Calcutta High Court ने एक अहम फैसले में साफ कर दिया है कि अगर कोई हिंदू महिला मुस्लिम रीति-रिवाजों के अनुसार शादी करती है, तब भी उसे गुजारा भत्ता पाने का पूरा अधिकार होगा। अदालत ने कहा कि जब तक किसी सक्षम अदालत द्वारा शादी को अवैध घोषित नहीं किया जाता, तब तक पति अपनी पत्नी के भरण-पोषण के लिए जिम्मेदार रहेगा।
यह मामला पश्चिम बंगाल के पश्चिम बर्द्धमान जिले का है। यहां एक हिंदू महिला ने आरोप लगाया था कि शादी के बाद उसके पति ने उसे छोड़ दिया और घरेलू हिंसा भी की। इसके बाद महिला ने मजिस्ट्रेट अदालत का दरवाजा खटखटाया। अदालत ने महिला को अंतरिम भरण-पोषण के तौर पर हर महीने 5 हजार रुपये और उसके नाबालिग बेटे के लिए 4 हजार रुपये देने का आदेश दिया था।
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हालांकि, फरवरी 2024 में आसनसोल की एक पुनरीक्षण अदालत ने इस आदेश को रद्द कर दिया था। पति ने दलील दी थी कि शादी कानूनी रूप से मान्य नहीं है, इसलिए भरण-पोषण नहीं दिया जा सकता। पुनरीक्षण अदालत ने इसी आधार पर मजिस्ट्रेट के आदेश को खारिज कर दिया था। लेकिन अब Calcutta High Court ने उस फैसले को पलट दिया है। Justice Chaitali Chatterjee ने अपने आदेश में कहा है कि पुनरीक्षण अदालत ने सामाजिक न्याय और महिलाओं के अधिकारों से जुड़े कानूनी सिद्धांतों को नजरअंदाज किया।
हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि केवल तकनीकी आधारों पर किसी महिला और बच्चे को राहत से वंचित नहीं किया जा सकता है। अदालत ने यह भी कहा कि Supreme Court of India पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि मुस्लिम पुरुष अपनी पत्नी को भरण-पोषण देने के लिए बाध्य है, जब तक विवाह को किसी सक्षम अदालत द्वारा अमान्य घोषित न कर दिया जाए। इसके साथ ही हाई कोर्ट ने मजिस्ट्रेट अदालत के पुराने आदेश को फिर से बहाल कर दिया और पति को निर्देश दिया कि वह तय की गई अंतरिम भरण-पोषण राशि का भुगतान करे।



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