाखिला करा देंगी। उन्होंने यह भी कहा कि स्नातकोत्तर डिग्री से उन्हें बेहतर नौकरी मिलने की संभावना बढ़ेगी, जिससे बच्चे का जीवन स्तर भी सुधरेगा। इसके अलावा, मां ने दलील दी कि बच्चा हमेशा उनके साथ रहा है और यदि उसे उनसे अलग किया गया तो यह बच्चे के हित में नहीं होगा।



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